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ToggleHistory of Sun Temple Konark Odisha. – निर्माण कब और किसने किया?
कोणार्क सूर्य मंदिर भारत के ओडिशा राज्य में स्थित विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। इसे “ब्लैक पगोडा” भी कहते हैं। यह मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है और यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है। इसका सबसे खास पहलू यह है कि पूरा मंदिर एक विशाल रथ (सात घोड़ों वाला रथ) के आकार में बनाया गया है जिसमें 24 पहिए हैं। यह मंदिर भारतीय मंदिर वास्तुकला का सर्वोच्च नमूना माना जाता है।
1. निर्माण कब हुआ? → 13वीं शताब्दी, लगभग सन् 1250 ईस्वी में
कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था। अधिकांश इतिहासकार और पुरातत्वविद् मानते हैं कि इसका निर्माण कार्य सन् 1238 से 1250 ईस्वी के बीच पूरा हुआ। कुछ शिलालेखों और ताम्रपत्रों के आधार पर सबसे विश्वसनीय तारीख 1250 ईस्वी मानी जाती है। यह लगभग 12-15 साल तक चला था।
उस समय भारत में कई क्षेत्रीय राजवंश शासन कर रहे थे। दक्षिण में चोल, पांड्य, होयसल और उत्तर-पूर्व में पूर्वी गंग वंश बहुत शक्तिशाली था। पूर्वी गंग वंश का शासन आज के ओडिशा, आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों और पश्चिम बंगाल के दक्षिणी भाग तक फैला हुआ था। उनकी राजधानी कटक (काकटपुर) के पास थी। यह समय हिंदू मंदिर निर्माण का स्वर्ण युग था। इसी दौर में पुरी का जगन्नाथ मंदिर भी पूरा हुआ था और खजुराहो, भुवनेश्वर, तंजावुर जैसे कई महान मंदिर बन चुके थे।
राजा नरसिंहदेव प्रथम ने यह मंदिर इसलिए बनवाया क्योंकि:
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- उन्होंने बंगाल के मुस्लिम शासक तुग़रिल तुघान खान को 1243-44 ईस्वी में भारी हार दी थी। यह जीत इतनी बड़ी थी कि उस समय के इतिहासकार इसे “दक्षिण भारत की सबसे बड़ी सैन्य सफलता” कहते थे। मंदिर को अपनी इस जीत की स्मृति और सूर्य देवता का आशीर्वाद मानकर बनवाया।
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- सूर्य देवता पूर्वी गंग वंश के कुलदेवता (इष्टदेव) थे। गंग वंश के लोग खुद को “सूर्य वंशी” मानते थे।
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- उस समय ओडिशा में सूर्य उपासना बहुत प्रचलित थी। भुवनेश्वर के पास ही लगभग 700 साल पुराना सूर्य मंदिर पहले से था, लेकिन राजा कुछ ऐसा बनवाना चाहते थे जो दुनिया में कभी न देखा गया हो।
निर्माण में 12 साल लगे और लगभग 1200 कारीगरों ने दिन-रात काम किया। कहा जाता है कि इतना बड़ा मंदिर बनाने में उस समय की पूरी राज्य आय का बड़ा हिस्सा खर्च हुआ।
2. किसने बनवाया? → पूर्वी गंग वंश के महाराजा नरसिंहदेव प्रथम (1238-1264 ई.)
