Bhauma Kara dynasty Of Odisha

Bhauma Kara dynasty of Odisha

भौमकर राजवंश  ने 8वीं से 10वीं शताब्दी के दौरान पूर्वी भारत के तोषल (Toshala) क्षेत्र पर शासन किया, जिसमें वर्तमान ओडिशा के कई हिस्से शामिल थे। इस राजवंश का भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है, विशेष रूप से उनकी प्रशासनिक व्यवस्था और वास्तुकला के क्षेत्र में योगदान के कारण।

भौम-कर राजवंश के प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:

1. उत्पत्ति और स्थापना

इस राजवंश की स्थापना लगभग 736 ईस्वी में क्षेमंकरदेव (Kshemankara-deva) द्वारा की गई थी, जिन्हें ‘लक्ष्मीकर’ के नाम से भी जाना जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि 736 ईस्वी ही उस ‘संवत’ (कैलेंडर युग) की शुरुआत थी जिसका उपयोग भौम-कर शासकों ने अपने अभिलेखों में किया था। क्षेमंकर-देव के बाद उनके पुत्र शिवकर-देव प्रथम ने साम्राज्य का विस्तार किया।

2. राजधानी

उनकी मुख्य राजधानी गुहदेवपाटक (Guhadevapataka) या गुहेश्वरपाटक थी। इस ऐतिहासिक स्थान की पहचान वर्तमान जाजपुर जिले के गोहिराटिकर (Gohiratikra) से की गई है। विद्वानों का मत है कि यह या तो प्राचीन विरजा (Viraja) शहर का एक नया नाम था या उसी के पास बसाया गया एक नया शहर था।

3. नाम का अर्थ

वंश के शुरुआती आधिकारिक अभिलेखों में परिवार को केवल भौम नाम से संबोधित किया गया है। राजवंश के नाम के साथ कर शब्द का औपचारिक प्रयोग छठे राजा, शुभकर द्वितीय के समय से मिलता है। चूँकि इस वंश के लगभग सभी पुरुष शासकों के नाम के अंत में “-कर” लगा होता था (जैसे शिवकर, शुभकर, शांतिकर), इसलिए इतिहासकारों ने इसे संयुक्त रूप से “भौम-कर” राजवंश कहना शुरू कर दिया।

4. उत्पत्ति के सिद्धांत

इनकी उत्पत्ति को लेकर कई ऐतिहासिक और पौराणिक मत प्रचलित हैं:

  • महेंद्र पर्वत और जनजाति सिद्धांत: कुछ विद्वान इन्हें महेंद्र पर्वत क्षेत्र की एक स्थानीय जनजाति से जोड़ते हैं। यह सिद्धांत विष्णु पुराण के एक पाठ पर आधारित है जिसमें “महेंद्र भौम” और राजा ‘गुहा’ का उल्लेख मिलता है, जिससे राजधानी का नाम ‘गुहदेवपाटक’ प्रेरित माना जाता है।
  • असम (प्राग्ज्योतिष) का पौराणिक संबंध: एक अन्य प्रमुख सिद्धांत इन्हें असम के पौराणिक भौम राजवंश से जोड़ता है। इस मत के अनुसार, ये भगवान विष्णु के पुत्र नरकासुर (जिन्हें ‘भौम’ भी कहा जाता था) के वंशज थे। उड़िया साहित्यकार सारला दास ने भी अपनी महाभारत में “विष्णुकर” को इस परिवार का संस्थापक बताया है।
  • अन्य स्थानीय सिद्धांत: कुछ अन्य सिद्धांतों में इन्हें ओडिशा की भुइयां (Bhuyan) या भूमिज (Bhumij) जनजाति से संबंधित बताया गया है, जो नाम की समानता और सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित हैं।

यह राजवंश न केवल अपनी उत्पत्ति के लिए, बल्कि अपनी धार्मिक सहिष्णुता (बौद्ध और हिंदू धर्म का संरक्षण) और सात महिला शासकों द्वारा किए गए शासन के लिए भी भारतीय इतिहास में अद्वितीय स्थान रखता है।

