Maharaja Krushna Chandra Gajapati: The Visionary Architect

Maharaja Krushna Chandra Gajapati: The Visionary Architect

महाराजा श्री कृष्ण चंद्र गजपति नारायण देव (जिन्हें गजपति कृष्ण चंद्र देव के नाम से भी जाना जाता है) आधुनिक ओडिशा के निर्माता और पारलाखेमुंडी रियासत के शासक थे। वे पूर्वी गंगा राजवंश के वंशज थे, जो सदियों तक ओडिशा पर शासन करता रहा। उन्हें ओडिशा को अलग प्रांत बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए “उत्कल गौरव” की उपाधि दी गई। उनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम, शिक्षा, कृषि, साहित्य और सामाजिक सुधार से जुड़ा रहा। आइए उनके जीवन के हर पहलू पर विस्तार से चर्चा करें।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

जन्म और प्रारंभिक जीवन

महाराजा कृष्ण चंद्र गजपति का जन्म 26 अप्रैल 1892 को पारलाखेमुंडी (तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी, अब ओडिशा का गजपति जिला) में हुआ था। उनके पिता गौर चंद्र गजपति और माता राधामणि देवी थे। वे पूर्वी गंगा राजवंश की खेमुंडी शाखा से थे, जिसकी जड़ें मध्यकालीन गजपति शासकों से जुड़ी थीं। मात्र 12 वर्ष की आयु में उनके पिता का देहांत हो गया, जिसके बाद रियासत कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अधीन चली गई। प्रारंभिक शिक्षा पारलाखेमुंडी के महाराजा हाई स्कूल में हुई, फिर उच्च शिक्षा के लिए मद्रास के न्यूइंगटन कॉलेज गए। 1913 में वे खरसावां राज्य की राजकुमारी से विवाहित हुए और उसी वर्ष रियासत की कमान संभाली।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

शासन काल (1913-1950 तक प्रभावी)

1913 से वे पारलाखेमुंडी के महाराजा बने। उनका शासन काल विकासोन्मुखी था। उन्होंने रियासत को आधुनिक बनाया:

कृषि सुधारगंजाम क्षेत्र को “ओडिशा का चावल का कटोरा” बनाया। 1281 से अधिक सिंचाई तालाब (सागर) बनवाए, जैसे राम सागर, सीता सागर, लक्ष्मण सागर और कृष्ण सागर। आधुनिक कृषि फार्म स्थापित किए और शोध को बढ़ावा दिया। 1927 में रॉयल एग्रीकल्चरल कमीशन के सदस्य बने, जहां लॉर्ड लिनलिथगो उनकी सलाह से प्रभावित हुए।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

बुनियादी ढांचा : महाराजा श्री कृष्ण चंद्र गजपति नारायण देव ने अपनी रियासत के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं शुरू कीं, जिनमें पारलाखेमुंडी लाइट रेलवे (Parlakhemundi Light Railway – PLR) प्रमुख थी। यह ओडिशा की पहली निजी रेलवे कंपनी और पहली नैरो गेज (2 फुट 6 इंच चौड़ी) रेल लाइन थी, जो क्षेत्रीय व्यापार, यातायात और आर्थिक विकास की रीढ़ बनी। हालांकि इसका मूल विचार और प्रारंभिक निर्माण उनके पिता महाराजा गौर चंद्र गजपति नारायण देव (1863-1904) का था, लेकिन महाराजा कृष्ण चंद्र ने इसे विस्तार देकर गुणुपुर तक पहुंचाया, जो उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण है।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

