India’s strategic realignment: New allies in a changing world order.2025

भारत के रणनीतिक पुनर्गठन: बदलती विश्व व्यवस्था में नए सहयोगी | India’s strategic realignment: New allies in a changing world order .

प्रस्तावना .

21वीं सदी के तीसरे दशक में, वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहा है। एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय हो रहा है, जहाँ शक्ति के पारंपरिक केंद्र चुनौती का सामना कर रहे हैं, और नए खिलाड़ी उभर रहे हैं। 

ऐसे में भारत, एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति और एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में, अपनी विदेश नीति में महत्वपूर्ण रणनीतिक पुनर्गठन कर रहा है। यह पुनर्गठन न केवल देश के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है, बल्कि एक स्थिर और संतुलित वैश्विक व्यवस्था में योगदान देने के लिए भी महत्वपूर्ण है। 

हाल के घटनाक्रमों ने भारत के जर्मनी और जापान के साथ बढ़ते संबंधों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है, जो पारंपरिक सहयोगियों से परे नए साझेदारी की तलाश में भारत की बदलती रणनीति का संकेत देता है।

बदलती वैश्विक भू-राजनीति का परिदृश्य |

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य कई चुनौतियों और अनिश्चितताओं से भरा है:

  1.  रूस-यूक्रेन युद्ध: इस संघर्ष ने यूरोप की सुरक्षा संरचना को बदल दिया है और वैश्विक ऊर्जा और खाद्य बाजारों पर गहरा प्रभाव डाला है। भारत ने इस मुद्दे पर एक संतुलित रुख बनाए रखा है, जबकि अपने रणनीतिक स्वायत्तता को भी बरकरार रखा है।
  2. मध्य पूर्व में तनाव: इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और ईरान के साथ बढ़ते तनाव ने पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं और हवाई यात्रा भी प्रभावित हुई है, जिससे भारत जैसे देशों को नए व्यापार मार्गों और सुरक्षित यात्रा विकल्पों की तलाश करनी पड़ रही है।
  3. अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी प्रौद्योगिकियों में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने एक तकनीकी विभाजन पैदा कर दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग बाधित हो रहा है। अमेरिका की बढ़ती संरक्षणवादी आर्थिक नीतियां, जिसमें प्रस्तावित टैरिफ शामिल हैं, वैश्विक व्यापार पैटर्न को बाधित कर सकती हैं।
  4. चुनावों का “सुपरसाइकिल”: दुनिया भर में होने वाले महत्वपूर्ण चुनावों का एक “सुपरसाइकिल” नियामक और नीतिगत अनिश्चितता पैदा कर रहा है, जिसके औद्योगिक रणनीतियों, जलवायु नीतियों और सैन्य संघर्षों पर दीर्घकालिक प्रभाव होंगे।
  5. आर्थिक सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण: संघर्षों और व्यापार संरक्षणवाद के आलोक में, कई देश आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे वैश्विक अंतरनिर्भरताओं को “डी-रिस्क” किया जा रहा है। इसमें आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्मूल्यांकन करना और नए बाजारों में उत्पादन क्षमता का विस्तार करना शामिल है।
  6. कनाडा-यूरोपीय संघ सुरक्षा और रक्षा साझेदारी: कनाडा की रणनीतिक स्वायत्तता की ओर: जून 2025 में, कनाडा और यूरोपीय संघ ने सुरक्षा और रक्षा साझेदारी (एसडीएफ) को औपचारिक रूप दिया, एक समझौता जो कनाडा को यूरोप के तेजी से विकसित हो रहे रक्षा वास्तुकला के साथ और अधिक निकटता से जोड़ता है। 
  7. यह समझौता बदलते सुरक्षा गतिशीलता के लिए एक ठोस प्रतिक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है, अर्थात यह विश्वास कि संयुक्त राज्य अमेरिका को अब यूरोपीय और कनाडाई सुरक्षा के एकमात्र या यहां तक कि प्राथमिक प्रदाता के रूप में नहीं गिना जा सकता है। यूरोप के लिए, साझेदारी अस्तित्वगत तात्कालिकता के क्षण में आती है। 
  8. यूक्रेन युद्ध ने बड़े पैमाने पर सैन्य निर्माण और यूरोपीय संघ भर में रणनीतिक स्वायत्तता के लिए एक अभूतपूर्व अभियान शुरू कर दिया है। कनाडा के लिए, यह गठबंधनों में विविधता लाने और अपने रक्षा उद्योग को यूरोप के विशाल खरीद और नवाचार कार्यक्रमों में एकीकृत करने का अवसर दर्शाता है।

