पुराने समय की खुशहाली और आज की भागदौड़
Swasthya kaa bastabik sach. 2026
नमकस्कार पाठको , आज का लेख में हम भूतकाल और बर्तमान समय का जीबन सैली का प्रभाब को पहले कहानी के जरिये समझने को कोसिस करेंगे और भूतकाल और बर्तमान समय का सैली कैसे उपयोगी हे चर्चा करेंगे , चलिए सुरु करते हे
बहुत पुराने समय की बात है। एक छोटे से गाँव में रामू काका रहते थे। उनका घर मिट्टी का था, छत पर घास–फूस की। सुबह सूरज की पहली किरण के साथ वे उठते, आँगन में बैठकर चूल्हे पर चाय बनाते। आस–पास के बच्चे दौड़ते हुए आते, “काका! आज क्या कहानी सुनाओगे?” रामू काका हँसते और कहते, “बैठो बेटा, पहले दूध पी लो।“
गाँव में सब एक–दूसरे को जानते थे। खेत में काम करते समय गीत गाते, हँसी–मजाक चलता रहता। खाना सादा होता – रोटी, सब्जी, दाल, कभी–कभी दही–चावल। सब कुछ घर का बना, ताजा और शुद्ध। बीमारी बहुत कम होती। जुकाम हुआ तो अदरक–तुलसी की चाय, पेट दर्द हुआ तो अजवाइन का पानी। दवा की दुकान दूर–दूर तक नहीं थी, फिर भी लोग स्वस्थ और तंदुरुस्त रहते।
रामू काका के बेटे श्याम शहर चले गए। पढ़ाई के बाद नौकरी लगी। अब उनका घर ऊँची इमारत में है। एसी चलता है, फ्रिज में ढेर सारा खाना रखा है। सुबह उठते ही फोन बजता है – ऑफिस का काम, मीटिंग, ट्रैफिक। खाना बाहर से मँगवाते हैं – पिज्जा, बर्गर, चाइनीज। मीठा–नमकीन, पैकेट वाला खाना। दिनभर काम, रात को थककर सो जाते।
एक दिन श्याम को बुखार आया। डॉक्टर के पास गए। दवा ली, लेकिन कमजोरी बनी रही। फिर दूसरी बीमारी, तीसरी बीमारी। डॉक्टर कहते, “लाइफस्टाइल डिजीज है – तनाव, गलत खाना, कम नींद।” श्याम सोचने लगे – “पापा तो कभी बीमार नहीं पड़ते थे।“
छुट्टियों में श्याम गाँव गए। रामू काका अब बूढ़े हो चुके थे, पर चेहरा चमकदार था। सुबह–सुबह खेत में टहलते, पक्षियों की आवाज सुनते, ताजी हवा में साँस लेते। श्याम ने देखा – गाँव में बच्चे मोबाइल कम इस्तेमाल करते, ज्यादातर मैदान में खेलते, पेड़ चढ़ते, नदी में कूदते। हँसी की आवाज हर तरफ गूँजती।
श्याम ने पापा से पूछा, “पापा, आप इतने स्वस्थ कैसे रहते हो? हम शहर में इतनी दवाइयाँ खाते हैं, फिर भी थकान रहती है। रामू काका मुस्कुराए और बोले, “बेटा, हमारा जीवन सादा था। हम प्रकृति के साथ जीते थे – सुबह उठते, धूप में काम करते, शाम को परिवार के साथ बैठते। खाना कम लेकिन ताजा और घर का। दिमाग शांत रहता, क्योंकि भागदौड़ नहीं थी। आज तुम्हारे पास सब कुछ है – कार, फोन, बड़ा घर – पर सुकून कहाँ है? बीमारी इसलिए बढ़ रही क्योंकि हमने सादगी छोड़ दी।”
श्याम की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा, “पापा, अब मैं समझ गया। पुराना जीवन कितना सुंदर था। कम चीजें, पर ज्यादा खुशी। कम बीमारी, ज्यादा ताकत।”
उस दिन से श्याम ने कुछ बदलाव किए। ऑफिस के बाद फोन बंद कर परिवार के साथ समय बिताने लगे। घर पर ताजी सब्जी बनवाने लगे। सुबह पार्क में टहलने लगे। धीरे-धीरे उनकी सेहत सुधरने लगी।
कहानी खत्म। क्या आप भी पुराने समय की सादगी को थोड़ा आपनायेंगे? 😊
कहानी तो ख़तम होगया अभी थोड़ा उस समय का जीबन सैली और बर्तमान का जीबन सैली कैसे हे जानेंगे।
पुरानी जीवनशैली के स्वास्थ्य रहस्य
उस समय लोग कम बीमार पड़ते थे, शरीर मजबूत रहता था, और मन शांत। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ये रहस्य फिर से अपनाने से हम भी स्वस्थ और खुशहाल रह सकते हैं। ये बातें आयुर्वेद और भारतीय परंपरा से ली गई हैं, जो प्रकृति के साथ जीने पर जोर देती हैं।
