Tracing Inflation’s Path from 1947 to 2025: Global and Indian Trends, Election Impacts, and Economic Insights.

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racing Inflation's Path from 1947 to 2025: Global and Indian Trends, Election Impacts, and Economic Insights.

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1947 से 2025 तक मुद्रास्फीति का विकास: कारण, प्रभाव और चुनावों का प्रभाव (वैश्विक और भारत के संदर्भ में)|Tracing Inflation’s Path from 1947 to 2025: Global and Indian Trends, Election Impacts, and Economic Insights.

परिचय

मुद्रास्फीति (Inflation) किसी अर्थव्यवस्था में समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में होने वाली सामान्य वृद्धि को दर्शाती है। यह अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू है जो उपभोक्ताओं, व्यवसायों, सरकारों और नीति निर्माताओं को प्रभावित करता है। भारत में, 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से मुद्रास्फीति ने देश की आर्थिक नीतियों, सामाजिक संरचना और वैश्विक स्थिति को प्रभावित किया है। वैश्विक स्तर पर भी, इस अवधि में मुद्रास्फीति ने विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित किया। यह लेख 1947 से 2025 तक भारत और विश्व में मुद्रास्फीति के विकास, इसके कारणों, प्रभावों और चुनावों के प्रभाव का विश्लेषण करता है।

1. मुद्रास्फीति का ऐतिहासिक परिदृश्य (1947-2025)

1.1 भारत में मुद्रास्फीति: 1947 से 1980

1947 में भारत ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की, और इसके साथ ही देश ने अपनी आर्थिक नीतियों को स्वतंत्र रूप से आकार देना शुरू किया। उस समय भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि आधारित थी, और औद्योगिक विकास सीमित था। इस अवधि में मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक थे:

      • कृषि उत्पादन में अनिश्चितता: भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी, और मानसून की अनियमितता के कारण खाद्य उत्पादन में उतार-चढ़ाव होता था। खाद्य पदार्थों की कमी ने कीमतों को बढ़ाया, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई।
      • युद्ध और वैश्विक प्रभाव: 1947-48 में भारत-पाकिस्तान युद्ध और बाद में 1962, 1965 और 1971, 1999 के युद्धों ने रक्षा व्यय को बढ़ाया। इसने सरकारी खर्च को बढ़ाया, जिससे मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि हुई और मुद्रास्फीति बढ़ी।
      • नियोजित अर्थव्यवस्था का प्रभाव: 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना के साथ, भारत ने नियोजित अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ाया। बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास ने सरकारी खर्च को बढ़ाया, जिसने मुद्रास्फीति को प्रभावित किया।

    1950 और 1960 के दशक में, भारत में मुद्रास्फीति की दर अपेक्षाकृत नियंत्रित थी, औसतन 2-4% के बीच। हालांकि, 1970 के दशक में वैश्विक तेल संकट (1973 और 1979) ने भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला। भारत, जो तेल का एक प्रमुख आयातक था, ने तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति का सामना किया। इस दौरान थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति की दर 1974-75 में 25% से अधिक हो गई।

    1.2 1980-1991: आर्थिक सुधारों से पहले

    1980 के दशक में भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाया, जिसमें निजी और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों का योगदान था। इस अवधि में मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक थे:

        • उच्च सरकारी खर्च: सरकार ने बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाया, जिसके लिए घाटे की वित्त व्यवस्था (Deficit Financing) का सहारा लिया गया। इससे मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि हुई और मुद्रास्फीति बढ़ी।
        • खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव: खाद्य पदार्थों की कीमतें, विशेष रूप से अनाज और सब्जियों की कीमतें, मुद्रास्फीति का एक प्रमुख कारक थीं। खराब मानसून और आपूर्ति श्रृंखला की अक्षमताओं ने खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ाया।
        • वैश्विक प्रभाव: 1990-91 में खाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतों में वृद्धि हुई, जिसने भारत की मुद्रास्फीति को और बढ़ाया। इस अवधि में WPI आधारित मुद्रास्फीति 10-12% के बीच रही।

      1.3 1991-2000: आर्थिक उदारीकरण और मुद्रास्फीति

      1991 में भारत ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिसने अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजारों के लिए खोल दिया। इस अवधि में मुद्रास्फीति पर निम्नलिखित कारकों का प्रभाव पड़ा:

