What is the stock market and how does it work?

What is the stock market and how dose it work?

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What is the stock market and how dose it work?

शेयर बाजार, जिसे स्टॉक मार्केट या इक्विटी मार्केट भी कहा जाता है, एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां कंपनियों के शेयर (स्टॉक्स) खरीदे और बेचे जाते हैं। यह अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां निवेशक पैसे कमाने के लिए कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदते हैं। भारत में मुख्य शेयर बाजार बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) हैं। आइए इसे गहराई से समझते हैं:

1) शेयर बाजार की मूल अवधारणा: शेयर क्या होते हैं?

कल्पना कीजिए कि आपके पास एक बहुत सफल चाय की दुकान है। आपका बिजनेस अच्छा चल रहा है, लेकिन अब आप इसे बड़ा करना चाहते हैं – नई ब्रांच खोलनी है, बेहतर मशीनें लगानी हैं, ज्यादा स्टाफ रखना है। इसके लिए आपको बहुत सारे पैसे की जरूरत है।

आपके पास दो मुख्य विकल्प हैं:

  1. बैंक से लोन लेना (जिस पर ब्याज देना पड़ेगा)।
  2. या लोगों से कहना: “मेरी दुकान में हिस्सेदार बनो, मैं तुम्हें अपना कुछ मालिकाना हक दूंगा।”

दूसरा विकल्प ही शेयर जारी करने का आधार है।

शेयर असल में क्या है?

शेयर क्या होते हैं? शेयर एक कंपनी की मालिकाना हक का छोटा हिस्सा होता है। जब कोई कंपनी पैसे जुटाने के लिए जनता से फंड लेती है, तो वह अपने शेयर जारी करती है।

  • शेयर = कंपनी की मालिकाना हक का छोटाछोटा टुकड़ा।
  • पूरी कंपनी को 100% मानें, तो उसे लाखों-करोड़ों छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया जाता है। हर टुकड़े को एक शेयर कहते हैं।
  • जब आप एक शेयर खरीदते हैं, तो आप उस कंपनी के उस छोटे हिस्से के मालिक बन जाते हैं।

उदाहरण से समझें (सरल तरीके से):

मान लीजिए एक कंपनी है आम की खुशबू लिमिटेड जो आम का जूस बनाती है।

  • कंपनी को 10 करोड़ रुपये चाहिए नई फैक्ट्री के लिए।
  • कंपनी अपना पूरा मालिकाना हक 10 करोड़ शेयरों में बांटती है। मतलब 1 शेयर = कंपनी का 0.000001% हिस्सा।
  • हर शेयर की कीमत रखी जाती है ₹100।
  • आप ₹10,000 लगाकर 100 शेयर खरीदते हैं।
  • अब आप उस कंपनी के 100/10,00,00,000 = बहुत छोटे हिस्से के मालिक हैं। लेकिन लाखों लोग ऐसा करते हैं, तो कंपनी को पूरा पैसा मिल जाता है।

शेयर खरीदने से आपको क्या फायदा मिलता है?

जब आप शेयरधारक (shareholder) बनते हैं, तो आपको दो मुख्य अधिकार मिलते हैं:

  1. मुनाफे में हिस्सा (Dividend – लाभांश):
    • अगर कंपनी अच्छा मुनाफा कमाती है, तो वह बोर्ड मीटिंग में फैसला करती है कि कुछ हिस्सा शेयरधारकों को बांट दिया जाए।
    • उदाहरण: कंपनी ने ₹100 करोड़ का मुनाफा कमाया और फैसला किया कि ₹2 प्रति शेयर डिविडेंड देगी।
    • आपके पास 100 शेयर हैंआपको ₹200 सीधे बैंक अकाउंट में मिलेंगे। यह बिना कुछ किए कमाई है।
  2. वोटिंग अधिकार (Voting Rights):
    • बड़े फैसलों में (जैसे नया CEO चुनना, कंपनी को बेचना आदि) आप वोट दे सकते हैं।
    • जितने ज्यादा शेयर, उतना ज्यादा वोटिंग पावर।
    • (नोट: कुछ कंपनियां दो तरह के शेयर जारी करती हैंएक में वोटिंग अधिकार ज्यादा, दूसरे में कम।)
सबसे महत्वपूर्ण बात: शेयर की कीमत क्यों बदलता रहता है?
  • जब आप शेयर खरीदते हैं, तो कंपनी को पैसा तभी मिलता है जब वह पहली बार शेयर जारी करती है (IPO के समय)
  • उसके बाद शेयर बाजार (NSE/BSE) पर लोग एकदूसरे से शेयर खरीदतेबेचते हैं।
  • अगर ज्यादा लोग सोचते हैं कि कंपनी का भविष्य शानदार है (नई प्रोडक्ट, अच्छा प्रॉफिट), तो वे ज्यादा कीमत देकर शेयर खरीदना चाहेंगेशेयर की कीमत बढ़ेगी।
  • अगर कंपनी घाटे में जा रही है या मार्केट में डर हैलोग बेचना चाहेंगेकीमत गिरेगी।

