The real reason for Indias freedom

The Real reason for Indias Freedom .

नमस्कार दोस्तों,

स्कूल की किताबों में हमें बचपन से यही पढ़ाया जाता है कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू सबसे महान थे। गांधीजी की अहिंसा, सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिशों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। नेहरू जी स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने और देश को एकजुट किया। लेकिन क्या यह पूरी कहानी है? नहीं! असल में, भारत की आजादी में सुभाष चंद्र बोस (नेताजी) और आजाद हिंद फौज (INA) की भूमिका बहुत बड़ी थी – इतनी बड़ी कि ब्रिटिश खुद मानते थे कि उनकी सेना अब उनके कंट्रोल में नहीं रही।

यह ब्लॉग उस “असली सच” को सामने लाने के लिए है, जो NCERT किताबों में कम या गलत तरीके से दिखाया जाता है।

स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है?

  • गांधीजी का भारत छोड़ो आंदोलन (1942): “Do or Die” का नारा, लाखों लोग सड़कों पर, ब्रिटिशों ने दमन किया, लेकिन यह आंदोलन ब्रिटिशों को morally कमजोर कर दिया।
  • नेहरू जी: कांग्रेस के नेता, गांधीजी के उत्तराधिकारी, स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख चेहरा।
  • नेताजी और INA: सिर्फ 2-3 पेज या कुछ लाइनें – “दिल्ली चलो”, “जय हिंद” जैसे नारे, INA का जापान के साथ मिलकर लड़ना, लेकिन इसका असर “सीमित” बताया जाता है।

NCERT किताबों में नेताजी का कवरेज बहुत कम है – क्लास 12 में सिर्फ 87 शब्दों में उनका जिक्र, क्लास 8 में कभी-कभी बिल्कुल नहीं। क्रांतिकारियों और INA ट्रायल्स का विस्तार भी कम। यह “कांग्रेस-केंद्रित” इतिहास है, जो 1947 के बाद से चला आ रहा है।

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असली इतिहास क्या कहता है?

दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन कमजोर हो चुका था – आर्थिक रूप से टूटा, सेना थकी। लेकिन भारत पर कंट्रोल रखने की कोशिश जारी थी। 1945 में INA के कैद सैनिकों पर रेड फोर्ट ट्रायल्स शुरू हुए। तीन प्रमुख अधिकारी – प्रेम सहगल (हिंदू), शाहनवाज खान (मुस्लिम), गुरबख्श सिंह ढिल्लों (सिख) – पर देशद्रोह का मुकदमा।

INA क्या है?

INA का पूरा नाम Indian National Army (इंडियन नेशनल आर्मी) है, जिसे हिंदी में आजाद हिंद फौज या आज़ाद हिंद फ़ौज कहा जाता है। यह द्वितीय विश्व युद्ध (1942-1945) के दौरान गठित एक सशस्त्र सेना थी, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत को ब्रिटिश राज से आजाद कराना था।

यह फौज जापान की मदद से बनी थी, और इसका नेतृत्व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने किया। INA ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी के उन भारतीय सैनिकों को शामिल किया जो जापानी सेना द्वारा युद्धबंदी (POWs) बनाए गए थे, साथ ही दक्षिण-पूर्व एशिया (सिंगापुर, मलाया, बर्मा) में रहने वाले भारतीय नागरिक भी।

INA की स्थापना और इतिहास

  • पहली INA (First INA): 1942 में कैप्टन मोहन सिंह ने सिंगापुर में गठित की। जापान ने सिंगापुर पर कब्जा करने के बाद ब्रिटिश इंडियन आर्मी के 40,000-45,000 भारतीय सैनिकों को कैद किया। मोहन सिंह ने इन्हें संगठित किया, लेकिन जापानियों से मतभेद होने पर यह फौज दिसंबर 1942 में भंग हो गई।
  • दूसरी INA (Second INA): 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कमान संभाली। उन्होंने जर्मनी से पनडुब्बी और जापान पहुंचकर इसे पुनर्गठित किया। 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार (Provisional Government of Free India) की स्थापना की, जो INA की सरकार थी। बोस खुद इसके राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष थे।
  • सैनिकों की संख्या: लगभग 40,000-85,000 (विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग अनुमान)।
  • विशेषता: इसमें रानी झांसी रेजिमेंट नामक महिला इकाई थी (कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में) – यह महिलाओं की सशस्त्र भागीदारी का ऐतिहासिक उदाहरण था। फौज में हिंदू, मुस्लिम, सिख, सभी धर्मों के लोग थे – राष्ट्रीय एकता का प्रतीक।
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INA ट्रायल्स (Red Fort Trials) का विस्तार