          • उदारीकरण और वैश्वीकरण: निजीकरण और विदेशी निवेश ने अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ाया, जिससे मांग-प्रेरित मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई। हालांकि, बेहतर आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने कुछ हद तक कीमतों को नियंत्रित किया।
          • मौद्रिक नीति में सुधार: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीतियों को मजबूत किया। 1990 के दशक में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति औसतन 8-10% रही।
          • खाद्य और तेल की कीमतें: खाद्य पदार्थों और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने मुद्रास्फीति को प्रभावित किया। 1998 में वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि ने भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाला।

        1.4 2000-2014: वैश्विक एकीकरण और चुनौतियां

        2000 के दशक में भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी, और यह अवधि वैश्विक एकीकरण की थी। इस दौरान मुद्रास्फीति पर निम्नलिखित कारकों का प्रभाव रहा:

            • वैश्विक वित्तीय संकट (2008): 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। इस दौरान खाद्य और तेल की कीमतों में वृद्धि ने मुद्रास्फीति को बढ़ाया, जो 2008-09 में 10% से अधिक हो गई।

            • खाद्य मुद्रास्फीति: भारत में खाद्य मुद्रास्फीति इस अवधि में एक प्रमुख चिंता थी। सब्जियों, दालों और खाद्य तेलों की कीमतों में तेज वृद्धि हुई। 2010 में खाद्य मुद्रास्फीति 15% से अधिक थी।

            • मौद्रिक नीति का प्रभाव: RBI ने ब्याज दरों को बढ़ाकर मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने का प्रयास किया। 2011 में RBI ने मौद्रिक नीति को सख्त किया, जिससे आर्थिक विकास पर कुछ हद तक प्रभाव पड़ा।

          1.5 2014-2025: आधुनिक भारत और मुद्रास्फीति

          2014 के बाद, भारत ने कई आर्थिक सुधारों को लागू किया, जैसे जीएसटी (2017) और मेक इन इंडिया। इस अवधि में मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले कारक थे:

              • जीएसटी का प्रभाव: वस्तु और सेवा कर (GST) ने आपूर्ति श्रृंखला को सुव्यवस्थित किया, लेकिन शुरुआती चरण में कुछ वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई।

              • कोविड-19 महामारी (2020): कोविड-19 ने वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और मांग में कमी ने मुद्रास्फीति को प्रभावित किया। 2020 में मुद्रास्फीति 6-7% के बीच रही।

              • वैश्विक मूल्य अस्थिरता: 2022-23 में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण तेल और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हुई, जिसने भारत में मुद्रास्फीति को बढ़ाया। अक्टूबर 2024 में खुदरा मुद्रास्फीति 6.2% थी, जिसमें खाद्य मुद्रास्फीति 10.8% थी।

              • 2025 का अनुमान: 2025 तक, भारत में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए RBI की मौद्रिक नीतियां और सरकार के सक्रिय उपाय महत्वपूर्ण होंगे। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, जैसे तेल की कीमतों और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, के कारण मुद्रास्फीति में उतार-चढ़ाव संभावित है।

            2. वैश्विक मुद्रास्फीति: 1947-2025

            वैश्विक स्तर पर, मुद्रास्फीति को विभिन्न कारकों ने प्रभावित किया, जिनमें युद्ध, आर्थिक नीतियां, तेल संकट और वैश्विक वित्तीय संकट शामिल हैं।

            2.1 1947-1970: युद्धोत्तर पुनर्निर्माण

            द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, कई देशों ने पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू की। इस अवधि में:

                • यूरोप और अमेरिका: युद्ध के बाद यूरोप में पुनर्निर्माण के लिए भारी सरकारी खर्च हुआ, जिसने मुद्रास्फीति को बढ़ाया। अमेरिका में, मार्शल योजना के तहत यूरोप को सहायता दी गई, जिसने मांग को बढ़ाया।
                • तेल की कीमतें: 1973 और 1979 के तेल संकटों ने वैश्विक मुद्रास्फीति को बढ़ाया। विकसित देशों में मुद्रास्फीति की दर 10-15% तक पहुंच गई।

              2.2 1980-2000: वैश्वीकरण का युग

              1980 के दशक में वैश्वीकरण ने मुद्रास्फीति को प्रभावित किया। सस्ते श्रम और उत्पादन ने विकसित देशों में कीमतों को नियंत्रित किया, लेकिन विकासशील देशों में आयात लागत बढ़ी।

                  • एशियाई अर्थव्यवस्थाएं: चीन और भारत जैसे देशों में आर्थिक सुधारों ने मांग को बढ़ाया, जिससे मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई।
                  • वित्तीय नीतियां: विकसित देशों में सख्त मौद्रिक नीतियों ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया। 1990 के दशक में वैश्विक मुद्रास्फीति औसतन 3-5% रही।