असली दुनिया का उदाहरण:

  • रिलायंस इंडस्ट्रीज: मुकेश अंबानी की कंपनी।
  • कुल शेयर: लगभग 676 करोड़।
  • अगर आप 100 शेयर खरीदते हैं, तो आप रिलायंस के बहुत छोटे मालिक हैंलेकिन फिर भी मालिक हैं!
  • रिलायंस जब डिविडेंड देती है, तो आपको भी हिस्सा मिलता है।
  • पिछले 10 सालों में रिलायंस का शेयर ₹300 से बढ़कर ₹3000 के आसपास पहुंचाजिन्होंने पहले खरीदा, उनकी वैल्थ 10 गुना हो गई।
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2) प्राइमरी और सेकेंडरी मार्केट: गहराई से समझें

शेयर बाजार को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा जाता है – प्राइमरी मार्केट और सेकेंडरी मार्केट। ये दोनों अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। आइए इसे एक छोटे बिजनेस के उदाहरण से समझते हैं।

कल्पना कीजिए: आप एक नया रेस्टोरेंट खोल रहे हैं

आपको रेस्टोरेंट शुरू करने के लिए ₹10 लाख की जरूरत है।

1. प्राइमरी मार्केट (Primary Market) – नया पैसा जुटाना

  • यह वह जगह है जहां कंपनी पहली बार जनता से पैसा इकट्ठा करती है और बदले में अपने शेयर देती है।
  • पैसा सीधे कंपनी के पास जाता है और कंपनी उसका इस्तेमाल बिजनेस बढ़ाने में करती है (नई फैक्ट्री, मशीनें, रिसर्च आदि)।
  • सबसे आम तरीका: IPO (Initial Public Offering) – यानी पहली बार पब्लिक को शेयर बेचना।

उदाहरण आपके रेस्टोरेंट का:

  • आप अपने रेस्टोरेंट को 100 हिस्सों (शेयर) में बांटते हैं।
  • हर हिस्से की कीमत ₹10,000 रखते हैं।
  • आप दोस्तों, रिश्तेदारों और आम लोगों को कहते हैं: “मेरे रेस्टोरेंट में पार्टनर बनो, ₹10,000 देकर 1% मालिकाना हक लो।”
  • 100 लोग ₹10,000 देते हैं → आपको कुल ₹10 लाख मिलते हैं।
  • यह पैसा आप रेस्टोरेंट बनाने, किचन सेटअप करने में लगाते हैं।
  • यह प्राइमरी मार्केट है – नया पैसा कंपनी (आपके रेस्टोरेंट) के पास गया।

असली दुनिया का उदाहरण:

  • Zomato IPO (2021): Zomato ने पहली बार शेयर बेचे। लोगों ने आवेदन किया, पैसा Zomato को गया। Zomato ने उस पैसे से बिजनेस बढ़ाया (नई सिटी में सर्विस शुरू की, टेक्नोलॉजी बेहतर की)।
  • LIC IPO (2022): भारत की सबसे बड़ी IPO। LIC को हजारों करोड़ रुपये मिले, जो उसने अपने बिजनेस में लगाए।

महत्वपूर्ण बातें:

  • प्राइमरी मार्केट में शेयर की कीमत कंपनी और निवेश बैंक तय करते हैं।
  • यहां ट्रेडिंग स्टॉक एक्सचेंज (NSE/BSE) पर नहीं होती – यह ऑफलाइन या बैंक/ब्रोकर के जरिए होता है।
  • IPO के अलावा अन्य तरीके: FPO (Follow-on Public Offer), Rights Issue आदि।

