India-Pakistan Partition: Unraveling the Causes, Gandhi’s Efforts, and Bose’s Revolutionary Role.1947

India-Pakistan Partition: Unraveling the Causes, Gandhi’s Efforts, and Bose’s Revolutionary Role
India-Pakistan Partition: Unraveling the Causes, Gandhi’s Efforts, and Bose’s Revolutionary Role

भारत-पाकिस्तान विभाजन: कारण, महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस की भूमिका|India-Pakistan Partition: Unraveling the Causes, Gandhi’s Efforts, and Bose’s Revolutionary Role.

नई दिल्ली, 29 जुलाई 2025
भारत और पाकिस्तान का विभाजन, जो 1947 में हुआ, विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और दुखद घटनाओं में से एक है। इसने ब्रिटिश भारत को दो स्वतंत्र राष्ट्रों—भारत और पाकिस्तान—में विभाजित किया, जिसके परिणामस्वरूप लाखों लोग विस्थापित हुए और व्यापक हिंसा हुई। इस लेख में, हम विभाजन के कारणों, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, महात्मा गांधी की भूमिका, और सुभाष चंद्र बोस की भूमिका का विश्लेषण करेंगे। यह लेख विश्व भर की पुस्तकों, ऐतिहासिक दस्तावेजों, और समकालीन स्रोतों पर आधारित है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन 18वीं शताब्दी से शुरू हुआ, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय उपमहाद्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद, ब्रिटिश क्राउन ने भारत पर सीधा शासन शुरू किया। इस दौरान, हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव बढ़ने लगा, जिसे ब्रिटिश नीतियों जैसे “फूट डालो और राज करो” ने और गहरा किया।

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई, जिसने शुरू में सुधारों की मांग की और बाद में पूर्ण स्वराज की वकालत की। 1906 में, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, जिसने मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्व किया। इन संगठनों के बीच मतभेदों ने विभाजन की नींव रखी। सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी दृष्टिकोण अपनाया, जो कांग्रेस के अहिंसक दृष्टिकोण से अलग था।

विभाजन के कारण

1. धार्मिक विभेद और मुस्लिम लीग की मांग

विभाजन का प्रमुख कारण मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग थी। 1940 के लाहौर सत्र में, मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में “पाकिस्तान प्रस्ताव” पारित हुआ, जिसमें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राष्ट्र की मांग की गई। जिन्ना का “दो-राष्ट्र सिद्धांत” हिंदू और मुस्लिम समुदायों को अलग-अलग राष्ट्र मानता था। इस मांग को ब्रिटिश नीतियों, जैसे 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने बढ़ावा दिया, जिसमें अलग निर्वाचन क्षेत्र शुरू किए गए।

2. ब्रिटिश नीतियाँ और जल्दबाजी

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, ब्रिटेन कमजोर हो चुका था और भारत में शासन बनाए रखना कठिन हो गया। 1947 में, लॉर्ड माउंटबेटन ने स्वतंत्रता की प्रक्रिया को तेज किया। माउंटबेटन योजना के तहत, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 पारित हुआ, जिसने भारत और पाकिस्तान को दो स्वतंत्र अधिराज्य बनाया। रैडक्लिफ रेखा के माध्यम से सीमा निर्धारण जल्दबाजी में किया गया, जिससे बड़े पैमाने पर हिंसा और विस्थापन हुआ।

3. हिंदू-मुस्लिम तनाव

1905 में बंगाल के विभाजन ने हिंदू-मुस्लिम तनाव को बढ़ाया। 1930 और 1940 के दशक में साम्प्रदायिक दंगे, विशेष रूप से बंगाल और पंजाब में, आम हो गए। मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने धार्मिक पहचान को राजनीतिक हथियार बनाया।

4. कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद

1937 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद, मुस्लिम लीग को सत्ता में भागीदारी नहीं मिली, जिससे उनका डर बढ़ा कि स्वतंत्र भारत में मुस्लिम हाशिए पर रहेंगे। 1946 की कैबिनेट मिशन योजना एक संयुक्त भारत का प्रस्ताव थी, लेकिन कांग्रेस और लीग की असहमति के कारण यह विफल रही।