                2.3 2000-2025: वैश्विक संकट और नीतियां

                2000 के दशक में वैश्विक वित्तीय संकट (2008) और कोविड-19 ने मुद्रास्फीति को प्रभावित किया। 2022-23 में रूस-यूक्रेन युद्ध ने तेल और खाद्य कीमतों को बढ़ाया, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई। 2025 तक, वैश्विक मुद्रास्फीति के 3-4% के बीच स्थिर होने की उम्मीद है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनाव इसे प्रभावित कर सकते हैं।

                3. मुद्रास्फीति के कारण

                मुद्रास्फीति के कई कारण हैं, जो भारत और विश्व दोनों पर लागू होते हैं:

                    • मांग-प्रेरित मुद्रास्फीति: जब मांग आपूर्ति से अधिक होती है, तो कीमतें बढ़ती हैं। भारत में मध्यम वर्ग की वृद्धि ने मांग को बढ़ाया है।
                    • लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति: कच्चे माल, मजदूरी और तेल की कीमतों में वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ती है, जो उपभोक्ताओं पर हस्तांतरित होती है।
                    • मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि: अधिक मुद्रा छापने से खरीद शक्ति बढ़ती है, जिससे मुद्रास्फीति होती है।
                    • वैश्विक कारक: तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और भू-राजनीतिक घटनाएं मुद्रास्फीति को प्रभावित करती हैं।
                    • प्रशासित मूल्य: भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और पेट्रोल की कीमतें मुद्रास्फीति को प्रभावित करती हैं।

                  4. मुद्रास्फीति के प्रभाव

                  मुद्रास्फीति के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव व्यापक हैं:

                      • बचत पर प्रभाव: मुद्रास्फीति मुद्रा की क्रय शक्ति को कम करती है, जिससे बचत की प्रेरणा कम होती है।
                      • भुगतान संतुलन: निर्यात महंगे और आयात सस्ते होने से भुगतान संतुलन प्रतिकूल होता है।
                      • सार्वजनिक व्यय: सरकार के व्यय में वृद्धि होती है, जिसके लिए करों में वृद्धि की जाती है।
                      • नैतिकता पर प्रभाव: जमाखोरी और भ्रष्टाचार बढ़ता है, जिससे सामाजिक मूल्यों का ह्रास होता है।
                      • उत्पादन पर प्रभाव: उच्च कर और लागत वृद्धि उत्पादन को प्रभावित करती है।

                    5. चुनावों का प्रभाव

                    भारत में चुनावों का मुद्रास्फीति पर सीधा और अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है:

                        • लोकलुभावन नीतियां: चुनावों से पहले सरकारें लोकलुभावन योजनाएं शुरू करती हैं, जैसे मुफ्त राशन या सब्सिडी, जो सरकारी खर्च को बढ़ाती हैं और मुद्रास्फीति को प्रभावित करती हैं।
                        • आर्थिक नीतियों में बदलाव: 2014 और 2019 के आम चुनावों के बाद, मेक इन इंडिया और जीएसटी जैसे सुधारों ने मुद्रास्फीति को प्रभावित किया।
                        • राजनीतिक अनिश्चितता: चुनावों के दौरान नीतिगत अनिश्चितता से निवेश प्रभावित होता है, जो मुद्रास्फीति को बढ़ा सकता है।
                        • 2024 के चुनाव: 2024 के आम चुनावों के दौरान, नीतिगत स्थिरता और आर्थिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद की।

                      6. भारत और विश्व में मुद्रास्फीति की तुलना

                          • भारत: भारत में मुद्रास्फीति मुख्य रूप से खाद्य और तेल की कीमतों पर निर्भर करती है। RBI का लक्ष्य 4% (±2%) मुद्रास्फीति बनाए रखना है।
                          • विश्व: विकसित देशों में, मुद्रास्फीति को मौद्रिक नीतियों और श्रम लागत से नियंत्रित किया जाता है। विकासशील देशों में, यह आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक कीमतों पर निर्भर करता है।

                        7. निष्कर्ष

                        1947 से 2025 तक, भारत और विश्व में मुद्रास्फीति ने कई उतार-चढ़ाव देखे। भारत में खाद्य और तेल की कीमतें, सरकारी नीतियां और वैश्विक कारक मुद्रास्फीति के प्रमुख चालक रहे हैं। वैश्विक स्तर पर, युद्ध, तेल संकट और वित्तीय संकटों ने मुद्रास्फीति को प्रभावित किया। चुनावों ने भारत में लोकलुभावन नीतियों और आर्थिक सुधारों के माध्यम से मुद्रास्फीति को प्रभावित किया। भविष्य में, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक कारक मुद्रास्फीति को आकार देंगे।

                        Read from Wikipedia 

                        racing Inflation’s Path from 1947 to 2025: Global and Indian Trends, Election Impacts, and Economic Insights.