2. सेकेंडरी मार्केट (Secondary Market) – पुराने शेयरों की खरीदबिक्री

  • यहां पहले से जारी किए गए शेयरों की ट्रेडिंग होती है।
  • पैसा कंपनी को नहीं जाता, बल्कि एक निवेशक से दूसरे निवेशक के पास जाता है।
  • कंपनी को यहां से कोई नया पैसा नहीं मिलता।
  • भारत में BSE (Bombay Stock Exchange) और NSE (National Stock Exchange) इसी सेकेंडरी मार्केट हैं।

उदाहरण आपके रेस्टोरेंट का (IPO के बाद):

  • अब आपका रेस्टोरेंट चल रहा है और बहुत सफल हो गया है।
  • जिन 100 लोगों ने शुरू में ₹10,000 देकर हिस्सा लिया था, उनमें से एक व्यक्ति को पैसे की जरूरत पड़ गई।
  • वह अपना 1% हिस्सा बेचना चाहता है।
  • अब रेस्टोरेंट की वैल्यू बढ़कर ₹20 लाख हो गई है, तो उसका 1% हिस्सा ₹20,000 का हो गया।
  • वह व्यक्ति अपना हिस्सा किसी नए व्यक्ति को ₹20,000 में बेचता है।
  • पैसा बेचने वाले को मिला, नए खरीददार को हिस्सा मिला, लेकिन आपके रेस्टोरेंट को कोई नया पैसा नहीं मिला।
  • यह सेकेंडरी मार्केट है।

असली दुनिया का उदाहरण:

  • आप आज NSE/BSE पर Reliance, HDFC Bank, Tata Motors के शेयर खरीदते हैं।
  • आपका पैसा उस व्यक्ति को जाता है जिसने शेयर बेचा, न कि रिलायंस या HDFC बैंक को।
  • रिलायंस को पैसा तभी मिला था जब उसने अपना IPO या FPO निकाला था (कई साल पहले)।

महत्वपूर्ण बातें:

  • यहां शेयर की कीमत डिमांड और सप्लाई से तय होती है – हर सेकंड बदलती रहती है।
  • यही वह जगह है जहां हम रोजाना ट्रेडिंग करते हैं (इंट्राडे, लॉन्ग टर्म आदि)।
  • सेकेंडरी मार्केट के बिना प्राइमरी मार्केट काम नहीं कर सकता – क्योंकि अगर लोग शेयर बाद में नहीं बेच पाएं, तो कोई IPO में पैसा नहीं लगाएगा।

दोनों में मुख्य अंतर (संक्षेप में):

विशेषता

प्राइमरी मार्केट

सेकेंडरी मार्केट

पैसा कहां जाता है?

सीधे कंपनी को

एक निवेशक से दूसरे निवेशक को

उद्देश्य

कंपनी नया फंड जुटाती है

निवेशक ट्रेडिंग करके कमाई करते हैं

पहली बार शेयर?

हां (IPO, FPO आदि)

नहीं, पुराने शेयर

कीमत कौन तय करता है?

कंपनी और निवेश बैंक

बाजार की मांग-आपूर्ति

उदाहरण

Zomato IPO, LIC IPO

NSE/BSE पर रोजाना ट्रेडिंग

निष्कर्ष: प्राइमरी मार्केट कंपनी के लिए “पैसे जुटाने का दरवाजा” है, जबकि सेकेंडरी मार्केट निवेशकों के लिए “कमाई का मौका” है। ज्यादातर लोग (हम आप) सेकेंडरी मार्केट में ही निवेश करते हैं, क्योंकि IPO में हिस्सा मिलना मुश्किल और लॉटरी जैसा होता है।

अगर आप निवेश शुरू करना चाहते हैं, तो डेमाट अकाउंट खोलकर सेकेंडरी मार्केट (NSE/BSE) से ही शुरुआत करें।

शेयर बाजार कैसे काम करता है?