इतिहास और स्थापना

      • प्रारंभिक विचार (1898): उस समय पारलाखेमुंडी एक रियासत थी, जो ब्रिटिश प्रभाव में थी। ईस्ट कोस्ट रेलवे ने 1894 में नौपाड़ा (अब आंध्र प्रदेश में) तक रेल लाइन पहुंचाई। महाराजा गौर चंद्र गजपति ने अपनी राजधानी पारलाखेमुंडी को नौपाड़ा से जोड़ने का प्रस्ताव रखा, क्योंकि दूरी मात्र 40 किमी थी। ब्रिटिश सरकार की मंजूरी मिलने पर 1898 में निर्माण शुरू हुआ।
      • उद्घाटन (1 अप्रैल 1900): लाइन को पारलाखेमुंडी लाइट रेलवे (PLR) नाम दिया गया और यह ओडिशा की पहली समर्पित रेल लाइन बनी। कुल लागत लगभग 7 लाख रुपये थी। यह ओडिशा की पहली निजी रेल कंपनी थी, जो पूरी तरह महाराजा के स्वामित्व में थी।
      • प्रारंभिक चुनौतियां: पहले कुछ वर्षों में घाटा हुआ, लेकिन 1910 के बाद मामूली मुनाफा शुरू हुआ। 1924-25 के बाद मुनाफा बढ़ा, जिसने विस्तार को प्रेरित किया।

    महाराजा कृष्ण चंद्र गजपति की भूमिका

        • महाराजा कृष्ण चंद्र (जो 1913 में रियासत के उत्तराधिकारी बने) ने PLR को नई ऊंचाई दी। बढ़ते मुनाफे से प्रेरित होकर उन्होंने 1929 और 1931 में दो चरणों में लाइन को पारलाखेमुंडी से गुणुपुर तक 51 किमी बढ़ाया। यह विस्तार दक्षिणी ओडिशा के दूरदराज क्षेत्रों को जोड़ने के लिए था।
        • 1934 में बंगाल नागपुर रेलवे (BNR) ने इसका प्रबंधन संभाला। स्वतंत्रता के बाद यह नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे में विलय हुई।

      रूट, स्टेशन और तकनीकी विवरण

          • मूल रूट: नौपाड़ा जंक्शन (Naupada Jn) से पारलाखेमुंडी तक (लगभग 40 किमी)।
          • विस्तारित रूट: नौपाड़ा से गुणुपुर तक कुल 90 किमी (नौपाड़ा-पारलाखेमुंडी 39 किमी + पारलाखेमुंडी-गुणुपुर 51 किमी)।
          • कुल स्टेशन (10): टेककली, पड्डासाना, टेम्बुरु, गंगुवाड़ा, पाथापटनम, पारलाखेमुंडी, काशीनगर, लिहुरी, बांसधारा, पलासिंगी।
          • गेज: 2 फुट 6 इंच (762 मिमी) नैरो गेज। लोकोमोटिव: 20 टन की 0-6-4 टैंक इंजन, छोटे पहिए (27 इंच व्यास) और कम एक्सल लोड (4.75 टन)।
          • उपयोग: माल ढुलाई (चावल, अनाज, लकड़ी) और यात्री सेवा। यह गजपति जिले की जीवनरेखा बनी, व्यापार और सामाजिक जुड़ाव बढ़ाया।

        गेज परिवर्तन और वर्तमान स्थिति

            • ब्रॉड गेज रूपांतरण: जनता की मांग पर 1950, 1964 और 1967 में सर्वे हुए। 27 सितंबर 2002 को नौपाड़ा में फाउंडेशन स्टोन रखा गया। 1 अप्रैल 2003 से ईस्ट कोस्ट रेलवे (ECoR) का हिस्सा बनी। 9 जून 2004 को नैरो गेज सेवा बंद हुई।
            • पुनरारंभ: 18 दिसंबर 2010 को पारलाखेमुंडी-नौपाड़ा सेक्शन खुला। 21 अगस्त 2011 को पूरा नौपाड़ा-गुणुपुर ब्रॉड गेज लाइन (5 फुट 6 इंच) जनता के लिए खुली, गुणुपुर से पुरी तक नियमित ट्रेन शुरू हुई।
            • वर्तमान (2025 तक): वाल्टेयर डिवीजन, ईस्ट कोस्ट रेलवे के अंतर्गत। गुणुपुर से 4 ट्रेनें चलती हैं। अमृत भारत स्टेशन स्कीम के तहत पारलाखेमुंडी स्टेशन का पुनर्विकास हो रहा है, जिसमें नया भवन, फुट ओवरब्रिज (12 मीटर चौड़ा) और हेरिटेज लुक शामिल।