महात्मा गांधी की भूमिका

महात्मा गांधी ने विभाजन को रोकने के लिए कई प्रयास किए। वह एक संयुक्त भारत के समर्थक थे और दो-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध करते थे। 1938 और 1944 में, उन्होंने जिन्ना के साथ बातचीत की, लेकिन ये असफल रहीं। 1946 में, नोआखाली में उनकी शांति यात्रा ने हिंसा को कुछ हद तक कम किया। 1947 में, जब कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार किया, गांधी ने औपचारिक विरोध नहीं किया, लेकिन वह इसे मन से स्वीकार नहीं कर सके। उनकी चुप्पी को कुछ ने सहमति माना, जबकि अन्य ने इसे उनकी हताशा के रूप में देखा।

गांधी की सबसे विवादास्पद भूमिका 1948 में थी, जब उन्होंने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये के भुगतान के लिए अनशन किया। इस कदम ने कुछ हिंदूवादी समूहों की आलोचना को जन्म दिया। उनकी आत्मकथा मेरी सत्य की खोज और हिंद स्वराज उनकी एकता और अहिंसा की विचारधारा को दर्शाते हैं। इतिहासकार रामचंद्र गुहा (India After Gandhi) और जूडिथ ब्राउन (Gandhi: Prisoner of Hope) के अनुसार, गांधी ने विभाजन को रोकने की कोशिश की, लेकिन वह समय की परिस्थितियों के सामने असहाय थे।

सुभाष चंद्र बोस की भूमिका

सुभाष चंद्र बोस, जिन्हें “नेताजी” के नाम से जाना जाता है, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक क्रांतिकारी नेता थे। उनकी भूमिका गांधी के अहिंसक दृष्टिकोण से भिन्न थी, क्योंकि उन्होंने सशस्त्र संघर्ष को स्वतंत्रता का साधन माना। बोस की विचारधारा और कार्यों ने स्वतंत्रता संग्राम को गति दी, लेकिन विभाजन के संदर्भ में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका सीमित थी, क्योंकि वह 1940 के दशक के मध्य में भारत में सक्रिय नहीं थे। फिर भी, उनकी नीतियों और दृष्टिकोण का अप्रत्यक्ष प्रभाव महत्वपूर्ण था।

1. क्रांतिकारी दृष्टिकोण और आजाद हिंद फौज

सुभाष चंद्र बोस ने 1939 में कांग्रेस के भीतर मतभेदों के कारण संगठन छोड़ दिया और फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। उन्होंने सशस्त्र क्रांति की वकालत की और 1942 में जापान और जर्मनी की मदद से आजाद हिंद फौज (आईएनए) का गठन किया। बोस का नारा “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” ने लाखों भारतीयों को प्रेरित किया। आईएनए ने दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी, विशेष रूप से इंफाल और कोहिमा की लड़ाई में।

हालांकि, बोस का ध्यान ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने पर था, न कि हिंदू-मुस्लिम एकता या विभाजन के मुद्दे पर। उनकी सेना में हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों के सैनिक शामिल थे, जो उनके समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है। इतिहासकार सुगाता बोस (His Majesty’s Opponent) लिखते हैं कि सुभाष चंद्र बोस ने धार्मिक आधार पर विभाजन का समर्थन नहीं किया और एक संयुक्त भारत की कल्पना की।

2. विभाजन पर अप्रत्यक्ष प्रभाव

1945 में, बोस की मृत्यु (हालांकि यह विवादास्पद है) के बाद, आईएनए के सैनिकों के मुकदमों ने भारत में व्यापक जन आंदोलन को जन्म दिया। इन मुकदमों ने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया, क्योंकि दोनों समुदायों ने आईएनए के समर्थन में प्रदर्शन किए। इसने ब्रिटिश शासन पर दबाव बढ़ाया, जिसके परिणामस्वरूप स्वतंत्रता की प्रक्रिया तेज हुई। हालांकि, बोस की अनुपस्थिति में, जिन्ना और मुस्लिम लीग की मांगें अधिक प्रभावी हो गईं।