  • डिमांड और सप्लाई का नियम: शेयर की कीमत डिमांड (मांग) और सप्लाई (आपूर्ति) से तय होती है। अगर कोई कंपनी अच्छा प्रदर्शन कर रही है (जैसे अच्छा प्रॉफिट, नई प्रोडक्ट लॉन्च), तो उसके शेयर की मांग बढ़ती है, जिससे कीमत बढ़ती है। उल्टा, अगर कंपनी घाटे में है या बाजार में नेगेटिव न्यूज है, तो सप्लाई बढ़ती है और कीमत गिरती है।
  • ट्रेडिंग प्रक्रिया:
    • डेमाट अकाउंट: शेयर खरीदने के लिए सबसे पहले डेमाट (Dematerialized) अकाउंट खोलना पड़ता है, जो शेयर को इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखता है। यह बैंक अकाउंट की तरह होता है, लेकिन शेयर के लिए।
    • ट्रेडिंग अकाउंट: ब्रोकर (जैसे Zerodha, Upstox) के माध्यम से ट्रेडिंग अकाउंट खोलें। ब्रोकर एक्सचेंज से जुड़े होते हैं।
    • खरीदबिक्री: आप ऐप या वेबसाइट पर ऑर्डर देते हैं। दो प्रकार के ऑर्डर:
      • मार्केट ऑर्डर: मौजूदा कीमत पर तुरंत खरीद/बेच।
      • लिमिट ऑर्डर: एक तय कीमत पर खरीद/बेच, अगर वह कीमत मिले तो।
    • ट्रेडिंग सुबह 9:15 से दोपहर 3:30 तक होती है (भारतीय समयानुसार)।

इंडेक्स (Indices): शेयर बाजार की दिशा दिखाने वाले इंडिकेटर

कल्पना कीजिए कि शेयर बाजार एक बहुत बड़ा बाजार है जहां हजारों कंपनियों के शेयर खरीदे-बेचे जाते हैं। हर कंपनी का शेयर अलग-अलग चलता है – कुछ ऊपर, कुछ नीचे। अब सवाल यह है कि पूरे बाजार का हाल कैसा है? ऊपर जा रहा है या नीचे? यही बताने के लिए इंडेक्स बनाए गए हैं।

इंडेक्स एक तरह का थर्मामीटर है जो पूरे शेयर बाजार की सेहत बताता है। यह चुनिंदा बड़ी और महत्वपूर्ण कंपनियों के शेयरों के प्रदर्शन का औसत लेकर बनाया जाता है। अगर इंडेक्स बढ़ता है, तो मतलब ज्यादातर बड़ी कंपनियां अच्छा कर रही हैं → बाजार बुलिश (ऊपर की ओर)। अगर गिरता है, तो बाजार बेयरिश (नीचे की ओर)।

भारत में दो मुख्य इंडेक्स हैं:

1. सेंसेक्स (Sensex)

  • पूरा नाम: S&P BSE Sensex
  • यह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का बेंचमार्क इंडेक्स है।
  • इसमें 30 सबसे बड़ी और मजबूत कंपनियां शामिल हैं (जैसे Reliance, HDFC Bank, Infosys, TCS, ITC आदि)।
  • ये कंपनियां अलग-अलग सेक्टर्स (बैंकिंग, IT, FMCG, ऑटो आदि) से चुनी जाती हैं।
  • लॉन्च: 1986 में।
  • बेस वैल्यू: 1978-79 को 100 मानकर शुरू किया गया।
  • कैलकुलेशन: फ्री-फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन मेथड से। बड़ी कंपनियों का ज्यादा वेटेज (जैसे Reliance का वेटेज ज्यादा)।
  • जनवरी 2026 के शुरू में सेंसेक्स 85,700-85,800 पॉइंट्स के आसपास ट्रेड कर रहा है।
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2. निफ्टी (Nifty)

  • पूरा नाम: Nifty 50
  • यह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का बेंचमार्क इंडेक्स है।
  • इसमें 50 सबसे बड़ी और एक्टिव कंपनियां शामिल हैं (सेंसेक्स की 30 से ज्यादा, इसलिए थोड़ा ब्रॉडर व्यू देता है)।
  • सेक्टर्स: 24 से ज्यादा सेक्टर्स कवर करता है।
  • लॉन्च: 1996 में।
  • बेस वैल्यू: 1995 को 1000 मानकर।
  • कैलकुलेशन: सेंसेक्स जैसा ही – फ्री-फ्लोट मार्केट कैप से।
  • जनवरी 2026 के शुरू में निफ्टी 26,100-26,300 के आसपास है।

मुख्य अंतर (संक्षेप में टेबल):

विशेषता

सेंसेक्स (Sensex)

निफ्टी (Nifty)

एक्सचेंज

BSE (Bombay Stock Exchange)

NSE (National Stock Exchange)

कंपनियों की संख्या

30

50

सेक्टर्स

13 मुख्य

24+

ब्रॉडनेस

थोड़ा कम (फोकस्ड)

ज्यादा ब्रॉड

लॉन्च ईयर

1986

1996

आम उपयोग

पुराना और ट्रेडिशनल बेंचमार्क

ज्यादा ट्रेडिंग और डेरिवेटिव्स में

क्यों महत्वपूर्ण हैं इंडेक्स?