INA ट्रायल्स, जिन्हें रेड फोर्ट ट्रायल्स भी कहा जाता है, 1945-46 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी द्वारा आयोजित कोर्ट-मार्शल थे। ये ट्रायल्स आजाद हिंद फौज (INA) के अधिकारियों पर लगाए गए थे, जिन पर देशद्रोह (treason), हत्या, यातना और हत्या में सहायता जैसे आरोप थे। ये ट्रायल्स नवंबर 1945 से मई 1946 तक चले, और दिल्ली के लाल किले (Red Fort) में हुए – जो ब्रिटिशों के लिए प्रतीकात्मक था (1857 की क्रांति और बहादुर शाह जफर के ट्रायल की याद दिलाता था ।

पहला प्रमुख ट्रायल

यह ट्रायल 5 नवंबर 1945 को शुरू हुआ और 3 जनवरी 1946 तक चला। इसमें तीन प्रमुख INA अधिकारी आरोपी थे:

  • प्रेम कुमार सहगल (हिंदू, कर्नल, 2nd Battalion, 10th Baluch Regiment),
  • शाहनवाज खान (मुस्लिम, मेजर जनरल, 1st Battalion, 14th Punjab Regiment),
  • गुरबख्श सिंह ढिल्लों (सिख, लेफ्टिनेंट)।

आरोप थे:

  • ब्रिटिश राजा-सम्राट के खिलाफ युद्ध छेड़ना (IPC की धारा 121 + इंडियन आर्मी एक्ट),
  • POWs (युद्धबंदियों) को INA में शामिल होने के लिए मजबूर करना,
  • मार्च 1945 में 5 INA जवानों की हत्या या यातना (जो ब्रिटिशों के पास वापस जाना चाहते थे)।

प्रॉसीक्यूशन (आरोप लगाने वाली तरफ) की कमान सर नौशीरवान पी. इंजीनियर (एडवोकेट जनरल ऑफ इंडिया) के पास थी। डिफेंस (बचाव पक्ष) की कमान INA डिफेंस कमिटी (कांग्रेस द्वारा बनाई गई) के पास थी। मुख्य वकील थे भूलाभाई देसाई, जवाहरलाल नेहरू, तेज बहादुर सप्रू, असफ अली, कैलाश नाथ काटजू आदि। भूलाभाई देसाई ने तर्क दिया कि INA एक वैध सेना थी (आजाद हिंद सरकार के तहत), और उपनिवेशित लोगों को आजादी के लिए लड़ने का अधिकार है। उन्होंने इसे अमेरिका के जॉर्ज वॉशिंगटन की सेना से तुलना की।

के तहत), और उपनिवेशित लोगों को आजादी के लिए लड़ने का अधिकार है। उन्होंने इसे अमेरिका के जॉर्ज वॉशिंगटन की सेना से तुलना की।

24 नवंबर 1945 को फील्ड मार्शल क्लॉड ऑचिनलेक (Claude Auchinleck), जो उस समय ब्रिटिश इंडियन आर्मी के कमांडर-इन-चीफ थे, ने वायसराय लॉर्ड वेवेल (Lord Wavell) को एक गोपनीय पत्र/रिपोर्ट/मेमो भेजा था। यह दस्तावेज़ मुख्य रूप से इंडियन नेशनल आर्मी (INA) के ट्रायल्स (Red Fort Trials) और भारतीय जनता तथा सेना में उसके प्रभाव पर केंद्रित था।

पत्र का मुख्य संदर्भ और पृष्ठभूमि

ऑचिनलेक ने इस रिपोर्ट में वेवेल को चेतावनी दी थी कि:

  • INA ट्रायल्स पूरे भारत की जनता को गहराई से उत्तेजित कर रहे हैं, सभी वर्गों (sections of Indian public opinion) में।
  • यदि सजा को लागू करने की कोशिश की गई, तो देशव्यापी अराजकता (chaos) फैल सकती है।
  • सेना में विद्रोह (mutiny) और असंतोष (dissension) का खतरा है, जो अंततः ब्रिटिश इंडियन आर्मी के विघटन (dissolution) तक पहुंच सकता है।
  • भारतीय सेना की वफादारी (loyalty) पर गंभीर संकट है, खासकर भारतीय अधिकारियों और सैनिकों में राष्ट्रवादी भावनाएं मजबूत हो रही हैं।
  • कांग्रेस पार्टी को यह INA मुद्दा चुनावों में एक शानदार नारा (excellent election cry) बन गया है।