पूर्वी गंग वंश के सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध राजा नरसिंहदेव प्रथम ने यह मंदिर बनवाया। उनका शासनकाल 1238 ईस्वी से 1264 ईस्वी तक था। वे अनंगभीम देव तृतीय के पुत्र थे।
नरसिंहदेव प्रथम को इतिहास में बहुत वीर, धर्मपरायण और कला प्रेमी राजा माना जाता है। उनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें:
-वें बहुत बड़े योद्धा थे। 1243 में उन्होंने दिल्ली सल्तनत के गवर्नर तुग़रिल खान की विशाल सेना को हराया था। यह जीत इतनी बड़ी थी कि दिल्ली के सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद को भी डर लगने लगा था।
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- वे सूर्य भक्त थे। उनके शिलालेखों में खुद को “सूर्य पुत्र” और “गजपति” (हाथी पर सवार राजा) कहा गया है।
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- उन्होंने पुरी जगन्नाथ मंदिर को भी बहुत दान दिया और कई मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया।
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- कोणार्क मंदिर को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि माना। कहा जाता है कि वे स्वयं निर्माण कार्य की देखरेख करते थे और रोज़ मंदिर स्थल पर आते थे।
3. मुख्य स्थपति (मुख्य वास्तुकार) कौन था? → भिष्मदेव महापात्र (या शिवदास महापात्र)
पुराने शिलालेखों और लोक कथाओं में मुख्य कारीगर का नाम “भिष्म महापात्र” या “भिष्मदेव” मिलता है। कुछ जगहों पर इन्हें “शिवदास” भी कहा गया है। इन्हें विश्वकर्मा के वंशज माना जाता था। विश्वकर्मा हिंदू धर्म में सभी शिल्पकारों के देवता हैं।
लोक कथा बहुत प्रसिद्ध है: 1200 मुख्य कारीगर पुर्तगाल से विशेष पत्थर लाए और मंदिर बनाना शुरू किया। मंदिर का सबसे ऊपरी हिस्सा (कलश) लगाने का काम बहुत कठिन था। 12 साल बीत गए, लेकिन कलश नहीं लग पा रहा था। अगर कलश नहीं लगता तो पूरा मंदिर ढह सकता था। उस समय राजा नरसिंहदेव बहुत चिंतित थे।
तभी 12 साल का एक लड़का धूलीध्वज (या धर्मपद) वहाँ पहुँचा। वह मुख्य स्थपति भिष्मदेव का बेटा था। उसने एक ही दिन में कलश लगा दिया। लेकिन कारीगरों को डर था कि राजा उन सबको सजा देगा कि 12 साल तक काम न पूरा करने के लिए। इसलिए धर्मपद ने समुद्र में कूदकर अपनी जान दे दी। इस घटना से दुखी होकर मुख्य स्थपति भिष्मदेव भी गायब हो गए।
यह कथा भले ही लोक कथा हो, लेकिन इससे पता चलता है कि उस समय के कारीगरों को कितना सम्मान मिलता था और मंदिर निर्माण कितना जटिल काम था।
यह मंदिर सिर्फ एक पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि उस समय की वास्तुकला, इंजीनियरिंग, कला, धर्म और शक्ति का प्रतीक था। आज भी इसके केवल अवशेष बचे हैं, फिर भी दुनिया भर के पर्यटक और विद्वान इसे देखकर आश्चर्य करते हैं कि 800 साल पहले बिना आधुनिक मशीनों के ऐसा विशाल और सुंदर मंदिर कैसे बनाया गया।
कोणार्क सूर्य मंदिर की वास्तुकला –
कोणार्क सूर्य मंदिर को दुनिया की सबसे खूबसूरत और सबसे जटिल मंदिर वास्तुकला का उदाहरण माना जाता है। इसे देखकर आज भी इंजीनियर और वास्तुकार हैरान रह जाते हैं कि 800 साल पहले बिना क्रेन, बिना सीमेंट, बिना लोहे के ऐसा विशाल और सटीक मंदिर कैसे बनाया गया।
इसकी पूरी वास्तुकला एक “जीवंत सूर्य रथ” के रूप में बनाई गई है। आइए एक-एक करके सब कुछ विस्तार से समझते हैं।