  • बाजार की दिशा बताते हैं: न्यूज में कहते हैं “आज सेंसेक्स 500 पॉइंट्स गिरा” → मतलब बाजार में गिरावट।
  • इन्वेस्टमेंट का बेंचमार्क: म्यूचुअल फंड या पोर्टफोलियो की परफॉर्मेंस को इंडेक्स से कंपेयर करते हैं। अगर आपका फंड निफ्टी से ज्यादा रिटर्न दे रहा है, तो अच्छा।
  • इंडेक्स फंड/ETF: आप सीधे निफ्टी या सेंसेक्स में निवेश कर सकते हैं (जैसे Nifty Bees ETF) – कम रिस्क, बाजार जितना रिटर्न।
  • ग्लोबल कंपेयर: दुनिया में अमेरिका का Dow Jones या S&P 500 जैसा ही।

उदाहरण से समझें: मान लीजिए आज सेंसेक्स 85,000 से बढ़कर 86,000 हो गया (+1%)। मतलब उन 30 बड़ी कंपनियों के शेयरों का औसत 1% बढ़ा → ज्यादातर निवेशक खुश, बाजार पॉजिटिव। लेकिन अगर कोई छोटी कंपनी का शेयर 10% गिर जाए, तो इंडेक्स पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।

इंडेक्स बाजार का आईना हैं – रोजाना देखें तो पता चलता है कि अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है। शुरुआती निवेशकों के लिए: TV या ऐप पर सेंसेक्स/निफ्टी देखना शुरू करें, धीरे-धीरे समझ आएगा!

3. शेयर बाजार में निवेश के प्रकार :

  • इंट्राडे ट्रेडिंग: एक ही दिन में खरीद-बेच, कोई शेयर रात भर नहीं रखते।
  • स्विंग ट्रेडिंग: कुछ दिनों से हफ्तों तक शेयर रखना।
  • लॉन्गटर्म इन्वेस्टमेंट: सालों तक शेयर रखना, जैसे वॉरेन बफेट की स्टाइल।
  • डेरिवेटिव्स: फ्यूचर्स और ऑप्शंस, जहां आप असली शेयर नहीं खरीदते, बल्कि अनुबंध करते हैं। यह ज्यादा रिस्की है।

4. जोखिम और फायदे (Risks and Benefits):

  • फायदे: हाई रिटर्न (औसतन 10-15% सालाना), मुद्रास्फीति से बेहतर, डिविडेंड इनकम।
  • जोखिम: मार्केट वोलेटिलिटी (उतार-चढ़ाव), आर्थिक मंदी, कंपनी-спेसिफिक रिस्क। कभी-कभी पूरा पैसा डूब सकता है।
  • टिप्स: रिसर्च करें (फंडामेंटल एनालिसिस: कंपनी की बैलेंस शीट देखें; टेक्निकल एनालिसिस: चार्ट्स देखें), डाइवर्सिफाई करें (एक कंपनी में सारा पैसा न लगाएं), और लॉन्ग-टर्म सोचें।

शेयर बाजार अर्थव्यवस्था का आईना है। अगर अर्थव्यवस्था बढ़ रही है (GDP ग्रोथ), तो बाजार ऊपर जाता है। लेकिन ग्लोबल फैक्टर जैसे युद्ध, महामारी (जैसे COVID-19) भी प्रभावित करते हैं।

सारांश में:

  • शेयर खरीदना = कंपनी में पार्टनर बनना।
  • आप कंपनी के मुनाफे और ग्रोथ दोनों का फायदा उठाते हैं।
  • लेकिन अगर कंपनी घाटे में गई या दिवालिया हो गई, तो आपका पैसा भी डूब सकता है (इसलिए रिस्क भी है)।

यह पूरी तरह मालिकाना हक की भावना है – आप अकेले मालिक नहीं हैं, लेकिन लाखों-करोड़ों लोगों के साथ मिलकर कंपनी के मालिक हैं। यही शेयर बाजार की सबसे बुनियादी और खूबसूरत अवधारणा है।

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