भारत का रणनीतिक स्वायत्तता और विविधीकरण|

इन चुनौतियों के बीच, भारत अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता और विविधीकरण पर जोर दे रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अपने पारंपरिक सहयोगियों को छोड़ रहा है, बल्कि यह कि वह अपने विकल्पों का विस्तार कर रहा है और विभिन्न देशों के साथ मजबूत संबंध बना रहा है ताकि किसी भी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके।

जर्मनी के साथ बढ़ती साझेदारी|

जर्मनी, यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और एक प्रमुख तकनीकी शक्ति, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में उभरा है। दोनों देशों के बीच सहयोग के कई क्षेत्र हैं:

  1. उच्च प्रौद्योगिकी और नवाचार: भारत जर्मनी की उन्नत इंजीनियरिंग, विनिर्माण और हरित प्रौद्योगिकियों में विशेषज्ञता का लाभ उठाना चाहता है। सह-विकास और अनुसंधान एवं विकास में सहयोग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, खासकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में।
  2. व्यापार और निवेश: जर्मनी भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रमुख स्रोतों में से एक है। भारत जर्मनी से अधिक निवेश आकर्षित करना चाहता है, खासकर बुनियादी ढांचे, हरित ऊर्जा और स्मार्ट शहरों जैसे क्षेत्रों में।
  3. रक्षा सहयोग: दोनों देशों के बीच रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और संयुक्त उत्पादन की संभावनाओं पर बातचीत चल रही है, जिससे भारत की ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बढ़ावा मिल सके।
  4. जलवायु परिवर्तन और हरित ऊर्जा: जर्मनी जलवायु परिवर्तन से निपटने में एक अग्रणी देश है। भारत अपनी हरित ऊर्जा परिवर्तन में जर्मनी के अनुभव और विशेषज्ञता से लाभ उठाना चाहता है।
  5. भू-राजनीतिक तालमेल: रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन के बढ़ते प्रभाव के आलोक में, दोनों देशों के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति साझा प्रतिबद्धता है।

जापान के साथ विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी|

  1. भारत और जापान के संबंध “विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी” तक बढ़ गए हैं, जो दोनों देशों के गहरे विश्वास और साझा हितों को दर्शाता है:
  2. बुनियादी ढांचा विकास: जापान भारत में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (जैसे बुलेट ट्रेन परियोजना, दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा) में सबसे बड़े निवेशकों में से एक है। ये परियोजनाएं न केवल भारत के विकास में योगदान करती हैं, बल्कि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को भी बढ़ाती हैं।
  3. रक्षा और सुरक्षा सहयोग: इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते सैन्य प्रभाव के कारण, भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा उपकरण सहयोग और समुद्री सुरक्षा में समन्वय शामिल है।
  4. आर्थिक संबंध: दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश में लगातार वृद्धि हो रही है। जापान भारत में अपनी विनिर्माण उपस्थिति का विस्तार कर रहा है, जिससे रोजगार सृजन हो रहा है और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण हो रहा है।
  5. क्रिटिकल और उभरती प्रौद्योगिकियां: जापान सेमीकंडक्टर, 5जी/6जी नेटवर्क और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में एक प्रमुख खिलाड़ी है। भारत इन क्षेत्रों में जापान के साथ सहयोग करके अपनी तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करना चाहता है।
  6. क्वाड और बहुपक्षीय मंच: भारत और जापान क्वाड (QUAD) के प्रमुख सदस्य हैं, जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक स्वतंत्र और खुले नियम-आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। वे संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसे अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भी मिलकर काम करते हैं।
  7. मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR): दोनों देश आपदा प्रबंधन और मानवीय सहायता में भी सहयोग करते हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।