कुछ इतिहासकार, जैसे लियोनार्ड गॉर्डन (Brothers Against the Raj), तर्क देते हैं कि बोस की क्रांतिकारी गतिविधियों ने ब्रिटिश सरकार को जल्दी स्वतंत्रता देने के लिए मजबूर किया, जिसने माउंटबेटन की जल्दबाजी को बढ़ावा दिया। यह जल्दबाजी विभाजन की त्रासदी का एक कारण बनी। यदि बोस जीवित होते और भारत में सक्रिय रहते, तो शायद उनकी समावेशी विचारधारा ने विभाजन को रोकने में मदद की होती।

3. गांधी और बोस का तुलनात्मक दृष्टिकोण

गांधी और बोस के दृष्टिकोण में मूलभूत अंतर था। जहां गांधी अहिंसा और सविनय अवज्ञा पर जोर देते थे, वहीं बोस सशस्त्र संघर्ष में विश्वास रखते थे। गांधी ने बोस की रणनीतियों की आलोचना की, लेकिन उनकी देशभक्ति को स्वीकार किया। बोस ने भी गांधी को “राष्ट्रपिता” कहकर सम्मान दिया, लेकिन उनकी धीमी गति वाली रणनीति को अपर्याप्त माना। इस मतभेद ने स्वतंत्रता संग्राम को दो धाराओं में बांट दिया, जिसने अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक गतिरोध को बढ़ाया।

विभाजन के परिणाम

14 और 15 अगस्त 1947 को, पाकिस्तान और भारत स्वतंत्र राष्ट्र बने। लगभग 1.4 करोड़ लोग विस्थापित हुए और 5 से 10 लाख लोग हिंसा में मारे गए। बंगाल और पंजाब के विभाजन ने बड़े पैमाने पर दंगे और नरसंहार को जन्म दिया। कश्मीर का मुद्दा, जो अनसुलझा रहा, भारत-पाक युद्ध का कारण बना।

विश्व भर की पुस्तकों से अंतर्दृष्टि

      1. “Freedom at Midnight” by Larry Collins and Dominique Lapierre: यह पुस्तक विभाजन की त्रासदी और गांधी की शांति की अपील पर प्रकाश डालती है। यह बोस की भूमिका को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करती है।
      2. “The Great Partition” by Yasmin Khan: यह विभाजन की मानवीय त्रासदी पर केंद्रित है और बोस की अनुपस्थिति को एक कारक मानती है।
      3. “India After Gandhi” by Ramachandra Guha: गुहा गांधी और बोस के मतभेदों को रेखांकित करते हैं।
      4. “His Majesty’s Opponent” by Sugata Bose: यह बोस की समावेशी विचारधारा और उनके क्रांतिकारी योगदान को दर्शाती है।
      5. “Brothers Against the Raj” by Leonard Gordon: यह बोस के सशस्त्र संघर्ष और इसके स्वतंत्रता पर प्रभाव को विश्लेषित करती है।

    निष्कर्ष

    भारत-पाकिस्तान का विभाजन ब्रिटिश नीतियों, धार्मिक विभेदों, और राजनीतिक मतभेदों का परिणाम था। महात्मा गांधी ने अहिंसा और एकता के माध्यम से विभाजन को रोकने की कोशिश की, जबकि सुभाष चंद्र बोस ने सशस्त्र क्रांति के जरिए स्वतंत्रता को तेज किया। बोस की अनुपस्थिति और गांधी की सीमित राजनीतिक शक्ति ने विभाजन को अपरिहार्य बनाया। दोनों नेताओं की विचारधाराएँ आज भी भारत के सामाजिक और राजनीतिक चेतना को प्रेरित करती हैं।

    2021 में, भारत ने 14 अगस्त को “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” घोषित किया, जो इस त्रासदी को याद करने और सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने का प्रयास है। गांधी और बोस की विरासत हमें एकता, शांति, और स्वतंत्रता के मूल्यों की ओर ले जाती है।

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