उत्पत्ति और स्थापना

  1. शिवकर प्रथम और साम्राज्य का विस्तार

शिवकर प्रथम (शासनकाल लगभग 756 या 786 ईस्वी), जिन्हें ‘उन्मत्तसिंह’ के नाम से भी जाना जाता था, इस वंश के सबसे प्रतापी प्रारंभिक शासकों में से एक थे।

  • सैन्य विजय: उनके शासनकाल में भौम-कर साम्राज्य ने अपनी सबसे बड़ी विस्तारवादी नीति देखी। शिवकर प्रथम ने कोंगोडा (Kongoda) और कलयुग (कलिंग) के उत्तरी भाग पर विजय प्राप्त कर अपना नियंत्रण मजबूत किया।
  • तटीय ओडिशा: उनके समय तक राजवंश ने लगभग पूरे तटीय ओडिशा पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था।
  • वैवाहिक और कूटनीतिक संबंध: उन्होंने राढ़ा (वर्तमान पश्चिम बंगाल का हिस्सा) के राजा को हराया और उनकी बेटी से विवाह किया, जिससे उनकी शक्ति और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।
  1. महिला शासकों का अद्वितीय शासन

इस राजवंश की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक विशेषता यहाँ सात महिला शासकों का शासन करना था। भारतीय इतिहास में किसी एक ही राजवंश में इतनी बड़ी संख्या में रानियों का शासन करना अत्यंत दुर्लभ है।

  • त्रिभुवन महादेवी प्रथम (Tribhuvana-Mahadevi I): यह इस वंश की पहली और सबसे शक्तिशाली महिला शासिका थीं।
    • साम्राज्य का पुनर्गठन: उनके शासन से पहले राष्ट्रकूट और पाल राजाओं के आक्रमणों के कारण साम्राज्य की स्थिति बहुत खराब हो गई थी। उन्होंने विदेशी प्रभुत्व को समाप्त कर साम्राज्य को पुनर्गठित और एकीकृत किया।
    • पृष्ठभूमि: वह पश्चिमी गंगा (Western Ganga) के राजा राजमल्ल की पुत्री थीं।
    • धार्मिक योगदान: वह एक कट्टर वैष्णव थीं और उन्होंने देश को प्रबुद्ध करने के लिए कई मठों और मंदिरों का निर्माण करवाया था।
  • अन्य प्रमुख महिला शासक: बाद के वर्षों में आंतरिक संघर्ष और उत्तराधिकार के संकट के दौरान दण्डी महादेवी, गौरी महादेवी, वकुला महादेवी और धर्म महादेवी ने सत्ता संभाली। इन रानियों ने परममाहेश्वरी, परमभट्टारिका और महाराजाधिराज जैसी शाही उपाधियाँ धारण की थीं।
  1. साम्राज्य की सीमाएँ (चरम विस्तार)

भौम-कर राजवंश के साम्राज्य को तोषल (Toshala) कहा जाता था, जो धीरे-धीरे ओद्र, कोंगोडा और उत्कल जैसे विभिन्न क्षेत्रों के एकीकरण का केंद्र बना।

  • उत्तर: साम्राज्य की उत्तरी सीमा पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले तक फैली हुई थी।
  • दक्षिण: दक्षिण में इनका नियंत्रण कलिंग (Kalinga) के उत्तरी हिस्सों तक था।
  • प्रशासनिक इकाई: अपने चरम पर, इनका राज्य वर्तमान ओडिशा के एक बड़े हिस्से पर फैला हुआ था और इसे मंडलों (राजस्व प्रभागों), विषयों (जिलों) और गांवों में विभाजित किया गया था।

उनकी राजधानी गुहदेवपाटक (जाजपुर के पास) इस विशाल साम्राज्य के राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का मुख्य केंद्र थी। यह राजवंश न केवल सैन्य शक्ति के लिए, बल्कि अपनी धार्मिक सहिष्णुता और कलात्मक नवाचारों (जैसे खाकरा शैली के मंदिर) के लिए भी जाना जाता है।