ब्रह्म मुहूर्त में उठना (सुबह 4-5 बजे के आसपास)
पुराने लोग सूरज निकलने से पहले उठ जाते थे। इस समय हवा बहुत शुद्ध और सात्विक होती है। इससे दिमाग तरोताजा रहता है, आँखें चमकदार होती हैं, और पूरे दिन ऊर्जा बनी रहती है। आज हम देर रात जागते हैं और सुबह थकान महसूस करते हैं – यही बीमारी की जड़ है। फायदा: नींद अच्छी आती है, पाचन तंत्र मजबूत होता है, और तनाव कम होता है।
जीभ साफ करना (टंग स्क्रेपर से)
सुबह उठते ही जीभ पर जमा सफेद मैल (आम) को साफ करना। पुराने लोग लकड़ी या तांबे के स्क्रेपर से जीभ साफ करते थे। फायदा: मुंह से बदबू दूर होती है, स्वाद अच्छा महसूस होता है, और पेट साफ रहता है। इससे इम्यूनिटी बढ़ती है।
तांबे के लोटे में रात भर रखा पानी पीना
रात को तांबे के बर्तन में पानी रखकर सुबह पीते थे। तांबा बैक्टीरिया मारता है और शरीर को जरूरी मिनरल्स देता है। फायदा: पेट साफ रहता है, कब्ज नहीं होता, और खून साफ होता है। आजकल प्लास्टिक या स्टील के बोतल इस्तेमाल से ये फायदा कम हो गया है।
फर्श पर क्रॉस–लेग्ड (सुखासन में) बैठकर खाना
खाना हमेशा जमीन पर बैठकर खाते थे। इससे पेट पर हल्का दबाव पड़ता है, पाचन एंजाइम अच्छे काम करते हैं। फायदा: ज्यादा खाने की आदत नहीं पड़ती, पेट भारी नहीं लगता, और मोटापा कम रहता है।
मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाना और खाना
मिट्टी के चूल्हे और बर्तन इस्तेमाल होते थे। खाना धीरे-धीरे पकता था, स्वाद और पोषण बरकरार रहता था। फायदा: खाने में प्राकृतिक खनिज मिलते हैं, पाचन आसान होता है, और बीमारियाँ कम होती हैं।
सूर्य नमस्कार और रोजाना शारीरिक श्रम
सुबह सूर्य नमस्कार करते थे, खेत में काम करते थे। शरीर को रोज हल्का व्यायाम मिलता था। फायदा: मांसपेशियाँ मजबूत, हड्डियाँ दृढ़, और हार्मोन बैलेंस रहता था। डायबिटीज, ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियाँ बहुत कम थीं।
घर का ताजा, सादा और मौसमी खाना
दाल-रोटी-सब्जी, दही-चावल, घी-दूध। मसाले जैसे हल्दी, अदरक, जीरा, लहसुन – ये सब दवा की तरह काम करते थे। बाहर का प्रोसेस्ड फूड नहीं खाते थे। फायदा: पेट साफ, इम्यूनिटी मजबूत, और लाइफस्टाइल डिजीज (जैसे शुगर, कोलेस्ट्रॉल) नहीं होते थे।
रात को जल्दी सोना (10 बजे तक)
सूरज के साथ सोना और उठना। रात 10 बजे के बाद सोने से पित्त दोष बढ़ता है, नींद खराब होती है। फायदा: शरीर की मरम्मत अच्छे से होती है, सुबह ताजगी रहती है।
परिवार और प्रकृति के साथ समय बिताना
शाम को सब साथ बैठते, गीत गाते, कहानियाँ सुनाते। तनाव कम, मन शांत। फायदा: मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता था, डिप्रेशन जैसी समस्या नहीं थी।
घरेलू नुस्खे और कम दवाइयाँ
जुकाम में तुलसी-अदरक की चाय, पेट दर्द में अजवाइन, सिरदर्द में तेल मालिश। डॉक्टर दूर होते थे, फिर भी बीमारी कम। फायदा: शरीर खुद ठीक होने की ताकत रखता था।
वर्तमान जीवनशैली में पर्यावरण पर प्रभाव
आज की तेज़ भागदौड़ वाली वर्तमान (आधुनिक) जीवनशैली ने हमारे जीवन को सुविधाजनक तो बना दिया है, लेकिन पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचा दिया है। पुराने समय में लोग प्रकृति के साथ जीते थे – कम इस्तेमाल, ज्यादा संतोष। लेकिन अब हमारी आदतें बदल गई हैं, और इसका सीधा असर धरती पर पड़ रहा है। आइए सरल शब्दों में समझते हैं कि वर्तमान जीवनशैली पर्यावरण को कैसे प्रभावित कर रही है, और क्या सीख मिलती है।
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वर्तमान जीवनशैली के मुख्य प्रभाव (नकारात्मक पक्ष)