1. पूरा मंदिर = सूर्य देव का रथ
हिंदू पुराणों में सूर्य देवता सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश में घूमते हैं। कोणार्क मंदिर ठीक वैसा ही एक विशाल रथ है जो पत्थर का बना है।
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- रथ के 24 पहिए हैं (12 जोड़ी) → ये 24 घंटे और साल के 12 महीने दर्शाते हैं।
- 7 घोड़े हैं → सप्ताह के 7 दिन और सूर्य के 7 रंग।
- रथ पूर्व दिशा की ओर मुड़ा हुआ है → सूर्योदय के समय सूर्य की पहली किरणें सीधी मंदिर के मुख्य द्वार पर पड़ती थीं।
2. मंदिर के तीन मुख्य भाग
कोणार्क में मूल रूप से तीन बड़े हिस्से थे (अब सिर्फ दो बचे हैं):
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- नटमंदिर (नृत्य मंडप) → सबसे आगे, जहाँ देवदासियाँ नृत्य करती थीं (अब भी खड़ा है) 2 जगमोहन (मुख्य सभामंडप) → बहुत ऊँचा और मजबूत, अभी भी खड़ा है 3 देउल या रेखा देउल (गर्भगृह) → सबसे ऊँचा टावर था, 70 मीटर (लगभग 230 फीट) ऊँचा था, अब पूरी तरह गिर चुका है
3. 24 विशाल पहिए – दुनिया में सबसे खूबसूरत हिस्सा
हर पहिया लगभग 3 मीटर (10 फीट) व्यास का है। ये सिर्फ सजावट नहीं हैं, बल्कि असली घूमने वाले पहियों की तरह बनाए गए हैं।
हर पहिए में:
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- 8 मोटे तीली (spokes)
- 8 पतले तीली
- बीच में सुंदर नक्काशी
इन पहियों को सूर्य घड़ी (सन डायल) की तरह इस्तेमाल किया जा सकता था! सुबह की छाया देखकर आप बता सकते थे कि कितना बज रहा है – आज भी यह काम करता है। एक पहिए पर सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक का समय सटीक दिखता है।
4. सात घोड़े
मंदिर के सामने सात बहुत बड़े घोड़े दौड़ते हुए दिखाए गए हैं।
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- ये हरे पत्थर (क्लोराइट) के बने हैं।
- हर घोड़े का नाम पुराणों में है – गायत्री, बृहती, उष्णिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप और पंक्ति।
- घोड़ों को सारथी अरुण खींच रहा है।
5. तीन तरह के पत्थर इस्तेमाल हुए
मंदिर तीन प्रकार के पत्थरों से बनाया गया है:
1 खोंडालाइट (पीला-भूरा पत्थर) → मुख्य संरचना 2 क्लोराइट (हरा पत्थर) → घोड़े और कुछ मूर्तियाँ 3 लेटराइट (लाल पत्थर) → अंदरूनी हिस्से | सबसे हैरानी की बात – इन पत्थरों को जोड़ने के लिए एक भी लोहे का कील या सीमेंट नहीं लगाया गया। सब पत्थर एक-दूसरे में फिट (इंटरलॉक) किए गए हैं।
6. मंदिर की दीवारों पर लाखों नक्काशी
कोणार्क को “कामुक मूर्तियों वाला मंदिर” भी कहते हैं, लेकिन सच यह है कि यहाँ हर तरह की जिंदगी की मूर्तियाँ हैं।
दीवारों पर आपको मिलेंगी:
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- सूर्य देव की विशाल मूर्तियाँ (तीन दिशाओं में – सुबह, दोपहर, शाम का रूप)
- हजारों हाथी, शेर, घोड़े, सैनिक
- राजा-रानी, दरबारी जीवन
- नृत्य मुद्राओं में देवदासियाँ
- संगीतकार, वादक यंत्र बजाते हुए
- प्रेमी युगल (मिथुन मूर्तियाँ) – ये जीवन चक्र, कामशास्त्र और गृहस्थ जीवन का प्रतीक हैं
- जानवर, पक्षी, फूल-पत्तियाँ
- रामायण-महाभारत के दृश्य
कुल मिलाकर लगभग 25,000 से अधिक छोटी-बड़ी मूर्तियाँ और नक्काशी हैं।
7. बहुत ऊँचा चुंबकीय मंदिर (एक रहस्य!)