धर्म और सांस्कृतिक संरक्षण

भौम-कर राजवंश (8वीं से 10वीं शताब्दी) के दौरान धर्म और सांस्कृतिक संरक्षण का एक अत्यंत समृद्ध और उदार स्वरूप देखने को मिलता है। इस काल की सबसे प्रमुख विशेषता धार्मिक सहिष्णुता थी, जहाँ बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म (ब्राह्मणवाद) न केवल साथ-साथ फले-फूले, बल्कि राजपरिवार के भीतर भी इनके बीच गहरा समन्वय था।:

  1. बौद्ध धर्म का संरक्षण और प्रसार

राजवंश के प्रारंभिक शासक बौद्ध धर्म के महान संरक्षक थे।

  • महान केंद्र: उनके काल में रत्नगिरि, ललितगिरि और उदयगिरि जैसे प्रसिद्ध बौद्ध मठों और स्तूपों का विकास हुआ, जिन्हें डायमंड ट्रायंगल के रूप में जाना जाता है।
  • धार्मिक परिवर्तन: इस समय क्षेत्र में बौद्ध धर्म का स्वरूप महायान से धीरे-धीरे वज्रयान (तांत्रिक बौद्ध धर्म) की ओर स्थानांतरित हुआ।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा: भौम-कर राजाओं के संबंध चीन जैसे देशों से थे। चीनी वृत्तांतों के अनुसार, शुभकर-सिंह जैसे शासकों ने चीनी सम्राटों को बौद्ध ग्रंथ उपहार में भेजे थे और बौद्ध भिक्षु ‘प्रज्ञा’ जैसे विद्वान ओद्र (ओडिशा) के मठों में बस गए थे।
  1. ब्राह्मण धर्म (हिंदू धर्म) का पुनरुत्थान

राजवंश के बाद के काल में ब्राह्मण धर्म (शैव, वैष्णव और शाक्त) का पुनरुत्थान हुआ।

  • शैव और वैष्णव झुकाव: रानी त्रिभुवनमहादेवी प्रथम एक समर्पित वैष्णव थीं। राजा शुभकर चतुर्थ इस वंश के पहले ज्ञात शासक थे जिन्होंने स्वयं को ‘परम-माहेश्वर’ (शिव भक्त) कहा, और उनके बाद के सभी शासक शैव अनुयायी रहे।
  • धार्मिक समन्वय: सहिष्णुता का अनूठा उदाहरण यह है कि बौद्ध राजा शुभकर प्रथम ने शैव रानी माधवी-देवी से विवाह किया था। राजाओं द्वारा अपनी व्यक्तिगत आस्था से अलग धर्मों के मंदिरों और मठों को भी भूमि दान दी जाती थी।
  1. कला और वास्तुकला में योगदान

भौम-कर राजवंश (8वीं से 10वीं शताब्दी) ने ओडिशा की कला और वास्तुकला के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके शासनकाल को प्रारंभिक कलिंग शैली के विकास का चरण माना जाता है, जिसने बाद के भुवनेश्वर और पुरी के भव्य मंदिरों की आधारशिला रखी।

  1. खाकरा देउल शैली (Khakara Deula Style)

इस राजवंश का सबसे विशिष्ट योगदान खाकरा शैली का विकास था।

  • विशेषता: इसकी पहचान लंबी, तिजोरीदार छत (elongated, vaulted roof) है, जो एक ढके हुए मालगाड़ी के डिब्बे (gabled wagon) जैसी दिखती है। यह शैली मुख्य रूप से चामुंडा और दुर्गा जैसी स्त्री देवी देवताओं के मंदिरों के लिए उपयोग की जाती थी।
  • वैताल देउल (Vaitala Deula): भुवनेश्वर में स्थित यह 8वीं शताब्दी का मंदिर इस शैली का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसे तिनीमुंडिया देउल भी कहा जाता है क्योंकि इसके ऊपर तीन शिखर हैं, जो देवी चामुंडा की तीन शक्तियों (महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली) का प्रतीक हैं।
  • बाराही मंदिर (Barahi Temple): पुरी जिले में स्थित 9वीं शताब्दी का यह मंदिर भी खाकरा शैली की विशेषताओं को दर्शाता है।
  1. चौसठ योगिनी मंदिर, हीरापुर

