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ToggleValmiki Ramayana Bāla Kāṇḍa Chapter 2
रामायण यात्रा – भाग २: जन्म से स्वयंवर तक
श्लोक २१–४० | बालकाण्ड, सर्ग १
यः मूलं त्यजति मूढः स तत्त्वं कथं विजानाति ।
मूलत्यागेन हि नश्यति ज्ञानस्य सर्वसारः ॥
अर्थ:
जो व्यक्ति मूल (आधार, जड़ या मूल कारण) को त्याग देता है, वह तत्व (सत्य या सार) को कैसे जान सकेगा?
मूल को छोड़ देने से ज्ञान का सारा सार नष्ट हो जाता है।
वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड १ में हम १ से लिकर २० श्लोक तक लिखे थे जिस का लिंक निचे दिया गया हे .
“यत्र यत्र राघवः… तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिः” जहाँ-जहाँ राम हैं, वहाँ-वहाँ सिर झुकता है। और रामायण की यात्रा का दूसरा पड़ाव यहीं से शुरू होता है – श्लोक २१ से ४०।
मूल रचयिता कौन हैं? – महर्षि वाल्मीकि
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- नाम: आदि कवि महर्षि वाल्मीकि (पहले रत्नाकर नाम था)
- जन्म: प्राचीन काल में, त्रेता युग से पहले।
- पहले जीवन: डाकू थे। एक दिन नारद मुनि से मिले। नारद जी ने कहा – “अपने पाप का फल परिवार से पूछो।” परिवार ने कहा – “पाप तुम्हारा, फल हम क्यों भोगें?” रत्नाकर को गहरा झटका लगा। वे पश्चाताप करने लगे।
- नाम “वाल्मीकि” कैसे पड़ा? ध्यान में इतने दिन बैठे कि दीमक (वाल्मीक) ने उनका शरीर ढक लिया। बाहर निकले तो नाम पड़ा वाल्मीकि।
- रामायण लिखने की प्रेरणा: एक दिन जंगल में क्रौञ्च पक्षी का जोड़ा देखा। शिकारी ने नर को मार दिया। मादा दुख से चीखी। वाल्मीकि के मुंह से स्वतः निकला:
“मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥”
(हे शिकारी! तूने प्रेमी पक्षी जोड़े में से एक को मार डाला, इसलिए तुझे कभी शांति न मिले।)
यह पहला श्लोक था – शोक से काव्य बना। ब्रह्मा जी आए और बोले: “राम की कथा इसी छन्द में लिखो।” यही रामायण की शुरुआत हुई
यह खंड क्यों खास है?
ये २० श्लोक राम के जीवन की नींव हैं। यहाँ से केवल कहानी नहीं, धर्म, कर्तव्य, और मर्यादा का पाठ शुरू होता है।
| मुख्य घटना | श्लोक | संदेश |
| पुत्रकामेष्टि यज्ञ | २१–२३ | संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ का महत्व |
| चार राजकुमारों का जन्म | २४–२६ | रामनवमी का दिव्य जन्म |
| विश्वामित्र का आगमन | २७–२९ | गुरु की आज्ञा = पिता की आज्ञा |
| ताड़का वध | ३०–३२ | स्त्री हो या पुरुष – अधर्म का नाश जरूरी |
| मिथिला यात्रा | ३३–३५ | सच्चा पुरुषार्थ स्वयंवर में नहीं, मन में होता है |
| शिव-धनुष भंजन | ३६–३७ | सच्ची शक्ति अहंकार नहीं, विनम्रता में है |
| परशुराम संवाद | ३८–४० | क्रोध पर विजय = सच्ची वीरता |
बच्चे क्या सीखें?