पुराने यात्रियों (जैसे अबुल फजल) ने लिखा है कि मंदिर का सबसे ऊपरी कलश (चुंबक का बना हुआ था) इतना शक्तिशाली था कि समुद्र से गुजरते जहाजों की लोहे की कीलें खींच लेता था और जहाज डूब जाते थे। कुछ लोग मानते हैं कि मुख्य मूर्ति (सूर्य देव) को हवा में तैरता हुआ रखने के लिए बहुत बड़े चुंबक लगाए गए थे। आज भी कुछ पत्थरों में चुंबकीय गुण पाए जाते हैं।
8. सीढ़ियों और मंच का डिजाइन
मंदिर एक बहुत ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया है।
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- मुख्य सीढ़ियाँ सामने हैं, जिन पर दो विशाल शेर हाथी को कुचलते हुए दिखाए गए हैं (शक्ति का प्रतीक)।
- चारों तरफ छोटी-छोटी सीढ़ियाँ और रास्ते हैं।
- नटमंदिर में नृत्य के लिए अलग-अलग ऊँचाई के मंच बने हैं।
9. आज की स्थिति
700 साल पहले समुद्र तट और भूकंप के कारण मुख्य टावर (देउल) पूरी तरह गिर गया। 1903 में ब्रिटिश सरकार ने बचे हुए हिस्से को बचाने के लिए जगमोहन के अंदर रेत भर दी थी (आज भी वही रेत है)।अब सिर्फ जगमोहन और नटमंदिर खड़े हैं, बाकी सब खंडहर हैं।
कोणार्क की दीवारें पत्थर की किताब हैं। यहाँ एक भी जगह खाली नहीं है – हर इंच पर कोई न कोई मूर्ति, कोई नक्काशी, कोई कहानी उकेरी गई है। कुल मिलाकर लगभग 25,000 से 30,000 छोटी-बड़ी मूर्तियाँ हैं। ये मूर्तियाँ इतनी जीवंत हैं कि आज 800 साल बाद भी लगता है जैसे अभी बोल पड़ेंगी।
इन मूर्तियों को हम 10 मुख्य श्रेणियों में बाँटकर समझते हैं:
1. सूर्य देव की तीन विशाल मूर्तियाँ (सबसे महत्वपूर्ण)
मंदिर की तीन दिशाओं में सूर्य देव की बहुत बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ हैं (हर एक लगभग 8-10 फीट ऊँची):
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- पूर्व दिशा → बाल सूर्य (उगता हुआ सूर्य) – युवा, मुस्कुराता हुआ, कमल के फूल हाथ में
- दक्षिण दिशा → मध्यान्ह सूर्य (दोपहर का सूर्य) – सबसे तेजस्वी, राजसी वस्त्र, ऊँचे जूते पहने हुए
- पश्चिम दिशा → अस्ताचल सूर्य (डूबता सूर्य) – थका हुआ, शांत, चेहरे पर संध्या की लाली
ये तीनों मूर्तियाँ हरे क्लोराइट पत्थर की बनी हैं और आज भी चमकती हैं।
2. मिथुन मूर्तियाँ (प्रेमी युगल) – सबसे ज्यादा चर्चित
कोणार्क को “Erotic Temple” कहने की वजह यही मूर्तियाँ हैं, लेकिन ये सिर्फ कामुकता नहीं दिखातीं। ये जीवन के हर रंग को दिखाती हैं।
यहाँ आपको मिलेंगी:
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- गले मिलते प्रेमी
- चुंबन लेते युगल
- एक-दूसरे को सहलाते जोड़े
- अलग-अलग आसनों में संयोगरत दंपति (कामसूत्र से प्रेरित)
- गर्भवती स्त्री को पति का सहारा देते हुए
- बच्चे को जन्म देते हुए माँ
ये मूर्तियाँ सिर्फ ऊपरी दीवारों पर नहीं, छिपी हुई जगहों पर हैं। विद्वानों का कहना है कि ये गृहस्थ जीवन की महत्ता, काम को धर्म का हिस्सा मानने और तंत्र साधना के प्रतीक हैं।
3. नृत्य करती देवदासियाँ (सबसे सुंदर)
नटमंदिर की दीवारों पर सैकड़ों नृत्य मुद्राएँ हैं। हर देवदासी अलग-अलग भाव में हैं:
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- घुंघरू बाँधती हुई
- करताल बजाती हुई
- अलग-अलग नृत्य मुद्राएँ (ओडिसी नृत्य की सभी 64 मुद्राएँ यहाँ मिलती हैं)
- आईना देखती हुई
- बाल संवारती हुई
- सहेली से हँसते-बोलते हुए
इन मूर्तियों में इतनी बारीकी है कि नाखून, आभूषण, बालों की लट तक साफ दिखती है।
4. संगीतकार और वादक यंत्र