ऑचिनलेक ने सलाह दी कि सख्त सजा देने के बजाय नरमी (leniency) बरती जाए, ताकि सेना की एकता और ब्रिटिश हितों की रक्षा हो सके।

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आरआईएन विद्रोह (Royal Indian Navy Mutiny / RIN Revolt) का भूमिका

आरआईएन विद्रोह 1946 का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी, जिसे नौसेना विद्रोह या नेवल अपराइजिंग भी कहा जाता है। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा हिस्सा था जिसने ब्रिटिशों को एहसास कराया कि उनकी सेना अब उनके कंट्रोल में नहीं रही। यह विद्रोह 18 फरवरी 1946 को शुरू हुआ और सिर्फ 5-6 दिनों में दबा दिया गया, लेकिन इसका प्रभाव बहुत गहरा था। इसे कई इतिहासकार “भारत की आजादी का अंतिम युद्ध” या “ब्रिटिश राज की कब्र में आखिरी कील” कहते हैं।

मुख्य कारण (Causes)

  • नस्लीय भेदभाव और खराब व्यवहार: ब्रिटिश अधिकारी भारतीय नाविकों (ratings) के साथ बहुत बुरा व्यवहार करते थे। भारतीयों को कम वेतन, खराब खाना, खराब आवास और अपमानजनक भाषा का सामना करना पड़ता था। ब्रिटिश नाविकों से तुलना में भारतीयों को कम सुविधाएं मिलती थीं।
  • INA ट्रायल्स का प्रभाव: 1945-46 में INA (आजाद हिंद फौज) के ट्रायल्स ने पूरे देश में आक्रोश फैलाया। नाविकों ने INA को “देशभक्त” माना और ब्रिटिशों को “गद्दार” कहने वाले INA सैनिकों की सजा से गुस्सा बढ़ा।
  • युद्ध के बाद की असंतोष: WWII में भारतीय नाविकों ने ब्रिटिशों के लिए लड़ाई लड़ी, लेकिन युद्ध खत्म होने पर उन्हें कोई विशेष सम्मान या बेहतर सुविधा नहीं मिली। कुछ नाविकों ने HMIS Talwar पर “Quit India” और राष्ट्रवादी नारे लिखे, जिसके लिए सजा मिली।
  • ट्रिगर: फरवरी 1946 में HMIS Talwar (बॉम्बे में सिग्नल स्कूल) में BC Dutt नामक नाविक ने “Quit India” लिखा, जिसके लिए उसे गिरफ्तार किया गया। इससे नाविकों का गुस्सा फूट पड़ा।

मुख्य घटनाएं और टाइमलाइन 

  • 18 फरवरी 1946: HMIS Talwar (बॉम्बे में) के करीब 1,100 नाविकों ने भूख हड़ताल शुरू की। नारा था “No Food, No Work”। उन्होंने ब्रिटिश कमांडर FW King (जो नस्लवादी था) के खिलाफ शिकायत की और बेहतर खाना, वेतन, INA कैदियों की रिहाई जैसी मांगें रखीं।
  • 19 फरवरी: विद्रोह फैला। नाविकों ने HMIS Talwar पर कब्जा कर लिया, अधिकारियों को बाहर निकाला। वे जहाजों से जहाजों पर घूमकर अन्य नाविकों को शामिल किया। बॉम्बे हार्बर में 22 जहाजों पर कब्जा हो गया।
  • 20 फरवरी: विद्रोह पूरे बॉम्बे हार्बर में फैल गया। 45 युद्धपोत, 10-12 शोर एस्टेब्लिशमेंट, 11 सहायक जहाज और 4 फ्लोटिला – कुल 10,000-20,000 नाविक शामिल हो गए। नाविकों ने Naval Central Strike Committee बनाई (नेता: M.S. Khan, BC Dutt, Salil Shyam, Madan Singh आदि)। उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के झंडे फहराए, लेकिन बाद में निराशा में सिर्फ लाल झंडे रखे।
  • 21-22 फरवरी: विद्रोह पूरे भारत में फैला – कराची, कलकत्ता, मद्रास, विजाग, कोचीन, दिल्ली आदि। कराची में HMS Hindustan, Travancore आदि जहाज शामिल। बॉम्बे में आम लोग, मजदूर, छात्र सड़कों पर उतरे। कम्युनिस्ट पार्टी ने समर्थन दिया, लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने विरोध किया (वे हिंसा से डरते थे)। पुलिस फायरिंग से 220+ मौतें, 1,000+ घायल।
  • 23 फरवरी 1946: ब्रिटिशों ने दबाव डाला। सरदार पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना ने नाविकों से सरेंडर करने को कहा (उन्हें आश्वासन दिया कि कोई सजा नहीं मिलेगी)। विद्रोह खत्म हो गया।