          महत्व और विरासत

              • आर्थिक प्रभाव: कृषि उत्पादों की ढुलाई से गंजाम-गजपति क्षेत्र “ओडिशा का चावल कटोरा” बना। स्थानीय अर्थव्यवस्था को बूस्ट मिला।
              • सांस्कृतिक महत्व: 1914 उत्कल सम्मेलनी सत्र में विशेष ट्रेन चलाई गई, जहां अलग ओडिशा प्रांत की मांग उठी। स्टेशन को हेरिटेज टैग की मांग है, INTACH ने पुराने आर्टिफैक्ट्स (सिग्नलिंग उपकरण, यूनिफॉर्म) वापस लाने की अपील की।
              • 125वीं वर्षगांठ (2025): 1 अप्रैल 2025 को ईकोर ने उत्सव मनाया, जिसमें महाराजा गौर चंद्र और कृष्ण चंद्र की तस्वीरें दान की गईं। विंटेज लोको की प्रतिकृति स्टेशन पर लगाई गई।

            यह रेलवे न केवल बुनियादी ढांचा थी, बल्कि महाराजा कृष्ण चंद्र की विकास नीति का प्रतीक थी, जिसने ओडिशा को आधुनिक यातायात से जोड़ा। आज यह ईस्ट कोस्ट रेलवे की महत्वपूर्ण लाइन है, जो लाखों लोगों को सेवा देती है।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

            स्वास्थ्य और उद्योग:

            महाराजा कृष्ण चंद्र गजपति ने स्वास्थ्य क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया, विशेष रूप से दक्षिणी ओडिशा में चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करने में। वे एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (MKCG Medical College and Hospital), बेरहामपुर के मुख्य वास्तुकार माने जाते हैं। यह संस्थान 1962 में मेडिकल कॉलेज के रूप में शुरू हुआ और 1966 में अस्पताल के रूप में पूर्ण रूप से कार्यरत हुआ। शुरू में इसे बेरहामपुर मेडिकल कॉलेज कहा गया, लेकिन बाद में उनके सम्मान में महाराजा कृष्ण चंद्र गजपति मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल नाम दिया गया।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

                • एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल की विशेषताएं:
                      • यह ओडिशा का सबसे बड़ा सरकारी मेडिकल कॉलेज कैंपस है, जो 162 एकड़ में फैला हुआ है।

                      • अस्पताल में 900+ बेड हैं, जो मल्टी-स्पेशियलिटी टर्शियरी केयर प्रदान करता है, जिसमें सर्जरी, मेडिसिन, पीडियाट्रिक्स, गायनेकोलॉजी आदि शामिल हैं।

                      • यह दक्षिणी ओडिशा का एकमात्र प्रमुख रेफरल हॉस्पिटल है, जो लाखों मरीजों को सेवाएं देता है।

                      • 1983 में यहां ओडिशा का पहला नर्सिंग कॉलेज स्थापित हुआ, जो BSc नर्सिंग, पोस्ट-बेसिक BSc और MSc नर्सिंग कोर्स चलाता है। 2019 में कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर (CHO) कोर्स शुरू हुआ।

                      • ब्लड बैंक, एडवांस्ड डायग्नोस्टिक सुविधाएं और ऑपरेशन थिएटर उपलब्ध हैं।

                  • अन्य स्वास्थ्य योगदान:
                        • उन्होंने पारलाखेमुंडी और आसपास के क्षेत्रों में कई छोटे अस्पताल और डिस्पेंसरी स्थापित किए, हालांकि विशिष्ट नामों का उल्लेख कम है, लेकिन उनकी रियासत में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया।