हर तरह के पुराने वाद्य यंत्र यहाँ हैं:
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- वीणा, मृदंग, ढोलक, शंख, झाँझ, मंजीरा
- बाँसुरी बजाता ग्वाला
- नृत्य के साथ ताल देने वाले पुरुष
5. राजसी जीवन के दृश्य
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- राजा सिंहासन पर बैठा, दरबारी चँवर डुलाते हुए
- राजा हाथी पर सवार, शिकार करते हुए
- रानी दासी से सिंगार करवाती हुई
- राजकुमारी झूला झूलती हुई
6. पशु-पक्षी और प्रकृति
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- हाथी की विशाल कतारें (हर हाथी अलग पोज में)
- शेर हाथी को मारते हुए (शक्ति का प्रतीक)
- घोड़े दौड़ते हुए
- मोर, हंस, तोता, मछली, मगरमच्छ
- कमल के फूल, लताएँ, बेल-बूटे इतने बारीक कि असली लगते हैं
7. रामायण-महाभारत और पुराणों के दृश्य
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- राम-रावण युद्ध
- कृष्ण का रासलीला
- शिव-पार्वती विवाह
- गणेश, कार्तिकेय, नंदी
8. सामान्य जन-जीवन की मूर्तियाँ (सबसे प्यारी)
यहाँ सबसे खास बात यह है कि राजा-रानी के साथ-साथ साधारण लोग भी हैं:
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- किसान हल जोतता हुआ
- मछुआरा जाल डालता हुआ
- लकड़हारा कुल्हाड़ी चलाता हुआ
- औरत अनाज पीसती हुई
- बच्चे खेलते हुए
- गुरु शिष्य को पढ़ाते हुए
- विदेशी व्यापारी (लंबी टोपी, दाढ़ी वाले) ऊँट पर सवार
ये दिखाता है कि उस समय का समाज कितना समृद्ध और विविध था।
9. युद्ध के दृश्य
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- सैनिक तलवार-ढाल लिए लड़ते हुए
- घुड़सवार सेना
- हाथी पर सवार योद्धा
- धनुष-बाण चलाते सैनिक
10. अलंकारिक और ज्यामितीय नक्काशी
दीवारों के बीच में बहुत बारीक जालीदार काम है:
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- फूलों की लड़ी
- स्वास्तिक, कमल, चक्र
- सात घोड़ों और 24 पहियों की छोटी-छोटी नक्काशी हर जगह
खास बातें जो आपको हैरान कर देंगी
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- एक भी मूर्ति एक-दूसरी से मिलती-जुलती नहीं है – हर चेहरा अलग है।
- स्त्रियों के केश सज्जा में 64 से ज्यादा तरह के जूड़े दिखाए गए हैं।
- एक मूर्ति में गिरaffe (जिराफ) भी है – उस समय भारत में जिराफ नहीं थे, इसका मतलब विदेशी व्यापार थे।
- कुछ मूर्तियों में यूरोपीय और चीनी चेहरे भी हैं।
कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण उद्देश्य
कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण सिर्फ एक पूजा-स्थल बनाने के लिए नहीं, बल्कि कई गहरे धार्मिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों से किया गया था। राजा नरसिंहदेव प्रथम (1238–1264 ई.) ने इसे बनवाया और इसके पीछे मुख्य दो कारण सबसे स्पष्ट हैं।
पहला और सबसे बड़ा उद्देश्य था – कलिंग एवं बंगाल पर मिली ऐतिहासिक जीत का जश्न और स्मारक। सन् 1243–44 में नरसिंहदेव ने बंगाल के शक्तिशाली मुस्लिम सूबेदार तुग़रिल तुघान ख़ान की विशाल सेना को पूरी तरह पराजित किया था। यह जीत इतनी बड़ी थी कि दिल्ली के सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद तक को डर लग गया।
उस समय के फारसी इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज ने लिखा है कि तुग़रिल की सेना का नामोनिशान मिट गया। राजा ने इस विजय को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि माना और इसे हमेशा के लिए अमर करने के लिए विश्व का सबसे भव्य सूर्य मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। इसलिए कोणार्क को “विजय-स्तम्भ” भी कहा जाता है – पत्थर का वह स्मारक जो कहता है, “हिंदू शक्ति अभी जीवित है।”