परिणाम और प्रभाव (Consequences & Impact)

  • ब्रिटिशों पर झटका: ब्रिटिश कमांडरों (जैसे ऑचिनलेक) को एहसास हुआ कि भारतीय सेना (नेवी, आर्मी, एयर फोर्स) अब वफादार नहीं। यह INA ट्रायल्स के बाद दूसरा बड़ा झटका था।
  • सजा: 476 नाविकों को निकाला गया, कोर्ट-मार्शल हुए। आजादी के बाद भारतीय या पाकिस्तानी नेवी में उन्हें जगह नहीं मिली।
  • स्वतंत्रता पर प्रभाव: ब्रिटिश PM क्लेमेंट एटली ने कैबिनेट मिशन (1946) भेजा। कई इतिहासकार कहते हैं कि यह विद्रोह ने ब्रिटिशों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया – सेना के बिना राज नहीं चल सकता।
  • जनता का समर्थन: बॉम्बे में लाखों लोग सड़कों पर उतरे। यह हिंदू-मुस्लिम एकता का उदाहरण था (नाविकों में सभी धर्मों के लोग थे)।

अन्य ट्रायल्स

कुल 10-12 ट्रायल्स नवंबर 1945 से मई 1946 तक चले। इनमें अन्य आरोपी थे जैसे: अब्दुल राशिद, शिंगारा सिंह, फतेह खान, कैप्टन मलिक मुनव्वर खान अवान, कैप्टन अल्लाह यार खान आदि।

पहले ट्रायल के बाद जनता के विरोध से देशद्रोह (treason) का आरोप हटा दिया गया। बाद के ट्रायल्स में सिर्फ रैंक कटौती या आर्मी से निकालने की सजा हुई। ब्रिटिशों ने बाकी ट्रायल्स बंद कर दिए, क्योंकि राष्ट्रवादी आंदोलन और सेना में असंतोष बहुत बढ़ गया था।

ये ट्रायल्स ने INA को “देशभक्त” बनाया और ब्रिटिशों को एहसास कराया कि वे भारत पर अब नियंत्रण नहीं रख सकते। इससे RIN विद्रोह (फरवरी 1946) हुआ और आजादी का रास्ता तेज हुआ।

INA ट्रायल्स के प्रमुख प्रभाव और परिणाम

INA ट्रायल्स (1945-46) ने ब्रिटिश राज की नींव को हिला दिया। ये ट्रायल्स सिर्फ कानूनी मुकदमे नहीं थे, बल्कि उन्होंने पूरे देश में राष्ट्रवादी भावना को भड़काया, सेना में असंतोष फैलाया और ब्रिटिशों को एहसास कराया कि वे भारत पर अब नियंत्रण नहीं रख सकते। नीचे विस्तार से समझते हैं कि इन ट्रायल्स के क्या बड़े प्रभाव और परिणाम हुए:

  1. जनता पर प्रभाव: अभूतपूर्व एकता और राष्ट्रवाद की लहर

ट्रायल्स ने पूरे भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों को एकजुट कर दिया। INA के सैनिकों को “देशद्रोही” नहीं, बल्कि “देशभक्त” माना जाने लगा।

  • देशभर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन, हड़तालें और जुलूस निकले। कलकत्ता (अब कोलकाता) में हिंसा हुई, जहां पुलिस फायरिंग से दर्जनों मौतें हुईं।
  • लोगों ने INA को हीरो मानकर जश्न मनाया – फूल मालाएं, मिठाइयां बांटी गईं।
  • यह पहली बार था जब इतनी बड़ी संख्या में लोग एक मुद्दे पर एकजुट हुए, जो हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बना।
  • परिणाम: ब्रिटिशों की “divide and rule” नीति कमजोर हुई, और जनता में आजादी की भावना और मजबूत हुई।
  1. सेना पर प्रभाव: वफादारी टूटना और विद्रोह की शुरुआत