पारंपरिक सहयोगियों की बदलती भूमिका और अमेरिकी नीतियों का प्रभाव |

भारत पारंपरिक रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के साथ मजबूत संबंध रखता है। हालांकि, बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में इन संबंधों की गतिशीलता भी बदल रही है:

  1. संयुक्त राज्य अमेरिका: भारत-अमेरिका संबंध रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बने हुए हैं, खासकर रक्षा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में। हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों (जैसे व्यापार संरक्षणवाद और “अमेरिका फर्स्ट” दृष्टिकोण) से संभावित अनिश्चितता भारत को अपने विकल्पों का विस्तार करने के लिए प्रेरित कर रही है। 
  2. भारत को डर है कि अमेरिका की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता उसकी बाहरी प्रतिबद्धताओं को प्रभावित कर सकती है, जिससे भारत को अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक योजनाएं बनाने में सावधानी बरतनी होगी।
  3. यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस: ब्रेक्जिट के बाद यूके और यूरोपीय संघ से बाहर फ्रांस की अपनी प्राथमिकताएं हो सकती हैं। भारत इन देशों के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग जारी रखेगा, लेकिन इनकी दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि के बारे में अनिश्चितताएं हो सकती हैं। भारत को लगता है कि इन देशों की आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियाँ उनकी वैश्विक भूमिका को सीमित कर सकती हैं।
  4. रूस: रूस भारत का एक पारंपरिक और विश्वसनीय रक्षा भागीदार रहा है। हालांकि, यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों ने भारत के लिए कुछ चुनौतियों पैदा की हैं। भारत अभी भी रूसी रक्षा उपकरणों पर काफी हद तक निर्भर है, लेकिन अब वह अपने रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में भी विविधता लाने की कोशिश कर रहा है।

भारत की रणनीतिक पुनर्गठन के निहितार्थ |

 

भारत के रणनीतिक पुनर्गठन के कई महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं:

  1. रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करना: नए सहयोगियों की तलाश करके, भारत किसी भी एक शक्ति पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है और अपनी विदेश नीति में अधिक लचीलापन प्राप्त कर रहा है।
  2. आर्थिक सुरक्षा को बढ़ावा देना: आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाकर और नए बाजारों में निवेश करके, भारत अपनी अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने की कोशिश कर रहा है।
  3. तकनीकी उन्नति: जर्मनी और जापान जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देशों के साथ सहयोग करके, भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं को बढ़ा रहा है।
  4. इंडो-पैसिफिक में स्थिरता: क्वाड जैसे बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से, भारत क्षेत्र में एक स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
  5. आंतरिक स्थिरता और विकास: ये रणनीतिक साझेदारी भारत को अपने आर्थिक विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने और अपने लोगों के लिए एक बेहतर भविष्य बनाने में मदद करती हैं।

निष्कर्ष

भारत का रणनीतिक पुनर्गठन एक आवश्यकता है जो बदलती वैश्विक भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से उपजी है। जर्मनी और जापान के साथ गहरे संबंध स्थापित करके, भारत न केवल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों को सुरक्षित कर रहा है, बल्कि एक अधिक संतुलित और स्थिर वैश्विक व्यवस्था में भी योगदान दे रहा है। 

यह दृष्टिकोण भारत को “विश्व-गुरु” बनने और एक बहुध्रुवीय दुनिया में एक प्रमुख शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए तैयार करता है। आने वाले वर्षों में, भारत की विदेश नीति में यह विविधीकरण और रणनीतिक स्वायत्तता प्रमुख विषय बनी रहेगी, क्योंकि यह एक जटिल और अनिश्चित विश्व में अपने रास्ते पर चलता है।

India’s strategic realignment: New allies in a changing world order

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