दूसरा उद्देश्य पूरी तरह धार्मिक था। पूर्वी गंग वंश के लोग सूर्य को अपना कुलदेवता मानते थे और स्वयं को सूर्यवंशी कहते थे। ओडिशा में सूर्य की पूजा बहुत प्राचलित थी; उसे यहाँ “बिरंचि नारायण” या “त्रि-काल सूर्य” कहते थे। राजा नरसिंहदेव ने अपने इष्टदेव को ऐसा अनुपम मंदिर समर्पित किया जो दुनिया में कहीं न हो। मंदिर का रथ-रूप इसलिए चुना गया क्योंकि पुराणों में सूर्य देव सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं। इस रथ को पत्थर में उतारकर राजा ने सूर्य भगवान को सचमु चलते-फिरते स्वरूप में स्थापित कर दिया।History of Sun Temple Konark Odisha
इसके अलावा दो गौण लेकिन महत्वपूर्ण उद्देश्य भी थे:
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- ओडिशा की राजधानी को धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाना। पुरी का जगन्नाथ मंदिर के बाद कोणार्क दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ बनना था।
- उस समय के सबसे कुशल शिल्पियों को एकत्र करके भारतीय मंदिर-वास्तुकला की सर्वोच्च ऊँचाई छूना।
संक्षेप में कहें तो कोणार्क सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि नरसिंहदेव का “विजय गान”, सूर्य भक्ति का “महाकाव्य” और प्राचीन ओडिशा की शक्ति, समृद्धि एवं कला का जीवंत दस्तावेज़ है। यही कारण है कि 800 साल बाद भी यह मंदिर देखकर हर व्यक्ति के मन में गर्व और विस्मय एक साथ जागता है।
कोणार्क सूर्य मंदिर की सबसे रहस्यमयी बातें
कोणार्क को दुनिया के सबसे रहस्यमयी मंदिरों में सबसे ऊपर गिना जाता है। यहाँ की कई बातें आज भी वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के समझ से बाहर हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध है “चुंबक वाला रहस्य”।
1. हवा में तैरता हुआ मुख्य सूर्य मूर्ति और चुंबकीय कलश
पुराने यात्रियों और लोक-कथाओं के अनुसार मंदिर का सबसे ऊँचा हिस्सा (लगभग 230 फीट ऊँचा टावर) पूरी तरह खाली था। गर्भगृह में सूर्य देव की विशाल मूर्ति हवा में तैरती हुई लगती थी – ज़मीन को नहीं छूती थी! इसे संभव बनाने के लिए दो बहुत बड़े-बड़े चुंबक लगाए गए थे:
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- एक चुंबक सबसे ऊपर कलश (crown) में
- दूसरा चुंबक नीचे आधार में
दोनों चुंबकों के बीच इतना बल था कि बीच में रखी सूर्य मूर्ति (जो लोहे-ताँबे की बनी थी) हवा में स्थिर रहती थी। अबुल फज़ल (अकबर का दरबारी इतिहासकार) ने अपनी किताब “आइन-ए-अकबरी” में लिखा है: “कोणार्क का कलश इतना शक्तिशाली चुंबक था कि समुद्र से गुजरते जहाज़ों की लोहे की कीलें खींच लेता था और जहाज़ डूब जाते थे।”
2. जहाज़ों का नेविगेशन पॉइंट और ब्लैक पगोडा
कोणार्क समुद्र तट से सिर्फ 3 किलोमीटर दूर था। उस समय यहाँ से बंगाल की खाड़ी पूरी तरह साफ दिखती थी। यूरोपीय नाविक इसे “Black Pagoda” कहते थे (पुरी के जगन्नाथ मंदिर को “White Pagoda” कहते थे)। दोनों को देखकर जहाज़ वाले अपनी दिशा तय करते थे। लेकिन चुंबकीय कलश की वजह से जहाज़ों का कम्पास पागल हो जाता था। लोहे के हिस्से खींचे चले आते थे और कई जहाज़ चट्टानों से टकराकर डूब गए। पुर्तगाली, डच और अंग्रेज़ नाविकों के पुराने रिकॉर्ड में इसका ज़िक्र मिलता है।History of Sun Temple Konark Odisha.