ट्रायल्स ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी की मुख्य ताकत – भारतीय सैनिकों की वफादारी – को गहरा झटका दिया।

  • फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी (RIN) विद्रोह हुआ – बॉम्बे में 20,000 से ज्यादा नाविकों ने 78 जहाजों पर कब्जा कर लिया। यह INA ट्रायल्स से सीधे प्रेरित था। नाविकों ने “जय हिंद” और INA के नारे लगाए। विद्रोह कराची, कलकत्ता, मद्रास तक फैला।
  • RIN विद्रोह के बाद जबलपुर (Jubbulpore) में आर्मी म्यूटिनी (फरवरी-मार्च 1946) हुई। सिग्नल ट्रेनिंग सेंटर में भारतीय सैनिकों ने विद्रोह किया – बेहतर वेतन, भेदभाव खत्म करने और INA कैदियों की रिहाई की मांग की। ब्रिटिशों ने इसे दबाया, लेकिन 45 से ज्यादा लोगों पर कोर्ट-मार्शल चला।
  • अन्य जगहों पर भी छोटे-मोटे असंतोष हुए, जैसे रॉयल इंडियन एयर फोर्स (RIAF) में।
  • परिणाम: ब्रिटिशों को डर लगा कि उनकी सेना (आर्मी, नेवी, एयर फोर्स) अब भरोसेमंद नहीं रही। सेना ब्रिटिश राज की रीढ़ थी – अगर वह टूट जाए, तो राज टिक नहीं सकता।
  1. ब्रिटिश निर्णय पर प्रभाव: नियंत्रण खोने का डर

ट्रायल्स ने ब्रिटिशों को मजबूर किया कि वे सख्ती नहीं दिखा सकते।

  • फील्ड मार्शल क्लॉड ऑचिनलेक ने जनवरी 1946 में सजाएं कम कीं और तीनों प्रमुख अधिकारियों (सहगल, शाहनवाज, ढिल्लों) को रिहा कर दिया। उनकी गोपनीय रिपोर्ट (24 नवंबर 1945) में स्पष्ट लिखा था कि सजा लागू करने से देशव्यापी अराजकता, सेना में विद्रोह और आर्मी का विघटन हो सकता है।
  • ब्रिटिश PM क्लेमेंट एटली ने 1956 में (कलकत्ता में जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती से बातचीत में) माना कि INA और उसके ट्रायल्स ने भारतीय सेना में वफादारी खत्म की, जिससे ब्रिटिशों को भारत छोड़ना पड़ा। उन्होंने Quit India Movement को “minimal” (बहुत कम) प्रभाव वाला बताया।
  • इतिहासकार Peter Fay (“The Forgotten Army”) और Sumit Sarkar ने लिखा कि INA ट्रायल्स ने ब्रिटिशों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया – Quit India से ज्यादा प्रभावी। ट्रायल्स के बाद कैबिनेट मिशन (1946) भेजा गया, जो आजादी की दिशा में बड़ा कदम था।
  • परिणाम: ब्रिटिशों को लगा कि सेना के बिना राज नहीं चलेगा। WWII से पहले से कमजोर ब्रिटेन अब भारत पर कंट्रोल नहीं रख सकता था।
  1. स्वतंत्रता पर कुल प्रभाव: आजादी को तेज करना
  • INA ट्रायल्स ने 1945-46 में जो आग लगाई, वह 1947 की आजादी तक नहीं बुझी।
  • यह घटनाएं ब्रिटिशों को convince करने वाली थीं कि भारत अब “शांत” कॉलोनी नहीं रहा।
  • कई इतिहासकार मानते हैं कि INA ट्रायल्स + RIN विद्रोह ने ब्रिटिश निकासी को accelerate (तेज) किया – बिना इनके आजादी में और देरी हो सकती थी।
  • NCERT किताबों में इनका विस्तार कम है – सिर्फ slogans और संक्षिप्त जिक्र। पूरा प्रभाव (सेना में विद्रोह, ब्रिटिश डर) अक्सर छिपाया या कम करके बताया जाता है, जबकि ये स्वतंत्रता संग्राम के निर्णायक मोड़ थे।

संक्षेप में, INA ट्रायल्स ने साबित किया कि ब्रिटिश राज अब टिकाऊ नहीं। जनता की एकता, सेना की बगावत और ब्रिटिशों का डर – ये सब मिलकर 1947 की आजादी का रास्ता साफ कर दिया।

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