                        • SCB मेडिकल कॉलेज, कटक की स्थापना में भी सहायता की, जो ओडिशा का पहला मेडिकल कॉलेज था।

                        • गरीब मरीजों के लिए मुफ्त या कम खर्चीली चिकित्सा सुविधाएं प्रदान कीं, और मेडिसिन में हजारों छात्रवृत्तियां दीं।

                  उनके प्रयासों से दक्षिणी ओडिशा में स्वास्थ्य सेवाएं क्रांतिकारी रूप से सुधरीं, और आज MKCG हजारों डॉक्टरों और नर्सों को प्रशिक्षित करता है।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

                  उद्योग (इंडस्ट्री) और औद्योगिक संस्थान

                  महाराजा ने अपनी रियासत को आधुनिक बनाने के लिए कई औद्योगिक संस्थान स्थापित किए, हालांकि मुख्य फोकस कृषि-आधारित उद्योगों पर था। गंजाम जिले को “ओडिशा का चावल का कटोरा” बनाने में उनकी भूमिका प्रमुख थी।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

                      • मुख्य औद्योगिक योगदान:
                            • आधुनिक कृषि फार्म: कई मॉडर्न एग्रीकल्चरल फार्म स्थापित किए, जहां नई फसलें, सिंचाई तकनीक और शोध पर जोर दिया। म्यांमार से गन्ने की नई किस्में लाकर ओडिशा में पेश कीं।

                            • सेंट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI), कटक: इसकी स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई, जो एशिया का सबसे बड़ा चावल अनुसंधान केंद्र है।

                            • हॉर्न क्राफ्ट इंडस्ट्री: पारलाखेमुंडी में सींग की हस्तकला (हॉर्न क्राफ्ट) को बढ़ावा दिया, जो आज भी जीवित उद्योग है और स्थानीय कारीगरों को रोजगार देता है।

                            • अन्य औद्योगिक संस्थान: रियासत में छोटे-छोटे agro-processing units स्थापित किए, जैसे चावल मिल्स और हॉर्टिकल्चर आधारित उद्योग। गजपति जिले की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और agro-processing पर आधारित है, जिसमें कोई बड़ी फैक्ट्री नहीं लेकिन कई छोटी इकाइयां हैं।

                            • पारलाखेमुंडी लाइट रेलवे: हालांकि परिवहन, लेकिन उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण – नौगांव से गुंटूर तक रेल लाइन, जो माल ढुलाई और व्यापार को बढ़ावा देती थी।
                            • सिंचाई और कृषि उद्योग: 1281 सिंचाई सागर (तालाब) बनवाए, जैसे राम सागर, सीता सागर, कृष्ण सागर आदि, जो कृषि उत्पादन बढ़ाकर agro-industries को मजबूत करते थे।

                      उनके शासन में कोई बड़ी भारी उद्योग नहीं थे, लेकिन कृषि-आधारित छोटे उद्योगों और शिल्पकला को प्रोत्साहन देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया। आज गजपति जिले में हॉर्टिकल्चर और agro-processing मुख्य उद्योग हैं।

                      स्कूल और कॉलेज (संक्षेप में, क्योंकि मुख्य फोकस स्वास्थ्यउद्योग पर)

                      हालांकि प्रश्न मुख्यतः स्वास्थ्य और उद्योग पर है, लेकिन उन्होंने कई स्कूल-कॉलेज भी स्थापित किए:

                          • SKCG ऑटोनॉमस कॉलेज, पारलाखेमुंडी: ओडिशा का दूसरा सबसे पुराना कॉलेज, 1896 में शुरू लेकिन उनके समय में विस्तार।
                          • महाराजा बॉयज हाई स्कूल (1857) और गर्ल्स हाई स्कूल (1919) को बढ़ावा।
                          • उत्कल विश्वविद्यालय, ओडिशा हाई कोर्ट आदि में योगदान।

                        ओडिशा राज्य निर्माण:

                        महाराजा श्री कृष्ण चंद्र गजपति नारायण देव को उत्कल गौरव” (ओडिशा का गौरव) कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने ओड़िया भाषी क्षेत्रों को एकत्रित कर अलग ओडिशा प्रांत बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई। 19वीं शताब्दी के अंत तक ओड़िया लोग चार ब्रिटिश प्रांतों में बंटे हुए थे: मद्रास प्रेसिडेंसी (दक्षिणी ओडिशा सहित पारलाखेमुंडी), बंगाल प्रेसिडेंसी (उत्तरी ओडिशा), बिहार-ओडिशा प्रांत (मध्य भाग) और मध्य प्रांत (पश्चिमी ओडिशा क्षेत्र)। भाषा, संस्कृति और आर्थिक शोषण के कारण ओड़िया एकता आंदोलन शुरू हुआ।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

                        उत्कल सम्मिलनी (Utkal Sammilani) का गठन और अभियान

                            • स्थापना (1903): उत्कल गौरव मदhusudan Das (उत्कलमणि) के नेतृत्व में उत्कल सम्मिलनी की स्थापना हुई। यह ओड़िया राष्ट्रवाद का प्रमुख मंच बना, जिसका उद्देश्य ओड़िया भाषी क्षेत्रों का एकीकरण और अलग प्रशासनिक इकाई बनाना था।
                            • मुख्य अभियान:

                          वर्ष सम्मेलन स्थान प्रमुख प्रस्ताव/क्रिया
                          1903 पुरी पहला सम्मेलन; मद्रास से ओड़िया क्षेत्रों को अलग करने की मांग।
                          1911 कटक ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन; ओड़िया एकता का संकल्प।
                          1913 भुवनेश्वर महाराजा कृष्ण चंद्र सक्रिय; पारलाखेमुंडी जैसे दक्षिणी क्षेत्रों को शामिल करने का प्रस्ताव।
                          1919 भद्रक बिहार-ओरिसा से अलगाव की मांग।
                          1920-1935 विभिन्न स्थान उत्कल दिवस (1 अप्रैल) मनाना शुरू; आंदोलन तेज।

                              • महाराजा की भूमिका: 1913 से वे उत्कल सम्मिलनी के प्रमुख नेता बने। उन्होंने पारलाखेमुंडी रियासत (मद्रास में) को ओडिशा से जोड़ने का अभियान चलाया। सम्मेलनों में भाषण देकर ओड़िया एकता पर जोर दिया। गोपबंधु दास, भगवती प्रसाद राउत आदि सहयोगी थे। सम्मेलनी ने साइमन कमीशन (1928) को ज्ञापन दिया, जिसमें 3 करोड़ ओड़िया की मांग दर्ज की गई।

                            अन्य आंदोलन और समितियां

                                • साइमन कमीशन (1928): उत्कल सम्मिलनी ने कमीशन का बहिष्कार किया, लेकिन महाराजा ने अलग से अलगाव की मांग रखी।
                                • फिलिपडफ समिति (1929): ओडिशा सीमाओं का निर्धारण; महाराजा ने दक्षिणी क्षेत्रों के लिए पैरवी की।
                                • व्हाइट पेपर (1931-34): ब्रिटिश प्रस्तावों पर बहस; महाराजा ने सुधार सुझाए।

                              लंदन राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस (1930-1932): महाराजा का ऐतिहासिक योगदान

                              महाराजा ने तीन बार लंदन यात्रा की, जो ओडिशा आंदोलन का टर्निंग पॉइंट था:

                                  1. पहला सम्मेलन (नवंबरदिसंबर 1930): बिहार-ओरिसा विधानसभा के नामित प्रतिनिधि के रूप में गए। प्रभावशाली भाषण दिया: “ओडिशा की अलग पहचान, भाषा और संस्कृति को मान्यता दो।” मेमोरेंडम प्रस्तुत किया, जिसमें मद्रास, बंगाल, बिहार से ओड़िया क्षेत्र जोड़ने का नक्शा दिया। ब्रिटिश अधिकारियों (रामसे मैकडोनाल्ड सहित) को प्रभावित किया।
                                  2. दूसरा सम्मेलन (सितंबर 1931): ओडिशा को अलग प्रांत का दर्जा देने पर चर्चा; उनकी पैरवी सफल।
                                  3. तीरा सम्मेलन (नवंबरदिसंबर 1932): अंतिम मुहर; गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 में ओडिशा को अलग प्रांत का प्रावधान।