3. चुंबक को क्यों और किसने निकाला?
16वीं–17वीं सदी तक आते-आते इतने जहाज़ डूब चुके थे कि मुग़ल और बाद में पुर्तगाली अधिकारियों ने इसे खतरा मान लिया। लोक-कथा है कि 1620–1630 के आसपास पुर्तगालियों या मुग़ल सेना ने मिलकर मुख्य टावर को तोड़ दिया और ऊपर का विशाल चुंबकीय कलश (जिसका वज़न कई टन था) निकालकर समुद्र में फेंक दिया। इसके बाद ही मुख्य देउल (टावर) पूरी तरह ढह गया। आज भी पुरातत्वविद् कहते हैं कि टावर का गिरना सामान्य भूकंप या लहरों से नहीं हुआ – बल्कि जान-बूझकर तोड़ा गया था।
4. आज भी बचे हुए चुंबकीय रहस्य
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- मंदिर के कुछ पत्थर आज भी कम्पास को प्रभावित करते हैं। कई पर्यटक बताते हैं कि उनके फोन का कम्पास वहाँ गड़बड़ करने लगता है।
- जगमोहन की छत पर आज भी कुछ बड़े-बड़े पत्थर हैं जिन्हें उठाना असंभव है, लेकिन वे एक-दूसरे में इस तरह फिट हैं कि लोहे की कील के बिना भी हिले नहीं।
- 1980 के दशक में ASI ने रडार सर्वे किया था – उसके अनुसार गर्भगृह के नीचे बहुत बड़ी खाली जगह है, मानो कोई बड़ा चुंबक अभी भी दबा हो।
5. अन्य छोटे-छोटे रहस्य
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- मंदिर के 24 पहियों में से कुछ आज भी इतने सटीक हैं कि सूर्य घड़ी की तरह सही समय बताते हैं।
- सूर्योदय के ठीक समय पर पहली किरण सीधे गर्भगृह में पड़ती थी – आज भी नटमंदिर में यह होता है।
- मंदिर के पास खुदाई में कभी-कभी ऐसे पत्थर मिलते हैं जो एक-दूसरे को चिपकाए रखते हैं, बिना किसी गोंद के।
संक्षेप में कहें तो कोणार्क सिर्फ मंदिर नहीं, 13वीं सदी का एक इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक चमत्कार था। उस समय के लोग चुंबक, खगोल विज्ञान और स्थापत्य कला में हमसे सैकड़ों साल आगे थे। जिस दिन हम उस चुंबकीय कलश को फिर से ढूंढ निकालेंगे, उस दिन कोणार्क का सबसे बड़ा रहस्य खुल जाएगा। तब तक यह काला पगोडा चुपचाप खड़ा है और हमें 800 साल पुराना सवाल पूछता रहता है: “हमने जो बनाया, क्या तुम आज भी बना सकते हो?History of Sun Temple Konark Odisha.
यही कोणार्क का सबसे बड़ा रहस्य है।
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