Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition1947

माउंटबेटन योजना: भारत विभाजन की नींव और इसके पीछे की अनकही सच्चाई| Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition.

माउंटबेटन योजना, जिसे 3 जून प्लान या इंडियन इंडिपेंडेंस प्लान के नाम से भी जाना जाता है, 1947 में भारत के बंटवारे और स्वतंत्रता की दिशा में एक निर्णायक कदम थी। यह योजना लॉर्ड लुई माउंटबेटन, भारत के अंतिम ब्रिटिश वायसराय, द्वारा प्रस्तुत की गई थी। Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

इसने न केवल भारत को दो स्वतंत्र देशों—भारत और पाकिस्तान—में बांटने की रूपरेखा तैयार की, बल्कि यह ब्रिटिश साम्राज्य की सामरिक और राजनीतिक चाल का भी हिस्सा थी। इस लेख में हम माउंटबेटन योजना के हर पहलू को विस्तार से समझेंगे, इसके उद्देश्य, प्रावधान, कार्यान्वयन, और इसके पीछे छिपी साजिशों को उजागर करेंगे। Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

माउंटबेटन योजना की पृष्ठभूमि

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद ब्रिटेन आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर हो चुका था। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था, और ब्रिटिश शासन के लिए भारत को नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ते राजनीतिक मतभेद, सांप्रदायिक तनाव, और 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे जैसे हिंसक दंगों ने स्थिति को और जटिल बना दिया था। Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

इसी बीच, ब्रिटिश सरकार ने फरवरी 1947 में घोषणा की कि वह जून 1948 तक भारत से अपनी सत्ता हस्तांतरित कर देगी। लॉर्ड माउंटबेटन को मार्च 1947 में भारत का वायसराय नियुक्त किया गया, और उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वह भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेजी से पूरा करें। Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

लेकिन माउंटबेटन ने जून 1948 की समय सीमा को और कम कर दिया और 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्र करने का फैसला किया। इस जल्दबाजी के पीछे कई छिपे हुए मकसद थे, जिन्हें हम आगे समझेंगे। Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

माउंटबेटन योजना के मुख्य प्रावधान

3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी योजना की घोषणा की। इस योजना के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित थे: Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

    1. भारत का विभाजन:भारत को दो स्वतंत्र डोमिनियनों में बांटा जाएगा—भारत और पाकिस्तान। पाकिस्तान में वे क्षेत्र शामिल होंगे जहां मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक थी, जैसे पंजाब का पश्चिमी हिस्सा, सिंध, बलूचिस्तान, और बंगाल का पूर्वी हिस्सा। शेष भारत, जिसमें हिंदू बहुल क्षेत्र और अन्य रियासतें शामिल थीं, भारत संघ का हिस्सा बनेंगी।
    2. सीमा निर्धारणसीमा रेखा तय करने के लिए दो बाउंड्री कमीशन बनाए गए, जिनके अध्यक्ष सर सिरिल रैडक्लिफ थे। रैडक्लिफ को पंजाब और बंगाल की सीमाएं तय करने का जिम्मा सौंपा गया। उन्हें केवल छह सप्ताह का समय दिया गया, और उन्होंने भारत की जमीनी हकीकत को जाने बिना नक्शे पर सीमाएं खींच दीं।
    3. रियासतों की स्थिति: भारत की 562 रियासतों को यह विकल्प दिया गया कि वे भारत, पाकिस्तान, या स्वतंत्र रहना चाहते हैं। हालांकि, माउंटबेटन और बाद में सरदार पटेल ने रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिए दबाव डाला।
    4. सत्ता हस्तांतरण: 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान को डोमिनियन का दर्जा दिया जाएगा, और दोनों देशों को अपनी संविधान सभाएं बनाने की आजादी होगी। ब्रिटिश सरकार भारत में अपनी सैन्य और प्रशासनिक जिम्मेदारियां समाप्त कर देगी।
    5. संपत्ति और सेना का बंटवारा: भारत की सेना, नौसेना, और वायुसेना को भारत और पाकिस्तान के बीच बांटा जाएगा। सरकारी संपत्ति, रेलवे, और अन्य संसाधनों का भी बंटवारा होगा।