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- राम ने १६ साल की उम्र में राक्षसों का संहार किया → उम्र नहीं, इरादे मायने रखते हैं।
- ताड़का वध → गलत काम करने वाले को दंड मिलना चाहिए, चाहे स्त्री हो या पुरुष।
- धनुष तोड़ा, पर घमंड नहीं किया → सच्ची जीत विनम्रता में है।
वयस्कों के लिए गहरा संदेश:
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- दशरथ का यज्ञ → बिना संतान दंपति के लिए आशा की किरण।
- विश्वामित्र की माँग → पुत्र मोह से बड़ा कर्तव्य।
- परशुराम का क्रोध → ज्ञान + शक्ति = खतरा, अगर अहंकार हो।
“राम का जन्म हुए थे धर्म की रक्षा के लिए… और आपका पाठ शुरू हो रहा है – अपने भीतर के राम को जगाने के लिए।”
पढ़ने से पहले १ मिनट का मेडिटेशन:
कल्पना करें – आप अयोध्या के राजमहल में हैं। चार शिशु रो रहे हैं। विश्वामित्र दरवाजे पर हैं। और एक १६ साल का बालक धनुष तोड़ने जा रहा है…
श्लोक २१
इक्ष्वाकुणा च राज्ञा वै पुत्रार्थं यज्ञमाहृतम् । ऋष्यशृङ्गेण सहितो यथाकल्पं प्रचोदितः ॥२१॥
हिन्दी अनुवाद: इक्ष्वाकु वंश के राजा (दशरथ) ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। ऋष्यशृंग मुनि के साथ विधिपूर्वक प्रेरित होकर।
सरल अर्थ: अयोध्या के राजा दशरथ को पुत्र नहीं थे। उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए ऋष्यशृंग मुनि को बुलाया और पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया।
श्लोक २२
ततः प्रसन्नो दाशरथिः प्राप्य तं यज्ञमुत्तमम् । हविः प्राश्य च तद् राजा ददौ पत्नीभ्य एव च ॥२२॥
हिन्दी अनुवाद: उस उत्तम यज्ञ से प्रसन्न होकर दशरथ ने हविष्य (खीर) खाया और अपनी पत्नियों को भी दिया।
सरल अर्थ: यज्ञ पूरा हुआ। एक कटोरी में दिव्य खीर निकली। राजा ने उसे तीनों रानियों – कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी को बाँट दिया।
श्लोक २३
ततः प्रीतिमती राजा ददौ तासां च पायसम् । कौसल्यायै च तद् राजा अर्धं दत्त्वा सुमित्रया ॥२३॥
हिन्दी अनुवाद: राजा ने प्रसन्न होकर खीर बाँटी – कौसल्या को आधा, सुमित्रा को एक चौथाई, और कैकेयी को भी।
सरल अर्थ:
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- कौसल्या को सबसे ज्यादा (आधा) → राम
- कैकेयी को एक चौथाई → भरत
- सुमित्रा को बचा हुआ → लक्ष्मण + शत्रुघ्न
श्लोक २४
ततः काले चिरात् प्राप्य पुत्रान् स चतुरः शुभान् । रामं लक्ष्मणशत्रुघ्नौ भरतं च सुतान् नृपः ॥२४॥
हिन्दी अनुवाद: कुछ समय बाद राजा को चार सुंदर पुत्र हुए – राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत।
सरल अर्थ: यज्ञ का फल मिला। चार राजकुमार पैदा हुए:
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- राम (कौसल्या)
- भरत (कैकेयी)
- लक्ष्मण & शत्रुघ्न (सुमित्रा)
श्लोक २५
ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः । ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥२५॥
हिन्दी अनुवाद: यज्ञ के बाद १२ महीने बीते। चैत्र मास की नवमी तिथि को…
सरल अर्थ: राम का जन्म चैत्र नवरात्रि की नवमी को हुआ। (रामनवमी)
श्लोक २६
नक्षत्रे अदितिदैवत्ये पञ्चसु ग्रहेषु वर्धते । कौसल्याजनयद् रामं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥२६॥
हिन्दी अनुवाद: पुनर्वसु नक्षत्र में, पाँच ग्रह ऊँचे होने पर, कौसल्या ने सभी शुभ लक्षणों वाले राम को जन्म दिया।
सरल अर्थ: शुभ मुहूर्त में, राम का जन्म हुआ। उनका रूप दिव्य था – सभी अच्छे लक्षण।
श्लोक २७
ततः यज्ञसमाप्तौ तु विश्वामित्रो महामुनिः । आगम्य राजसिंहाय दशरथाय न्यवेदयत् ॥२७॥
हिन्दी अनुवाद: यज्ञ खत्म होने पर विश्वामित्र मुनि आए और राजा दशरथ से बोले।
सरल अर्थ: बड़े मुनि विश्वामित्र अयोध्या आए। वे यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षसों से परेशान थे।
श्लोक २८
यज्ञस्य रक्षणार्थाय रामं मे दातुमर्हसि । तद् राक्षसान् हनिष्यामि तव पुत्रेण संयुगे ॥२८॥
हिन्दी अनुवाद: “मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए राम को मुझे दे दो। मैं तुम्हारे पुत्र से राक्षस मारूँगा।”
सरल अर्थ: विश्वामित्र बोले: “राम को मेरे साथ भेजो। वो मेरे यज्ञ की रक्षा करेगा।”
श्लोक २९
स चापि रामो धर्मात्मा सह भ्रात्रा महायशाः । गच्छन् पितुर्वचः श्रुत्वा विश्वामित्रेण संयुतः ॥२९॥
हिन्दी अनुवाद: धर्मात्मा राम, भाई लक्ष्मण के साथ, पिता के वचन सुनकर विश्वामित्र के साथ चले।
सरल अर्थ: दशरथ डरे, लेकिन वशिष्ठ जी ने कहा – “जाओ”। राम–लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ जंगल चले।
श्लोक ३०
ततः तौ रामलक्ष्मणौ विश्वामित्रेण संयुतौ । गच्छन्तौ ददृशाते स्म ताटकाख्यं महद् वनम् ॥३०॥
हिन्दी अनुवाद: राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ चलते हुए ताड़का वन देखा।
सरल अर्थ: रास्ते में एक डरावना जंगल आया – ताड़का का जंगल।
श्लोक ३१
ताटका नाम सा यक्षी क्रूरा विकृतदर्शना । तां हत्वा तौ कुमारौ तु यज्ञरक्षां चकार तु ॥३१॥
हिन्दी अनुवाद: ताड़का नाम की क्रूर यक्षिणी थी। राम ने उसे मार डाला और यज्ञ की रक्षा की।
सरल अर्थ: ताड़का राक्षसी थी। राम ने एक बाण से उसका वध किया।
श्लोक ३२
सुबाहुं चास्य तं हत्वा मारीचं च समुद्रतः । प्रक्षिप्य रामः सहसा यज्ञं ररक्ष सत्वरः ॥३२॥
हिन्दी अनुवाद: सुबाहु को मारकर, मारीच को समुद्र में फेंककर, राम ने यज्ञ की रक्षा की।
सरल अर्थ: दूसरे राक्षस सुबाहु को मार डाला। मारीच को इतना दूर फेंका कि समुद्र में गिरा। यज्ञ सुरक्षित रहा।
श्लोक ३३
ततः यज्ञे समाप्ते तु विश्वामित्रो महामुनिः । रामं प्रोवाच धर्मात्मा गच्छ मिथिलां पुरीम् ॥३३॥
