The Formation of Earth: Insights from Indian Vedas and Modern Science

पृथ्वी का निर्माण: वेदों, पुराणों और आधुनिक विज्ञान की रोशनी में|The Formation of Earth: Insights from Indian Vedas and Modern Science

पृथ्वी का निर्माण एक ऐसा विषय है जो न केवल वैज्ञानिकों और खगोलशास्त्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है, बल्कि भारतीय संस्कृति और वेदों में भी इसका गहन और दार्शनिक विवरण मिलता है। भारतीय वेदों और पुराणों में पृथ्वी के निर्माण की कहानी भगवान की सृष्टि और उनकी लीलाओं से जुड़ी हुई है, जबकि आधुनिक विज्ञान इसे ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं और भौतिकी के नियमों के आधार पर समझाता है। इस लेख में हम भारतीय वेदों, पुराणों और आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से पृथ्वी के निर्माण की कहानी विस्तार से समझेंगे।

भारतीय वेदों और पुराणों में पृथ्वी का निर्माण

भारतीय दर्शन और धर्मग्रंथों में पृथ्वी को एक पवित्र और जीवंत इकाई माना गया है, जिसे “भूमि” या “पृथ्वी माता” कहा जाता है। वेद, पुराण, और उपनिषद जैसे प्राचीन ग्रंथों में सृष्टि के निर्माण की कहानी को विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया गया है। इन ग्रंथों में सृष्टि का निर्माण भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिमूर्ति के कार्यों से जुड़ा हुआ है।

ऋग्वेद में सृष्टि का उल्लेख

ऋग्वेद, जो भारतीय साहित्य का सबसे प्राचीन ग्रंथ है, में सृष्टि के निर्माण का उल्लेख नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10.129) में मिलता है। यह सूक्त सृष्टि के प्रारंभिक अवस्था का वर्णन करता है, जब न सत् था, न असत्, न दिन था, न रात। यह सूक्त कहता है:

“नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥”

अर्थात, उस समय न सत्य था, न असत्य, न आकाश था, न अंतरिक्ष। क्या था जो छिपा हुआ था? कहां था? किसके संरक्षण में? क्या वह गहन और गहरा जल था? इस सूक्त में सृष्टि के प्रारंभिक रहस्य को दार्शनिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। यह बताता है कि सृष्टि की उत्पत्ति एक ऐसी अवस्था से हुई, जो मानव बुद्धि के लिए अबूझ है।

पुराणों में पृथ्वी का निर्माण

पुराणों में पृथ्वी के निर्माण की कहानी को और विस्तार से बताया गया है। विष्णु पुराण, भागवत पुराण, और ब्रह्म पुराण जैसे ग्रंथों में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालक और ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता माना गया है। विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने अपनी माया से सृष्टि की रचना की। उन्होंने सबसे पहले जल (नार) का निर्माण किया, जिसमें वे स्वयं शेषनाग पर शयन करते हैं। इसीलिए उन्हें नारायण कहा जाता है।

इसके बाद, भगवान विष्णु के नाभि-कमल से ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना शुरू की। उन्होंने पंचमहाभूतों—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—का निर्माण किया। पृथ्वी को एक स्थिर और जीवन को पोषित करने वाली इकाई के रूप में बनाया गया। भागवत पुराण में यह भी उल्लेख है कि पृथ्वी का निर्माण भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा किया गया। जब पृथ्वी हिरण्याक्ष नामक असुर द्वारा रसातल में ले जाई गई, तब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर पृथ्वी को जल से बाहर निकाला और उसे स्थापित किया।

पृथ्वी माता का महत्व

भारतीय दर्शन में पृथ्वी को माता के रूप में पूजा जाता है। अथर्ववेद में “पृथ्वी सूक्त” (12.1) में पृथ्वी को माता के रूप में संबोधित किया गया है, जो सभी प्राणियों को आश्रय, भोजन और जीवन प्रदान करती है। यह सूक्त कहता है:

“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”

अर्थात, पृथ्वी मेरी माता है, और मैं उसका पुत्र हूं। यह दृष्टिकोण पृथ्वी के प्रति श्रद्धा और सम्मान को दर्शाता है।

सृष्टि के चक्र और युग

भारतीय दर्शन में सृष्टि को चक्रीय माना गया है। एक युग (कल्प) के अंत में सृष्टि का प्रलय होता है, और फिर नए सिरे से सृष्टि की रचना होती है। मनुस्मृति और पुराणों में चार युगों—सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग—का उल्लेख है। प्रत्येक युग में पृथ्वी की स्थिति और प्राणियों का स्वभाव बदलता है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार पृथ्वी का निर्माण

आधुनिक विज्ञान पृथ्वी के निर्माण को ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं और भौतिकी के नियमों के आधार पर समझाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले हुई थी, जब सौर मंडल का निर्माण हुआ। आइए, इस प्रक्रिया को विस्तार से समझें।

बिग बैंग सिद्धांत

आधुनिक खगोलशास्त्र के अनुसार, ब्रह्मांड की उत्पत्ति लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले बिग बैंग नामक एक विशाल विस्फोट से हुई। इस विस्फोट के बाद ऊर्जा, कण और गैसें फैलने लगीं, जो बाद में तारों, आकाशगंगाओं और ग्रहों के निर्माण का आधार बनीं। बिग बैंग के बाद ब्रह्मांड में हाइड्रोजन और हीलियम जैसे हल्के तत्व प्रचुर मात्रा में थे।

सौर मंडल का निर्माण

लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले, एक विशाल गैस और धूल के बादल (नेबुला) में गुरुत्वाकर्षण के कारण संकुचन शुरू हुआ। इस प्रक्रिया में सूर्य का निर्माण हुआ, जो इस बादल के केंद्र में एक तारा बन गया। सूर्य के चारों ओर बचे हुए पदार्थ एक चपटी डिस्क के रूप में घूमने लगे, जिसे प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क कहा जाता है। इस डिस्क में छोटे-छोटे कण आपस में टकराकर और जुड़कर बड़े पिंडों में बदल गए। इन पिंडों को “प्लैनेटेसिमल्स” कहा जाता है।

पृथ्वी की उत्पत्ति

प्लैनेटेसिमल्स के आपसी टकराव और एकीकरण से ग्रहों का निर्माण हुआ, जिनमें पृथ्वी भी शामिल थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी का निर्माण कई चरणों में हुआ:

      1. प्रारंभिक निर्माण: पृथ्वी शुरू में एक गर्म और पिघला हुआ पिंड थी। इस अवस्था में, भारी तत्व जैसे लोहा और निकल पृथ्वी के केंद्र में डूब गए, जिससे पृथ्वी का कोर बना। हल्के तत्व जैसे सिलिकॉन और ऑक्सीजन ऊपरी परतों में रहे, जिससे मेंटल और क्रस्ट बने।
      2. लेट हेवी बॉम्बार्डमेंट: पृथ्वी के निर्माण के शुरुआती दौर में, लगभग 4.1 से 3.8 अरब वर्ष पहले, सौर मंडल में उल्कापिंडों और धूमकेतुओं की भारी बमबारी हुई। इस दौरान पृथ्वी पर पानी और कार्बनिक यौगिकों की आपूर्ति हुई, जो जीवन के लिए आवश्यक थे।
      3. वायुमंडल का विकास: शुरुआती पृथ्वी का वायुमंडल हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन और अमोनिया जैसे गैसों से बना था। ज्वालामुखीय गतिविधियों और धूमकेतुओं से पानी और अन्य गैसें पृथ्वी पर आईं, जिससे दूसरा वायुमंडल बना। धीरे-धीरे, सूर्य के विकिरण और जैविक प्रक्रियाओं (जैसे प्रकाश संश्लेषण) के कारण वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी।
      4. महासागरों का निर्माण: पृथ्वी के ठंडा होने पर जलवाष्प संघनन के कारण वर्षा हुई, जिससे महासागर बने। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर पानी धूमकेतुओं और उल्कापिंडों के माध्यम से आया।
      5. जीवन की उत्पत्ति: लगभग 3.5 से 4 अरब वर्ष पहले, पृथ्वी पर साधारण सूक्ष्मजीवों के रूप में जीवन की शुरुआत हुई। यह प्रक्रिया रासायनिक विकास और जैविक प्रक्रियाओं का परिणाम थी।