                                उनके भाषणों की प्रतिकृति आज भी उपलब्ध हैं, जो ओड़िया गौरव से भरे हैं।

                                ओडिशा प्रांत का गठन (1 अप्रैल 1936)

                                    • गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत उत्कल प्रांत (Orissa Province) बना – भारत का पहला भाषाई आधारित प्रांत
                                    • क्षेत्रफल: 32,695 वर्ग मील; जनसंख्या: 87 लाख।
                                    • शामिल क्षेत्र:

                                  प्रांत से अलग मुख्य क्षेत्र
                                  मद्रास कोरापुट, गंजाम (पारलाखेमुंडी सहित)
                                  बिहार अंगुल, पुरी, कटक
                                  बंगाल बालासोर, मयूरभंज
                                  मध्य प्रांत गंजाम के कुछ हिस्से

                                      • पारलाखेमुंडी का विशेष महत्व: मद्रास प्रेसिडेंसी में होने के बावजूद, महाराजा के प्रयासों से पूरा पारलाखेमुंडी ओडिशा में शामिल हुआ। हालांकि, कुछ तेलुगु क्षेत्र आंध्र को दिए गए। यह उनकी व्यक्तिगत जीत थी।
                                      • प्रथम राज्यपाल: सर जॉन ऑग्डेन; प्रथम प्रधानमंत्री: महाराजा कृष्ण चंद्र (1 अप्रैल 1937 से)।

                                    विरासत

                                        • उत्कल दिवस (1 अप्रैल): ओडिशा फाउंडेशन डे के रूप में मनाया जाता है।
                                        • महाराजा के बिना ओडिशा का निर्माण असंभव था। उन्होंने रॉयल एग्रीकल्चर कमीशन सदस्यता का उपयोग कर लंदन में पैरवी की। आज गजपति जिला उनके नाम पर।
                                        • उद्धरण: “ओडिशा केवल भूमि नहीं, ओड़िया भाषा और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है।”

                                      यह आंदोलन भाषाई राष्ट्रवाद का प्रतीक बना, जो बाद में अन्य राज्यों (आंध्र, कर्नाटक) के लिए प्रेरणा स्रोत। महाराजा की दृढ़ता ने ओडिशा को आधुनिक पहचान दी।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

                                      कुट नीति (राजनीति)

                                      वे स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता और सुधारक थे:

                                          • मद्रास विधान परिषद के सदस्य।
                                          • प्रथम विश्व युद्ध में कैप्टन के रूप में भारतीय सेना में सेवा की, जिसके लिए दुर्लभ सनद मिली।
                                          • ओडिशा के पहले प्रधानमंत्री (1 अप्रैल 1937 से 18 जुलाई 1937 और 24 नवंबर 1941 से 30 जून 1944)।
                                          • संविधान सभा के सदस्य (1947-50)।
                                          • उत्कल गौरव मदुसूदन दास, गोपबंधु दास आदि के साथ मिलकर ओड़िया आंदोलन चलाया। ओडिशा को भाषाई आधार पर पहला राज्य बनाने में کلیدی भूमिका।
                                          • रियासत विलय में पारलाखेमुंडी को ओडिशा में मिलाया, हालांकि कुछ हिस्सा आंध्र में गया।
                                          • गरीबों के हितैषी, सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकारों के लिए कार्य।

                                        कर संग्रह (टैक्स कलेक्शन)

