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परिचय: जाति का जाल और चुनावी खेल |
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। यहां हर पांच साल में लाखों-करोड़ों लोग अपने मतदान के जरिए सरकार चुनते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि इन चुनावों में विकास की बातें, अर्थव्यवस्था की चर्चा या शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों से ज्यादा क्या असर डालता है? जवाब है – जाति। जी हां, जाति, जो सदियों से भारतीय समाज में गहरी जड़ें जमाए बैठी है, आज भी चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बनी हुई है। Elections and Caste in India.
2024 के लोकसभा चुनावों में, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को उम्मीद से कम सीटें मिलीं, तो राजनीतिक विश्लेषकों ने एक बार फिर जाति की भूमिका पर जोर दिया। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने जाति आधारित जनगणना का मुद्दा जोर-शोर से उठाया, जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दलित मतदाताओं को अपनी ओर खींचा। वहीं, भाजपा ने हिंदुत्व की विचारधारा के जरिए जातीय विभाजनों को पार करने की कोशिश की, लेकिन पूरी तरह सफल नहीं हो पाई।Elections and Caste in India.
अब 2025 में, जब हम इस लेख को लिख रहे हैं, एक नया मोड़ आया है। भारत सरकार ने फैसला किया है कि अगली जनगणना में जाति के आंकड़ों को शामिल किया जाएगा। यह फैसला अप्रैल 2025 में कैबिनेट ने मंजूर किया, और अब मई-जून तक इस पर चर्चाएं गर्म हैं। यह जनगणना, जो कोविड-19 की वजह से देरी से हो रही है, अब 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत में होने की उम्मीद है। Elections and Caste in India.
सरकार का कहना है कि इससे सामाजिक न्याय सुनिश्चित होगा, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक चाल बता रहा है। उदाहरण के लिए, बिहार में पहले से ही जाति जनगणना हो चुकी है, और वहां आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 65% कर दी गई, जो सुप्रीम कोर्ट की 50% की सीमा से ज्यादा है। यह मुद्दा 2029 के अगले लोकसभा चुनावों को और ज्यादा प्रभावित कर सकता है।Elections and Caste in India.
इस लेख में हम जाति और चुनावों के इस जटिल रिश्ते को सरल शब्दों में समझेंगे। हम इतिहास से शुरू करेंगे, वर्तमान की घटनाओं पर नजर डालेंगे, और भविष्य की संभावनाओं पर विचार करेंगे। यह लेख सिर्फ सूखे तथ्यों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि एक मानवीय नजरिया है। Elections and Caste in India.
हम देखेंगे कि जाति कैसे करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है, कैसे यह उम्मीदें जगाती है और कैसे निराशा भी पैदा करती है। कल्पना कीजिए, एक गांव में रहने वाला एक युवा किसान, जो अपनी जाति के आधार पर वोट देता है, लेकिन चुनाव के बाद भी उसकी समस्याएं वैसी की वैसी रहती हैं। क्या जाति राजनीति लोकतंत्र को मजबूत कर रही है या इसे कमजोर? आइए, इस सवाल का जवाब तलाशते हैं। हम सरल भाषा में हर हिस्से को विस्तार से समझाएंगे, ताकि कोई भी पाठक आसानी से ग्रहण कर सके।Elections and Caste in India.
जाति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: प्राचीन काल से आधुनिक राजनीति तक – एक विस्तृत नजर
जाति व्यवस्था भारत की सबसे पुरानी सामाजिक संरचना है। इसे समझने के लिए हमें हजारों साल पीछे जाना पड़ेगा। वेदों और मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों में जाति का जिक्र मिलता है। शुरू में यह व्यवसाय पर आधारित थी – ब्राह्मण ज्ञान और पूजा-पाठ के लिए, क्षत्रिय शासन और युद्ध के लिए, वैश्य व्यापार के लिए और शूद्र सेवा कार्यों के लिए।
लेकिन समय के साथ यह जन्म-आधारित हो गई, मतलब बच्चा जिस घर में पैदा होता है, उसी जाति का हो जाता है, और यह कठोर नियमों से बंधी। सरल शब्दों में कहें तो, यह एक ऐसा सिस्टम था जो लोगों को उनके जन्म के आधार पर ऊंच-नीच में बांटता था। ऊंची जातियां विशेषाधिकार पाती थीं, जबकि निचली जातियां भेदभाव झेलती थीं।
ब्रिटिश काल में यह और मजबूत हुआ। ब्रिटिश शासकों ने 1871 में पहली जनगणना की, जिसमें जातियों को वर्गीकृत किया गया। इससे जातीय पहचान और मजबूत हुई, क्योंकि लोगों को अपनी जाति के आधार पर गिना जाने लगा। ब्रिटिशों ने ‘डिवाइड एंड रूल’ की नीति अपनाई, जिसमें जातियों को एक-दूसरे के खिलाफ भड़काया जाता था। उदाहरण के लिए, 1909 के मोर्ले-मिंटो सुधारों में मुसलमानों को अलग प्रतिनिधित्व दिया गया, जो बाद में जाति आधारित राजनीति की नींव बना।Elections and Caste in India.