- प्लास्टिक और कचरे की बाढ़ हम रोज़ प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें, पैकेट वाला खाना इस्तेमाल करते हैं। “एक बार इस्तेमाल करो, फेंक दो” वाली आदत से लाखों टन प्लास्टिक समुद्र, नदियों और ज़मीन में जमा हो रहा है। इससे जानवर मर रहे हैं, और हमारा पानी-हवा जहरीला हो रहा है।
- कार, बाइक और ईंधन का ज़्यादा इस्तेमाल हर घर में 1-2 गाड़ियाँ हैं। ट्रैफिक जाम, पेट्रोल-डीज़ल जलाने से धुआँ निकलता है। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है, स्मॉग होता है, और ग्लोबल वार्मिंग तेज़ हो रही है। शहरों में साँस लेना मुश्किल हो गया है।
- ज्यादा बिजली, एसी, फ्रिज और गैजेट्स दिन-रात एसी चलाना, फोन-लैपटॉप चार्ज करना, फैक्ट्रियों में मशीनें – सबको कोयला या बिजली चाहिए। इससे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) बहुत निकलता है, जो जलवायु परिवर्तन का बड़ा कारण है। बर्फ पिघल रही है, बाढ़-सूखा बढ़ रहा है।
- जंक फूड और पैकेज्ड खाना बाहर का खाना, फास्ट फूड – इनके लिए ज़्यादा खेती, ज़्यादा पानी, ज़्यादा कीटनाशक लगते हैं। इससे मिट्टी बंजर हो रही है, और जैव विविधता (पेड़-पौधे, जानवर) कम हो रही है।
- शहरीकरण और जंगल कटाई बड़े-बड़े शहर, मॉल, अपार्टमेंट बनाने के लिए जंगल कट रहे हैं। इससे वर्षा कम हो रही है, तापमान बढ़ रहा है, और जानवरों का घर छिन रहा है।
परिणाम क्या हो रहे हैं?
- जलवायु परिवर्तन तेज़ – गर्मी की लहरें, बेमौसम बारिश, चक्रवात।
- प्रदूषण से बीमारियाँ बढ़ रही हैं – साँस की तकलीफ, कैंसर, एलर्जी।
- प्राकृतिक संसाधन खत्म हो रहे – पानी कम, मिट्टी कमजोर, जंगल कम।
लेकिन अच्छी बात – हम बदल सकते हैं!
भारत सरकार ने भी मिशन LiFE (Lifestyle for Environment) शुरू किया है – मतलब “पर्यावरण के लिए जीवनशैली”। छोटे-छोटे बदलाव से बड़ा फर्क पड़ सकता है। जैसे:
- प्लास्टिक कम इस्तेमाल करें, कपड़े का थैला लें।
- साइकिल या पैदल चलें, कारपूलिंग करें।
- बिजली बचाएँ – LED बल्ब, अनावश्यक एसी बंद।
- घर का खाना खाएँ, मौसमी फल-सब्जियाँ लें।
- पेड़ लगाएँ, पानी बचाएँ।
- “Reuse, Reduce, Recycle” अपनाएँ।
पुराना जीवन सादा था – कम चीजें, ज्यादा खुशी। आज हम ज्यादा चीजें जमा रहे हैं, लेकिन धरती को खो रहे हैं। याद रखें – पर्यावरण अगर बचेगा, तो हम बचेंगे।
पुराने जीबन सैली को आज क्यों जरूरी है ये अपनाना?
आज हमारी जिंदगी में एसी, फोन, जंक फूड, तनाव और कम नींद ने बीमारियाँ बढ़ा दी हैं। लेकिन छोटे-छोटे बदलाव से – जैसे सुबह जल्दी उठना, तांबे का पानी पीना, घर का खाना खाना – हम पुरानी सेहत वापस ला सकते हैं।
बच्चों, बड़ों – सबको याद रखना: स्वास्थ्य चीजों में नहीं, आदतों में छिपा है। पुरानी सादगी को थोड़ा अपनाओ, तो जीवन फिर से खुशहाल और बीमारी-मुक्त हो सकता है।
सीख (मोरल):
वर्तमान जीवनशैली सुविधा देती है, लेकिन अगर हम थोड़ा सावधान और जागरूक रहें, तो पर्यावरण को बचा सकते हैं। एक छोटा बदलाव आज से शुरू करें – क्योंकि धरती हमारी माँ है, उसकी देखभाल हमारी ज़िम्मेदारी है।
पुराना जीवन सादा था, सरल था, प्रकृति के करीब था। उसमें बीमारी कम थी, क्योंकि हम शुद्ध हवा, ताजा खाना और परिवार का प्यार खाते थे। आज हम तेज भाग रहे हैं, बहुत सारी चीजें जमा रहे हैं, लेकिन सुकून और सेहत खो रहे हैं। याद रखो बच्चों – सादगी में ही असली खुशी है। थोड़ा पुराने जीवन की याद रखो, थोड़ा सादगी अपनाओ, तो जीवन फिर से सुंदर और स्वस्थ हो सकता है।