                                        उनके शासन में कर संग्रह कुशल और जनहितकारी था। रियासत में भूमि राजस्व मुख्य स्रोत था, लेकिन उन्होंने करों को कम रखा और सिंचाई परियोजनाओं से कृषि उत्पादन बढ़ाकर राजस्व बढ़ाया। गरीब किसानों को राहत दी, अत्यधिक कर नहीं वसूला। ब्रिटिश काल में जमींदारी प्रथा के तहत कर संग्रह होता था, लेकिन वे जनकल्याण पर खर्च करते थे। कोई दमनकारी नीति नहीं अपनाई, बल्कि विकास से राजस्व बढ़ाया।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

                                        शिक्षा में योगदान

                                        शिक्षा उनके जीवन का प्रमुख हिस्सा थी:

                                            • हजारों गरीब छात्रों को मानविकी, विज्ञान, कृषि, चिकित्सा और इंजीनियरिंग में छात्रवृत्ति दी।
                                            • SKCG ऑटोनॉमस कॉलेज (पारलाखेमुंडी) स्थापित, जो ओडिशा का दूसरा सबसे पुराना कॉलेज।
                                            • उत्कल विश्वविद्यालय, SCB मेडिकल कॉलेज, ओडिशा हाई कोर्ट और कृषि शोध केंद्र की स्थापना में योगदान।
                                            • महाराजा बॉयज हाई स्कूल (1857) और गर्ल्स हाई स्कूल (1919) को बढ़ावा।
                                            • लड़कियों की शिक्षा पर जोर, जो उस समय क्रांतिकारी था।

                                          साहित्य और संस्कृति

                                          साहित्य प्रेमी और संरक्षक थे:

                                              • प्राचीन ओड़िया कवि कवि कलाहंस गोपालकृष्ण पट्टनायक के प्रशंसक।
                                              • स्वयं ओडिशी संगीत और साहित्य के ज्ञाता। रचनाएं: “मनु जाऊ नहीं मां”, “राधाधारा सुमधुर” आदि।
                                              • गजपति प्रेस स्थापित कर ओड़िया और संस्कृत पांडुलिपियों को छापा।
                                              • पद्मश्री डॉ. सत्यानारायण राजगुरु (इतिहासकार) और गायका शिरोमणि अपन्ना पाणिग्रही को संरक्षण।
                                              • पारलाखेमुंडी में स्थायी थिएटर बनवाया, जहां नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते।
                                              • हॉर्न क्राफ्ट (सींग की कारीगरी) को बढ़ावा, जो आज भी जीवित है।

                                            धर्म

                                            वे धार्मिक सहिष्णु थे। हिंदू होने के बावजूद सभी धर्मों का सम्मान किया। जगन्नाथ पूजा और वैष्णव परंपरा से जुड़े, लेकिन कोई कट्टरता नहीं। प्रथम विश्व युद्ध में सेवा और सामाजिक कार्यों में धार्मिक भावना झलकती थी। ओडिशी संगीत में कृष्ण लीला पर रचनाएं कीं, जैसे “ब्रजकु चोरा आसीछि”।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

                                            मृत्यु और विरासत

                                            25 मई 1974 को 82 वर्ष की आयु में उनका देहांत हुआ। ओडिशा सरकार ने राजकीय अंतिम संस्कार किया और पारलाखेमुंडी में दाह संस्कार हुआ। उनकी स्मृति में गजपति जिला नामकरण हुआ। उत्कल विश्वविद्यालय ने उन्हें LL.D. की मानद उपाधि दी। वे रॉयल सोसाइटी ऑफ आर्ट्स और रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के आजीवन सदस्य थे।Maharaja Krushna Chandra Gajapati

                                            महाराजा कृष्ण चंद्र गजपति ओडिशा की पहचान हैं। शिक्षा, कृषि, संस्कृति और राज्य निर्माण में उनका योगदान अमिट है। वे एक दूरदर्शी शासक थे, जिन्होंने राजसी वैभव को जनकल्याण में लगाया। आज भी ओडिशा उनके ऋणी है।

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                                            Maharaja Krushna Chandra Gajapati: The Visionary Architect

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