    माउंटबेटन की जल्दबाजी: सवालों के घेरे में

    माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की समय सीमा को जून 1948 से घटाकर अगस्त 1947 कर दिया। इस जल्दबाजी के पीछे कई कारण थे: Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

        1. ब्रिटिश हितों की रक्षा: ब्रिटेन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक संकट से जूझ रहा था। भारत में सैन्य और प्रशासनिक खर्च को और वहन करना उसके लिए मुश्किल था। माउंटबेटन ने जल्दबाजी में बंटवारा करके यह सुनिश्चित किया कि ब्रिटिश हित, खासकर मध्य पूर्व में तेल और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा, बरकरार रहे।
        2. सांप्रदायिक तनाव का बहाना: माउंटबेटन ने दावा किया कि हिंदू-मुस्लिम दंगे इतने बढ़ गए थे कि जल्दी सत्ता हस्तांतरण ही एकमात्र रास्ता था। लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश प्रशासन ने दंगों को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए, बल्कि उन्हें भड़काने में अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका निभाई।
        3. सामरिक महत्व: पाकिस्तान का निर्माण ब्रिटेन के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण था। पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश प्रभाव को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण थे।

      रैडक्लिफ लाइन: एक विवादास्पद निर्णय|

      माउंटबेटन योजना का सबसे विवादास्पद हिस्सा था रैडक्लिफ लाइन, जिसने भारत और पाकिस्तान की सीमाएं तय कीं। सर सिरिल रैडक्लिफ, एक ब्रिटिश वकील, जिन्हें भारत की संस्कृति, भूगोल, या जनसांख्यिकी का कोई अनुभव नहीं था, को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके पास केवल छह सप्ताह थे, और उन्होंने लंदन से लाए गए पुराने नक्शों और जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सीमाएं खींचीं। Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

          • पंजाब का बंटवारा: पंजाब को पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) और पूर्वी पंजाब (भारत) में बांटा गया। इस प्रक्रिया में सिख समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ, क्योंकि उनके पवित्र स्थल, जैसे ननकाना साहिब, पाकिस्तान में चले गए।
          • बंगाल का बंटवारा: बंगाल को पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) और पश्चिमी बंगाल (भारत) में बांटा गया। इसने लाखों हिंदुओं और मुस्लिमों को विस्थापित किया।
          • जल्दबाजी का परिणाम: रैडक्लिफ लाइन की घोषणा 17 अगस्त 1947 को की गई, यानी स्वतंत्रता के दो दिन बाद। इससे भ्रम और हिंसा बढ़ी, क्योंकि लोगों को यह नहीं पता था कि उनका गांव या शहर किस देश में होगा।

        माउंटबेटन की भूमिका: नायक या खलनायक?

        लॉर्ड माउंटबेटन को कुछ लोग भारत की स्वतंत्रता का नायक मानते हैं, क्योंकि उन्होंने सत्ता हस्तांतरण को संभव बनाया। लेकिन कई इतिहासकार और विश्लेषक उन्हें बंटवारे की त्रासदी का जिम्मेदार मानते हैं। उनकी जल्दबाजी और पक्षपातपूर्ण रवैये ने भारत को अराजकता और हिंसा की आग में झोंक दिया। Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

            • मुस्लिम लीग के प्रति पक्षपात: माउंटबेटन पर आरोप है कि उन्होंने मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना को ज्यादा तरजीह दी। जिन्ना की पाकिस्तान की मांग को उन्होंने जल्दी स्वीकार कर लिया, जबकि कांग्रेस के नेताओं, जैसे नेहरू और पटेल, पर दबाव डाला गया कि वे बंटवारे को मान लें।
            • दंगों की अनदेखी: बंटवारे के दौरान हुए सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए माउंटबेटन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उनकी निष्क्रियता ने लाखों लोगों की जान ले ली।
            • साम्राज्यवादी हित: माउंटबेटन की प्राथमिकता ब्रिटिश हितों की रक्षा थी। पाकिस्तान को एक अलग मुल्क बनाकर उन्होंने सुनिश्चित किया कि ब्रिटेन का मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में प्रभाव बना रहे।