                        मुद्रास्फीति के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

                        1. मुद्रास्फीति क्या है?

                        मुद्रास्फीति (Inflation) वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में समय के साथ होने वाली सामान्य वृद्धि को दर्शाती है। इससे मुद्रा की क्रय शक्ति कम होती है, यानी एक ही राशि से पहले की तुलना में कम सामान खरीदा जा सकता है।

                        2. भारत में मुद्रास्फीति को कैसे मापा जाता है?

                        भारत में मुद्रास्फीति को मुख्य रूप से दो सूचकांकों के माध्यम से मापा जाता है:

                        • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI): यह आम उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बदलाव को मापता है।
                        • थोक मूल्य सूचकांक (WPI): यह थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को मापता है।
                        • CPI को आमतौर पर खुदरा मुद्रास्फीति के लिए उपयोग किया जाता है, और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इसका उपयोग अपनी मौद्रिक नीति के लिए करता है।

                        3. 1947 से 2025 तक भारत में मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक क्या थे?

                        1947 से 2025 तक भारत में मुद्रास्फीति को कई कारकों ने प्रभावित किया:

                        • कृषि उत्पादन: मानसून की अनियमितता और खाद्य आपूर्ति में कमी।
                        • वैश्विक तेल संकट: 1973, 1979 और 2022-23 में तेल की कीमतों में वृद्धि।
                        • सरकारी नीतियां: घाटे की वित्त व्यवस्था, लोकलुभावन योजनाएं और आर्थिक सुधार (जैसे 1991 का उदारीकरण और 2017 का जीएसटी)।
                        • वैश्विक घटनाएं: 2008 का वित्तीय संकट, कोविड-19 महामारी, और रूस-यूक्रेन युद्ध।
                        • मौद्रिक नीति: RBI की ब्याज दरों और मुद्रा आपूर्ति पर नियंत्रण।

                        4. वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति के प्रमुख कारण क्या हैं?

                        वैश्विक मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले कारक हैं:

                        • तेल और कमोडिटी की कीमतें: तेल और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव।
                        • आर्थिक नीतियां: केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियां और सरकारी खर्च।
                        • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला: कोविड-19 जैसे व्यवधानों ने आपूर्ति को प्रभावित किया।
                        • भू-राजनीतिक घटनाएं: युद्ध और व्यापार प्रतिबंध।

                        5. भारत में चुनाव मुद्रास्फीति को कैसे प्रभावित करते हैं?

                        चुनावों का मुद्रास्फीति पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है:

                        • लोकलुभावन नीतियां: सरकारें चुनावों से पहले मुफ्त राशन, सब्सिडी या अन्य योजनाएं शुरू करती हैं, जिससे सरकारी खर्च बढ़ता है और मुद्रास्फीति हो सकती है।
                        • नीतिगत अनिश्चितता: चुनावी अवधि में निवेश और आर्थिक निर्णय प्रभावित होते हैं।
                        • आर्थिक सुधार: 2014 और 2019 के चुनावों के बाद मेक इन इंडिया और जीएसटी जैसे सुधारों ने मुद्रास्फीति को प्रभावित किया।

                        6. खाद्य मुद्रास्फीति भारत में इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

                        भारत में खाद्य मुद्रास्फीति महत्वपूर्ण है क्योंकि:

                        • उपभोक्ता खर्च का बड़ा हिस्सा: भारतीय परिवार अपने आय का एक बड़ा हिस्सा खाद्य पदार्थों पर खर्च करते हैं।
                        • कृषि पर निर्भरता: खाद्य उत्पादन मानसून और आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर करता है।
                        • कीमतों में उतार-चढ़ाव: सब्जियों, दालों और तेल की कीमतों में तेजी से बदलाव होता है।
                          उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2024 में खाद्य मुद्रास्फीति 10.8% थी।

                        7. मुद्रास्फीति के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव क्या हैं?