    चंद्रमा का निर्माण

    पृथ्वी के निर्माण की कहानी में चंद्रमा की उत्पत्ति भी महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों का मानना है कि लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले, पृथ्वी का एक विशाल पिंड (थीया) से टकराव हुआ। इस टकराव से निकला मलबा पृथ्वी की कक्षा में इकट्ठा हुआ और चंद्रमा बना।

    वेद और विज्ञान का तुलनात्मक विश्लेषण

    वेदों और आधुनिक विज्ञान में पृथ्वी के निर्माण की कहानी में कुछ समानताएं और अंतर हैं।

    समानताएं

        1. प्रारंभिक अव्यवस्था: वेदों में नासदीय सूक्त एक ऐसी अवस्था का वर्णन करता है, जहां न सत् था, न असत्। यह आधुनिक विज्ञान के बिग बैंग से पहले की अव्यवस्था से मिलता-जुलता है।
        2. जल की भूमिका: वेदों और पुराणों में जल को सृष्टि का आधार माना गया है, जैसे विष्णु पुराण में नारायण का जल पर शयन। विज्ञान भी मानता है कि पृथ्वी पर पानी जीवन की उत्पत्ति के लिए महत्वपूर्ण था।
        3. चक्रीय दृष्टिकोण: भारतीय दर्शन में सृष्टि को चक्रीय माना गया है, जो आधुनिक खगोलशास्त्र के कुछ सिद्धांतों (जैसे ब्रह्मांड का विस्तार और संकुचन) से मेल खाता है।

      अंतर

          1. दार्शनिक बनाम वैज्ञानिक दृष्टिकोण: वेदों में सृष्टि को भगवान की इच्छा और माया से जोड़ा गया है, जबकि विज्ञान इसे भौतिकी और रसायन विज्ञान के नियमों के आधार पर समझाता है।
          2. समय का पैमाना: वेदों में समय को युगों और कल्पों में मापा जाता है, जो लाखों-करोड़ों वर्षों का होता है। विज्ञान समय को अरबों वर्षों में मापता है।
          3. जीवन की उत्पत्ति: वेदों में जीवन को ईश्वरीय रचना माना गया है, जबकि विज्ञान इसे रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं का परिणाम मानता है।

        निष्कर्ष

        पृथ्वी का निर्माण एक ऐसी कहानी है जो भारतीय वेदों और आधुनिक विज्ञान दोनों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। वेद और पुराण हमें एक दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जहां पृथ्वी को माता और भगवान की रचना के रूप में देखा जाता है। दूसरी ओर, आधुनिक विज्ञान हमें इस प्रक्रिया को भौतिक और रासायनिक नियमों के आधार पर समझने का अवसर देता है। दोनों दृष्टिकोण अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं और मानवता को प्रकृति के प्रति श्रद्धा और जिज्ञासा रखने की प्रेरणा देते हैं।

        पृथ्वी, चाहे वह भगवान विष्णु की माया से बनी हो या बिग बैंग और सौर मंडल की प्रक्रियाओं से, एक अनमोल ग्रह है जो जीवन को संभव बनाता है। हमें इसकी रक्षा और सम्मान करना चाहिए, जैसा कि वेदों में “पृथ्वी माता” के रूप में सिखाया गया है।

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