          भारतीय नेताओं की भूमिका|

          माउंटबेटन योजना को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों ने स्वीकार किया, लेकिन इसके पीछे उनकी अपनी मजबूरियां थीं। Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

              • कांग्रेस की स्वीकृति: जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने बंटवारे को स्वीकार किया, क्योंकि वे सत्ता हस्तांतरण में और देरी नहीं चाहते थे। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस ने सत्ता की लालच में यह समझौता किया।
              • मुस्लिम लीग की मांग: मोहम्मद अली जिन्ना ने शुरू से ही एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग की थी। माउंटबेटन ने उनकी इस मांग को जल्दी स्वीकार कर लिया, जिससे बंटवारा अपरिहार्य हो गया।
              • गांधीजी की असहमति: महात्मा गांधी बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने इसे “भारत माता के टुकड़े” करने वाला कदम बताया। लेकिन उनकी आवाज को कांग्रेस और माउंटबेटन ने अनसुना कर दिया।

            माउंटबेटन योजना का प्रभाव

            माउंटबेटन योजना ने भारत और पाकिस्तान के निर्माण को तो संभव बनाया, लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी थी: Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

                1. सांप्रदायिक दंगे: बंटवारे के बाद पंजाब और बंगाल में भयानक दंगे हुए। करीब 10-20 लाख लोग मारे गए, और 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए।
                2. रियासतों का विवाद: कश्मीर, हैदराबाद, और जूनागढ़ जैसी रियासतों के विलय ने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव पैदा किया, जो आज भी कश्मीर विवाद के रूप में मौजूद है।
                3. आर्थिक नुकसान: भारत और पाकिस्तान को सेना, रेलवे, और संपत्ति के बंटवारे से भारी आर्थिक नुकसान हुआ।
                4. मानवीय त्रासदी: लाखों परिवार बिछड़ गए, और महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ गईं।

              माउंटबेटन योजना के पीछे की साजिश

              माउंटबेटन योजना केवल सत्ता हस्तांतरण की योजना नहीं थी; यह ब्रिटिश साम्राज्य की “Divide and Rule” नीति का चरम थी। इतिहासकारों का मानना है कि इसके पीछे निम्नलिखित साजिशें थीं: Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

                  • भारत को कमजोर करना: ब्रिटेन नहीं चाहता था कि एक एकजुट भारत विश्व शक्ति बने। भारत और पाकिस्तान का बंटवारा सुनिश्चित करता था कि दोनों देश आपस में उलझे रहें।
                  • सामरिक हित: पाकिस्तान का निर्माण ब्रिटेन के मध्य पूर्व में तेल और सैन्य ठिकानों की रक्षा के लिए किया गया। पश्चिमी पाकिस्तान अफगानिस्तान और मध्य पूर्व के लिए एक रणनीतिक ठिकाना था।
                  • विंस्टन चर्चिल का प्रभाव: चर्चिल, जो भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का “मोती” मानते थे, ने बंटवारे को इस तरह डिजाइन किया कि भारत हमेशा कमजोर रहे।

                निष्कर्ष

                माउंटबेटन योजना भारत के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है, जो आजादी की खुशी के साथ-साथ बंटवारे की त्रासदी को भी अपने साथ लाया। यह योजना केवल हिंदू-मुस्लिम तनाव का परिणाम नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की कुटिल नीतियों और सामरिक हितों का नतीजा था।  Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

                माउंटबेटन की जल्दबाजी, रैडक्लिफ की अव्यवहारिक सीमा रेखा, और भारतीय नेताओं की मजबूरियों ने इस त्रासदी को और गहरा दिया। आज, जब हम इस इतिहास को देखते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि एकता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। माउंटबेटन योजना हमें सिखाती है कि हमें अपनी आजादी की कीमत को कभी नहीं भूलना चाहिए और भविष्य में ऐसी गलतियों से बचना चाहिए। Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition

                Mountbatten Plan: The Foundation of India’s Partition.

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