                        मुद्रास्फीति के कई प्रभाव हैं:

                        • क्रय शक्ति में कमी: उपभोक्ता कम सामान खरीद पाते हैं।
                        • बचत पर प्रभाव: मुद्रा का मूल्य कम होने से बचत की प्रेरणा कम होती है।
                        • आय असमानता: निम्न-आय वर्ग अधिक प्रभावित होता है।
                        • उत्पादन पर प्रभाव: लागत वृद्धि से व्यवसायों का मुनाफा कम होता है।
                        • नैतिकता पर प्रभाव: जमाखोरी और कालाबाजारी बढ़ सकती है।

                        8. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) मुद्रास्फीति को कैसे नियंत्रित करता है?

                        RBI मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय करता है:

                        • ब्याज दरें: रेपो दर बढ़ाकर मांग को कम करना।
                        • मुद्रा आपूर्ति नियंत्रण: खुले बाजार संचालन (OMO) के माध्यम से।
                        • मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण: RBI का लक्ष्य CPI आधारित मुद्रास्फीति को 4% (±2%) के दायरे में रखना है।

                        9. 2025 में भारत और विश्व में मुद्रास्फीति की क्या स्थिति हो सकती है?

                        • भारत: 2025 में मुद्रास्फीति को खाद्य और तेल की कीमतें, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं प्रभावित करेंगी। RBI की नीतियां और सरकारी सुधार इसे 4-6% के दायरे में रखने का प्रयास करेंगे।
                        • विश्व: वैश्विक मुद्रास्फीति 3-4% के बीच स्थिर हो सकती है, लेकिन तेल की कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव और जलवायु परिवर्तन इसे प्रभावित कर सकते हैं।

                        10. आम लोग मुद्रास्फीति से कैसे बचाव कर सकते हैं?

                        मुद्रास्फीति से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

                        • निवेश: शेयर, म्यूचुअल फंड या सोने जैसे परिसंपत्तियों में निवेश करें, जो मुद्रास्फीति से बेहतर रिटर्न दे सकें।
                        • बजट प्रबंधन: खर्चों को नियंत्रित करें और आवश्यक वस्तुओं पर ध्यान दें।
                        • आय विविधीकरण: अतिरिक्त आय स्रोत विकसित करें।
                        • वित्तीय शिक्षा: मुद्रास्फीति और निवेश के बारे में जागरूकता बढ़ाएं।

                        11. भारत में मुद्रास्फीति और वैश्विक मुद्रास्फीति में क्या अंतर है?

                        • भारत: खाद्य और तेल की कीमतों पर अधिक निर्भर, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला की अक्षमताएं।
                        • विश्व: विकसित देशों में श्रम लागत और मौद्रिक नीतियां प्रमुख कारक हैं, जबकि विकासशील देशों में आयात और वैश्विक कीमतें प्रभाव डालती हैं।

                        12. क्या मुद्रास्फीति हमेशा हानिकारक होती है?

                        नहीं, मध्यम मुद्रास्फीति (2-4%) अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी हो सकती है क्योंकि:

                        • यह मांग को प्रोत्साहित करती है।
                        • व्यवसायों को निवेश के लिए प्रेरित करती है।
                        • आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है।
                          हालांकि, उच्च मुद्रास्फीति (10% से अधिक) क्रय शक्ति और आर्थिक स्थिरता को नुकसान पहुंचाती है।

                        13. जीएसटी (GST) ने भारत में मुद्रास्फीति को कैसे प्रभावित किया?

                        2017 में लागू जीएसटी ने आपूर्ति श्रृंखला को सुव्यवस्थित किया, जिससे लंबे समय में कुछ वस्तुओं की कीमतें कम हुईं। हालांकि, शुरुआती चरण में कुछ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ीं, जिसने अल्पकालिक मुद्रास्फीति को प्रभावित किया।

                        14. कोविड-19 ने मुद्रास्फीति को कैसे प्रभावित किया?

                        कोविड-19 ने आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान पैदा किया, जिससे खाद्य और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ीं। 2020 में भारत में मुद्रास्फीति 6-7% रही, जबकि वैश्विक स्तर पर भी आपूर्ति की कमी ने मुद्रास्फीति को बढ़ाया।

                        15. भविष्य में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए भारत को क्या करना चाहिए?

                        • कृषि सुधार: खाद्य उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में सुधार।
                        • ऊर्जा स्वतंत्रता: नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान देना ताकि तेल की कीमतों पर निर्भरता कम हो।
                        • मौद्रिक नीति: RBI को मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण को मजबूत करना चाहिए।
                        • वैश्विक सहयोग: वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को स्थिर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग।

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