भुवनेश्वर के पास स्थित प्रसिद्ध चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण संभवतः भौम वंश की रानी हीरादेवी द्वारा लगभग 864 ईस्वी में करवाया गया था। यह एक वृत्ताकार और हाइपैथ्रल (आकाश की ओर खुला) मंदिर है, जो तांत्रिक संप्रदाय की 64 योगिनियों की पूजा के लिए समर्पित है।

  1. बौद्ध वास्तुकला औरडायमंड ट्रायंगल

रत्नगिरि और ललितगिरि जैसे प्रमुख बौद्ध केंद्रों का विकास मुख्य रूप से भौमकर राजवंश (Bhauma-Kara dynasty) के संरक्षण में हुआ। इन केंद्रों के विकास से संबंधित मुख्य विवरण  इस प्रकार हैं:

  • राजकीय संरक्षण: भौम-कर राजवंश के प्रारंभिक शासक, जैसे क्षेमंकरदेव, शिवकर प्रथम और शुभकर प्रथम, स्वयं बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उनके शासनकाल में इन बौद्ध केंद्रों को बहुत महत्व मिला। विशेष रूप से, राजा शुभकर प्रथम (लगभग 790 ईस्वी) ने ऊंचे पत्थर के विहारों (monasteries) का निर्माण करवाया था।
  • डायमंड ट्रायंगल: रत्नगिरि, ललितगिरि और उदयगिरि को संयुक्त रूप से डायमंड ट्रायंगल (Diamond Triangle) के रूप में जाना जाता है। ये केंद्र ओडिशा में बौद्ध धर्म के सबसे महत्वपूर्ण स्थल बनकर उभरे।
  • ललितगिरि की विशेषता: ललितगिरि इस क्षेत्र के सबसे पुराने बौद्ध स्थलों में से एक है। यहाँ प्रमुख स्तूपों, ‘गूढ़’ (esoteric) बुद्ध प्रतिमाओं और मठों (विहारों) का निर्माण हुआ। यहाँ से बुद्ध के पवित्र अवशेष (relics) भी प्राप्त हुए हैं।
  • तांत्रिक बौद्ध धर्म का केंद्र: इन केंद्रों के विकास के दौरान इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म महायान से वज्रयान (तांत्रिक बौद्ध धर्म) की ओर स्थानांतरित हुआ। ललितगिरि जैसे स्थलों पर तांत्रिक बौद्ध धर्म का अभ्यास प्रमुखता से किया जाता था।
  • अंतर्राष्ट्रीय ख्याति: इन बौद्ध केंद्रों की प्रतिष्ठा वैश्विक स्तर पर थी। 9वीं शताब्दी में, प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु प्रज्ञा (Prajna), जिन्होंने नालंदा की यात्रा की थी, ओद्र (ओडिशा) के एक मठ में बस गए थे। इसके अलावा, चीनी वृत्तांतों के अनुसार, यहाँ के शासकों ने चीनी सम्राटों को बौद्ध ग्रंथ उपहार में भेजे थे।
  • स्थापत्य विकास: भौम-कर शासकों ने जाजपुर और कटक जैसे क्षेत्रों में ईंट और पत्थर के मंदिरों और विहारों के निर्माण को प्रोत्साहित किया, जिससे रत्नगिरि और ललितगिरि जैसे केंद्रों की कलात्मक और स्थापत्य भव्यता बढ़ी।

संक्षेप में, भौम-कर राजाओं की उदारता और धार्मिक झुकाव ने रत्नगिरि और ललितगिरि को मध्यकालीन भारत में बौद्ध शिक्षा और कला के महान केंद्रों के रूप में स्थापित किया।

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रत्नगिरि के मठों की वास्तुकला कैसी है?