हिन्दी अनुवाद: यज्ञ खत्म होने पर विश्वामित्र बोले – “चलो मिथिला (जनकपुर) चलें।”
सरल अर्थ: यज्ञ पूरा हुआ। विश्वामित्र बोले: “अब सीता का स्वयंवर देखने चलो।”
श्लोक ३४
तत्र द्रक्ष्यसि तं दिव्यं धनुषा यत् समाहितम् । जनकस्य महाराज्ञः तद् द्रष्टुं त्वं व्रज प्रभो ॥३४॥
हिन्दी अनुवाद: “वहाँ शिव का धनुष देखोगे, जो जनक राजा के पास है।”
सरल अर्थ: विश्वामित्र बोले: “मिथिला में भगवान शिव का धनुष है। उसे देखो।”
श्लोक ३५
ततः प्रीतमनाः रामो विश्वामित्रेण संयुतः । गच्छन् पितुर्वचः श्रुत्वा मिथिलां प्राविशद् पुरीम् ॥३५॥
हिन्दी अनुवाद: राम प्रसन्न होकर विश्वामित्र के साथ मिथिला पहुँचे।
सरल अर्थ: राम-लक्ष्मण मिथिला पहुँचे। राजा जनक ने स्वागत किया।
श्लोक ३६
तत्र रामो महातेजा दृष्ट्वा तं धनुषां वरम् । जनकस्य वचः श्रुत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥३६॥
हिन्दी अनुवाद: राम ने शिव-धनुष देखा। जनक बोले – “जो इसे तोड़ेगा, सीता से विवाह करेगा।” राम ने धनुष उठाया।
सरल अर्थ: स्वयंवर की शर्त: “शिव–धनुष तोड़ो, सीता पाओ।” राम ने धनुष उठाया।
श्लोक ३७
तद् धनुः सहसा भङ्क्त्वा रामः सत्यपराक्रमः । जनकस्य प्रियं कृत्वा सीतां लब्ध्वा महायशाः ॥३७॥
हिन्दी अनुवाद: राम ने धनुष एक झटके में तोड़ दिया। जनक खुश हुए, सीता का विवाह राम से हुआ।
सरल अर्थ: खटाक! धनुष टूट गया। जनक बोले: “सीता तुम्हारी!” विवाह तय।
श्लोक ३८
ततः क्रुद्धो महातेजाः परशुरामो महाबलः । आगत्य रामं संरब्धं वचनं चेदमब्रवीत् ॥३८॥
हिन्दी अनुवाद: तब परशुराम क्रोधित होकर आए और राम से बोले।
सरल अर्थ: धनुष टूटने की आवाज सुनकर परशुराम दौड़े आए। गुस्सा होकर बोले: “कौन है?”
श्लोक ३९
श्रुत्वा धनुषि भग्नं मे रामेणाक्लिष्टकर्मणा । अहं त्वां द्रष्टुमिच्छामि कः क्षत्रियकुले भवान् ॥३९॥
हिन्दी अनुवाद: “मेरा धनुष राम ने तोड़ा। बताओ, तुम कौन हो?”
सरल अर्थ: परशुराम बोले: “मेरा धनुष तोड़ा? तुझे देखना है!”
श्लोक ४०
ततो रामः प्रतिज्ञाय परशुरामस्य संनिधौ । धनुषि तस्य भग्ने तु परशुरामो जगाम ह ॥४०॥
हिन्दी अनुवाद: राम ने शांतिपूर्वक जवाब दिया। धनुष टूटने पर परशुराम चले गए।
सरल अर्थ: राम ने विनम्रता से कहा: “मैं दशरथ पुत्र हूँ।” परशुराम शांत हुए और चले गए।
सारांश (श्लोक २१–४०):
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- दशरथ ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया → चार पुत्र (राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न)
- विश्वामित्र आए → राम-लक्ष्मण को ले गए
- ताड़का, सुबाहु वध → यज्ञ रक्षा
- मिथिला गए → शिव–धनुष तोड़ा → सीता विवाह
- परशुराम आए → राम ने शांत किया
अगला सर्ग: राम-सीता का विवाह, अयोध्या लौटना। श्लोक ४१–६० जल्द ह्नि प्रकाश किया जायेगा।!