स्वतंत्रता के बाद, डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महान नेता ने संविधान में जातीय भेदभाव को खत्म करने की कोशिश की। अनुच्छेद 15 भेदभाव को रोकता है, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को अपराध मानता है। लेकिन जाति राजनीति में घुस गई। 1950 में, कांग्रेस सरकार ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षण लागू किया। यह चुनावी रणनीति का हिस्सा बना, क्योंकि दलित और आदिवासी वोटरों को लुभाने का तरीका था। Elections and Caste in India.
1980 के दशक में वी.पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं, जिसमें ओबीसी को 27% आरक्षण दिया गया। इससे विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन जाति आधारित पार्टियां उभरीं – जैसे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (एसपी) यादवों पर टिकी, बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) दलितों पर।Elections and Caste in India.
एक मानवीय उदाहरण लें। मेरे एक परिचित के दादाजी, जो दलित थे, बताते थे कि 1950 के दशक में गांव में उन्हें कुएं से पानी नहीं भरने दिया जाता था। चुनावों में उनका वोट मायने रखता था, लेकिन जीतने के बाद नेता भूल जाते थे। आज 2025 में भी, गुजरात जैसे राज्यों में दलितों को नाई की दुकान पर बाल कटवाने की इजाजत नहीं मिलती।
इतिहास बताता है कि जाति ने समाज को बांटा, लेकिन राजनीति में इससे पिछड़े वर्गों को आवाज भी मिली। सरलता से समझें: जाति जैसे एक पुराना पेड़ है, जिसकी जड़ें गहरी हैं, और राजनीति उसकी शाखाओं को चुनावी फल देने के लिए इस्तेमाल करती है।Elections and Caste in India.
चुनावों में जाति की भूमिका: वोट बैंक की राजनीति – गहराई से समझें
आज के भारत में चुनाव बिना जाति के सोचे नहीं जा सकते। राजनीतिक दल जातीय समीकरणों पर टिके होते हैं। सरल शब्दों में, वोट बैंक मतलब एक समूह का वोट जो किसी पार्टी को मिलता है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में यादव, जाटव (दलित), कुर्मी और ब्राह्मण वोट निर्णायक हैं। Elections and Caste in India.
2024 के चुनावों में, एसपी ने यादव-मुस्लिम गठजोड़ से 37 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी को साधकर 240 सीटें हासिल कीं। बिहार में नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) कुर्मी और कोइरी पर निर्भर है, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) यादव-मुस्लिम वोट बैंक पर।Elections and Caste in India.
यह कैसे काम करता है? दल उम्मीदवार चुनते समय जाति देखते हैं। एक सर्वे के मुताबिक, 70% मतदाता अपनी जाति के उम्मीदवार को प्राथमिकता देते हैं। 2014 में मोदी की जीत का एक कारण था ओबीसी वोटों का समर्थन, क्योंकि मोदी खुद ओबीसी हैं। लेकिन 2024 में दलित वोट खिसक गए, क्योंकि विपक्ष ने ‘संविधान खतरे में’ का नारा दिया, जो आरक्षण खत्म होने की आशंका से जुड़ा था।Elections and Caste in India.
मानवीय पक्ष से देखें। एक किसान, जो कुर्मी जाति का है, विकास की बजाय अपनी जाति के नेता को वोट देता है, क्योंकि उसे लगता है कि वही उसकी मदद करेगा। लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता। नेता चुनाव जीतकर दिल्ली चले जाते हैं, और गांव की सड़कें वैसी ही टूटी रहती हैं। फिर भी, जाति उम्मीद देती है। जैसे बीएसपी की मायावती ने 2007 में दलितों को मुख्यमंत्री बनाकर इतिहास रचा। Elections and Caste in India.