रत्नगिरि के मठों की वास्तुकला मुख्य रूप से भौमकर राजवंश के संरक्षण में विकसित हुई, जो ईंट और पत्थर के निर्माण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस काल के दौरान, विशेष रूप से राजा शुभकर प्रथम ने रत्नगिरि में “ऊँचे पत्थर के विहारों” (lofty stone viharas) का निर्माण करवाया था।

यहाँ की वास्तुकला की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • संरचना और निर्माण: रत्नगिरि के मठ परिसरों में भव्य स्तूप, विहार (मठ) और मंदिर शामिल हैं। इन मठों के निर्माण में ईंटों और पत्थरों का व्यापक उपयोग किया गया था, जो प्रारंभिक कलिंग स्थापत्य शैली के विकास को दर्शाता है。
  • तांत्रिक प्रभाव और मूर्तिकला: रत्नगिरि में वास्तुकला और मूर्तिकला पर वज्रयान (तांत्रिक बौद्ध धर्म) का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। यहाँ “गूढ़” (esoteric) बुद्ध प्रतिमाओं और जटिल तांत्रिक मूर्तियों की प्रधानता है।
  • कलात्मक नक्काशी: यहाँ के मठों और मंदिरों में विस्तृत नक्काशी, पत्थर के अलंकृत द्वार और विभिन्न प्रतिमाओं का समावेश है, जो उस समय की कलात्मक श्रेष्ठता को प्रमाणित करते हैं।

रत्नगिरि, ललितगिरि और उदयगिरि के साथ मिलकर ओडिशा के प्रसिद्ध डायमंड ट्रायंगल (Diamond Triangle) का हिस्सा है, जो मध्यकालीन भारत में बौद्ध धर्म और वास्तुकला के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक था।

  1. अन्य मंदिर और धार्मिक समन्वय
  • राजवंश ने हिंदू और बौद्ध दोनों शैलियों को अपनाया, जिससे वास्तुकला में एक प्रकार का समन्वय दिखा।
  • रानी माधवीदेवी ने माधवेश्वर (शिव) को समर्पित एक मंदिर बनवाया था।
  • उनके काल की नक्काशी में खगोलीय कन्याओं, नर्तकियों और जटिल ज्यामितीय डिजाइनों का सुंदर चित्रण मिलता है।

संक्षेप में, भौम-कर राजवंश ने न केवल नई मंदिर शैलियों (जैसे खाकरा) के साथ प्रयोग किया, बल्कि ओडिशा के जाजपुर और कटक जैसे क्षेत्रों में ईंट और पत्थर के मंदिरों तथा मठों के निर्माण को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया।

  1. भाषा और लिपि

इस काल में संस्कृत को धार्मिक और आधिकारिक भाषा के रूप में संरक्षण प्राप्त था, जबकि दरबार में ओद्रप्राकृत (Odra-Prakrit) का प्रयोग होता था, जिससे कालांतर में आधुनिक ओडिया भाषा का विकास हुआ।

संक्षेप में, भौम-कर शासकों ने अपनी अपार संपत्ति को मठों, विहारों और मंदिरों के निर्माण में खर्च किया, जिससे उनका साम्राज्य मध्यकालीन भारत में कला और धर्म का एक प्रमुख केंद्र बन गया।

भौम-कर राजवंश का पतन 10वीं शताब्दी के दौरान आंतरिक संघर्षों और उत्तराधिकार की अस्थिरता के कारण हुआ। इस काल में साम्राज्य की स्थिति तब और कमजोर हो गई जब पड़ोसी सोमवंशी और भंज राजवंशों ने वैवाहिक संबंधों और राजनीतिक कूटनीति के माध्यम से हस्तक्षेप करना शुरू किया। अंततः, लगभग 950 ईस्वी के आसपास रानी धर्म महादेवी के शासन के साथ इस वंश का अंत हुआ और उनका क्षेत्र पूरी तरह से सोमवंशी राजवंश के अधीन चला गया।

 अपने लगभग दो शताब्दियों के शासन में, भौम-करों ने न केवल ओद्र, तोषल, कोंगोडा और उत्कल जैसे क्षेत्रों के एकीकरण की प्रक्रिया शुरू की, बल्कि सात महिला शासकों के नेतृत्व में प्रशासनिक कुशलता का एक अनूठा उदाहरण भी प्रस्तुत किया। उनकी सबसे बड़ी विरासत उनकी धार्मिक सहिष्णुता और वास्तुकला में निहित है, जहाँ उन्होंने बौद्ध विहारों और खाकरा शैली के हिंदू मंदिरों (जैसे वैताल देउल) का निर्माण करवाकर ओडिशा की सांस्कृतिक और कलात्मक पहचान को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया

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