2025 में जाति जनगणना से ओबीसी की संख्या पता चलेगी, जो वोट बैंक को और प्रभावित करेगी। सरलता से: जाति चुनाव में जैसे एक चाबी है, जो वोटों का ताला खोलती है, लेकिन अक्सर जनता को सिर्फ वादे मिलते हैं।
आरक्षण का व्यवस्था: चुनावी हथियार है या सामाजिक न्याय? – विस्तार से विश्लेषण
आरक्षण जाति राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा है। संविधान ने एससी को 15%, एसटी को 7.5% आरक्षण दिया, जो शिक्षा और नौकरियों में है। 1990 में ओबीसी को 27% मिला। चुनावों में यह हमेशा गर्म रहता है। 2024 में कांग्रेस ने जाति जनगणना का वादा किया, जिससे ओबीसी वोट मिले। अब 2025 की जनगणना में जाति शामिल होने से आरक्षण की मांग बढ़ सकती है, क्योंकि ओबीसी की संख्या ज्यादा निकल सकती है। Elections and Caste in India.
फायदे: आरक्षण ने पिछड़ों को मौका दिया। एक अध्ययन कहता है कि आरक्षित सीटों से महिलाओं की भागीदारी बढ़ी। लेकिन नुकसान: यह विभाजन बढ़ाता है। सामान्य वर्ग के युवा सोचते हैं कि उनकी मेहनत बेकार है। 2023 में बिहार में आरक्षण बढ़ाने पर विरोध हुए। 2025 में, अगर ओबीसी कोटा बढ़ा, तो सुप्रीम कोर्ट में चुनौती आएगी।
एक कहानी: मेरी एक दोस्त, ओबीसी से, आरक्षण से आईआईटी पहुंची। लेकिन सहपाठी कहते, “तुम्हें आसान था।” वह जवाब देती, “मैंने भी रातें जागकर पढ़ाई की।” आरक्षण न्याय है, लेकिन इसे चुनावी हथियार बनाना गलत है। सरल शब्दों में: आरक्षण जैसे एक सीढ़ी है पिछड़ों के लिए, लेकिन अगर इसे राजनीति में दुरुपयोग किया जाए, तो समाज टूट सकता है।Elections and Caste in India.
केस स्टडी: विभिन्न राज्यों में जाति की राजनीति – उदाहरणों के साथ
उत्तर प्रदेश: सबसे बड़ा राज्य, जाति का गढ़। 1990 के बाद एसपी यादवों, बीएसपी जाटवों पर टिकी। 2022 विधानसभा में अखिलेश ने गठबंधन से जीता, लेकिन 2024 में भाजपा ने वापसी की।Elections and Caste in India.
बिहार: लालू यादव ने 1990 में मंडल से सत्ता ली। 2025 में चुनाव हैं, जहां युवा नौकरियां मांग रहे, लेकिन जाति अभी भी प्रमुख। एक सर्वे कहता है कि युवा जाति से ऊपर नौकरियां चाहते हैं।Elections and Caste in India.
दक्षिण भारत: तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियां जाति विरोधी, लेकिन आंध्र में वाईएसआर कांग्रेस रेड्डी वोटों पर। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन 2024 में असर डाला।Elections and Caste in India.
उदाहरण: 2019 में मोदी की जीत में जाति गठबंधन महत्वपूर्ण था। सरलता से: हर राज्य में जाति अलग रंग दिखाती है, लेकिन विभाजन हर जगह है।Elections and Caste in India.
लोकतंत्र पर प्रभाव: सकारात्मक और नकारात्मक – संतुलित दृष्टि
सकारात्मक: जाति ने हाशिए वाले समुदायों को सशक्त किया। मायावती का मुख्यमंत्री बनना उदाहरण। यह लोकतंत्र को समावेशी बनाता है।
नकारात्मक: राष्ट्रीय मुद्दे पीछे छूटते हैं, भ्रष्टाचार बढ़ता। 2024 में आर्थिक असंतोष ने जातीय विभाजन गहराया। हिंदुत्व ने कोशिश की, लेकिन जाति मजबूत रही।
मानवीय: एक गांव में चुनाव के बाद दो जातियां दुश्मन बन जाती हैं। क्या यही लोकतंत्र है?
भविष्य की संभावनाएं: 2025 और उसके बाद का समय
2025 की जनगणना से आरक्षण बढ़ सकता है। राहुल गांधी इसे उठा रहे। युवा, शहरीकरण से जाति कम हो सकती है, लेकिन एक्स पर चर्चाएं बताती कि अभी जीवित है।
समाधान: नारी शिक्षा, रोजगार। जब वोट विकास पर होंगे, जाति पीछे छूटेगी।
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निष्कर्ष: आगे की राह
जाति लोकतंत्र की दोधारी तलवार है। इस विस्तृत चर्चा में हमने देखा कि यह कैसे चुनाव आकार देती है। लेकिन लोकतंत्र लोगों का है। जाति से ऊपर उठें, तो सच्ची आजादी मिलेगी। क्या आप तैयार हैं?