Cell Body ya Soma The Control Center of a Cell

कोशिका काय (Cell body ya Soma the control center of a cell)

कोशिका काय या सोमा तंत्रिका कोशिका (neuron) का मुख्य गोलाकार भाग होता है, जिसमें केंद्रक (न्यूक्लियस) और अधिकांश अंगकाय (organelles) जैसे माइटोकॉन्ड्रिया, राइबोसोम, गॉल्जी काय, रफ एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम (निस्ल बॉडीज) तथा लाइसोसोम स्थित होते हैं। यह न्यूरॉन का मेटाबॉलिक तथा नियंत्रण केंद्र है, जहाँ प्रोटीन संश्लेषण, ऊर्जा उत्पादन (ATP) और कोशिका की रखरखाव संबंधी सभी प्रमुख जैविक क्रियाएँ होती हैं।

सोमा से डेंड्राइट्स (संकेत ग्रहण करने वाले) और एक्सॉन (संकेत प्रसारित करने वाला) निकलते हैं। यह डेंड्राइट्स से प्राप्त संकेतों को एकीकृत करता है और एक्सॉन हिलॉक के माध्यम से एक्शन पोटेंशियल उत्पन्न करता है। निस्ल बॉडीज प्रोटीन निर्माण में विशेष भूमिका निभाते हैं, जो न्यूरॉन की लंबी संरचना के लिए आवश्यक है। सोमा की क्षति से न्यूरॉन की मृत्यु हो सकती है, क्योंकि यह कोशिका का जीवन केंद्र है। सामान्य कोशिकाओं में इसे साइटोन या पेरिकैरियन भी कहा जाता है।

Cell body ya Soma the control center of a cell

कोशिका काय (Soma) की संरचना

कोशिका काय (न्यूरॉन का मुख्य भाग) में कई छोटे-छोटे हिस्से होते हैं। इन्हें हम घर के कमरों की तरह समझ सकते हैं – हर कमरा अपना अलग काम करता है। नीचे हर एक को बहुत सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि कोई भी आसानी से समझ सके:

1.)  न्यूक्लियस :

न्यूक्लियस (Nucleus) कोशिका काय (soma) का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय भाग होता है। इसे कोशिका का “कंट्रोल सेंटर” या “दिमाग” कहा जाता है, क्योंकि यहीं से कोशिका के सारे कामों का निर्देशन होता है। तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) में न्यूक्लियस आमतौर पर बड़ा, गोलाकार और सोमा के बीच में स्थित होता है। न्यूरॉन्स में यह बहुत सक्रिय होता है, क्योंकि न्यूरॉन लंबे समय तक जीवित रहते हैं और लगातार प्रोटीन बनाते रहते हैं।

न्यूक्लियस  संरचना:
  • न्यूक्लियर एन्वेलप (Nuclear Envelope): यह दोहरी झिल्ली होती है जो न्यूक्लियस को साइटोप्लाज्म से अलग रखती है। इसमें न्यूक्लियर पोर (pores) होते हैं, जिनसे RNA और प्रोटीन अंदर-बाहर आ-जा सकते हैं।
  • क्रोमेटिन (Chromatin): न्यूक्लियस के अंदर डीएनए और प्रोटीन का जाल होता है, जो क्रोमेटिन कहलाता है। जब कोशिका विभाजित नहीं हो रही होती, तो यह फैला रहता है।
  • न्यूक्लियोलस (Nucleolus): यह न्यूक्लियस का सबसे गहरा और बड़ा भाग होता है। न्यूरॉन्स में न्यूक्लियोलस बहुत बड़ा और स्पष्ट दिखता है, क्योंकि यहां राइबोसोमल RNA (rRNA) और राइबोसोम बनते हैं – जो प्रोटीन संश्लेषण के लिए जरूरी हैं।
  • न्यूरॉन्स में न्यूक्लियस यूक्रोमेटिन (हल्का क्रोमेटिन) से भरपूर होता है, जो जीन एक्सप्रेशन की उच्च गतिविधि दिखाता है।
न्यूक्लियस कार्य:
  • आनुवंशिक जानकारी का भंडारण: न्यूक्लियस में डीएनए होता है, जो कोशिका के सारे प्रोटीन बनाने के ब्लूप्रिंट रखता है।
  • जीन एक्सप्रेशन नियंत्रण: यहां DNA से mRNA बनता है (ट्रांसक्रिप्शन), जो साइटोप्लाज्म में जाकर प्रोटीन बनाता है। न्यूरॉन्स में यह बहुत जरूरी है, क्योंकि उन्हें आयन चैनल, रिसेप्टर्स और स्ट्रक्चरल प्रोटीन लगातार चाहिए होते हैं।
  • राइबोसोम उत्पादन: न्यूक्लियोलस में राइबोसोम सबयूनिट्स बनते हैं, जो निस्ल बॉडीज में प्रोटीन संश्लेषण के लिए इस्तेमाल होते हैं।
  • न्यूरॉन की लंबी उम्र और कार्यक्षमता बनाए रखना – बिना न्यूक्लियस के न्यूरॉन जीवित नहीं रह सकता।
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न्यूरॉन में विशेषताएँ:
  • न्यूक्लियस बड़ा और गोल होता है, अक्सर सोमा के केंद्र में।
  • निस्ल स्टेनिंग में यह हल्का (पेल) दिखता है, जबकि आसपास के निस्ल बॉडीज गहरे नीले-बैंगनी रंग के होते हैं।
  • एक्सॉन क्षति (axonal injury) के समय क्रोमेटोलिसिस में न्यूक्लियस एक तरफ खिसक जाता है और सूज जाता है – यह रिजेनरेशन का संकेत है।
सरल उदाहरण:

न्यूक्लियस को शहर का “मेयर ऑफिस” समझें – जहां सारे नियम (डीएनए) रखे जाते हैं और आदेश (mRNA) जारी होते हैं, ताकि शहर (न्यूरॉन) ठीक से चले। न्यूक्लियोलस उसका “फैक्ट्री विभाग” है जो कार्यकर्ता (राइबोसोम) बनाता है।

2.) साइटोप्लाज्माा :

साइटोप्लाज्मा  कोशिका का वह जेल जैसा तरल भाग होता है जो कोशिका झिल्ली (प्लाज्मा मेम्ब्रेन) और न्यूक्लियस के बीच स्थित होता है। तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) के कोशिका काय (सोमा) में साइटोप्लाज्म बहुत महत्वपूर्ण है – इसे न्यूरॉन का “कार्यशाला” या “खाली जगह” कह सकते हैं, जहां सारी जैविक क्रियाएँ होती हैं। यह कोशिका का 70-80% भाग पानी से बना होता है, लेकिन इसमें प्रोटीन, आयन, ग्लूकोज और अन्य पदार्थ घुले रहते हैं।

साइटोप्लाज्म  संरचना:

साइटोप्लाज्म को दो मुख्य भागों में बाँटा जाता है:

  • साइटोसॉल (Cytosol): यह तरल भाग है – पानी जैसा गाढ़ा जेल, जिसमें आयन (जैसे पोटैशियम, सोडियम), छोटे अणु और घुलनशील प्रोटीन होते हैं। यह साइटोप्लाज्म का 70% हिस्सा है।
  • अंगकाय (Organelles): इसमें माइटोकॉन्ड्रिया, राइबोसोम, गॉल्जी काय, एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम (निस्ल बॉडीज), लाइसोसोम आदि शामिल होते हैं।
  • साइटोस्केलेटन (Cytoskeleton): सूक्ष्म नलिकाएँ (माइक्रोट्यूब्यूल्स), सूक्ष्म तंतु (माइक्रोफिलामेंट्स) और मध्यवर्ती तंतु (इंटरमीडिएट फिलामेंट्स) जो कोशिका को आकार देते हैं और पदार्थों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं। न्यूरॉन्स में न्यूरोफिलामेंट्स बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

न्यूरॉन में साइटोप्लाज्म सोमा और डेंड्राइट्स में ज्यादा होता है, लेकिन एक्सॉन में कम।

साइटोप्लाज्म  कार्य:
  • मेटाबॉलिक क्रियाएँ: ग्लाइकोलिसिस (ग्लूकोज से ऊर्जा बनाना) जैसी मुख्य प्रतिक्रियाएँ यहीं होती हैं।
  • पदार्थ परिवहन: अंगकायों के बीच सामग्री ले जाना – जैसे प्रोटीन को गॉल्जी काय से एक्सॉन तक।
  • संकेत एकीकरण: डेंड्राइट्स से आने वाले संकेतों को प्रोसेस करना।
  • कोशिका को आकार और सहारा: साइटोस्केलेटन से न्यूरॉन की लंबी संरचना बनी रहती है।
  • न्यूरॉन में यह प्रोटीन संश्लेषण (निस्ल बॉडीज से), ऊर्जा उत्पादन (माइटोकॉन्ड्रिया से) और कचरा साफ करने (लाइसोसोम से) का मुख्य स्थान है।
न्यूरॉन में विशेषताएँ:
  • न्यूरॉन का साइटोप्लाज्म बहुत सक्रिय होता है, क्योंकि न्यूरॉन विभाजित नहीं होते और लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप में यह घना दिखता है – ढेर सारे अंगकाय और साइटोस्केलेटन से भरा।
  • क्षति होने पर (जैसे चोट में) साइटोप्लाज्म में बदलाव आते हैं, जैसे क्रोमेटोलिसिस।
सरल उदाहरण:

साइटोप्लाज्म को घर की “रसोई और लिविंग रूम” समझें – जहां खाना बनता है (मेटाबॉलिज्म), सामान रखा जाता है (अंगकाय) और सब कुछ चलता-फिरता है (परिवहन)। बिना इसके कोशिका जीवित नहीं रह सकती।

3.)माइटोकॉन्ड्रिया:

माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का “पावर हाउस” (Powerhouse of the cell) कहा जाता है। यह कोशिका काय (सोमा), डेंड्राइट्स और एक्सॉन में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण अंगकाय है। तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) में माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या बहुत ज्यादा होती है, क्योंकि न्यूरॉन बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च करता है – जैसे संकेत भेजना, आयन पंप चलाना और प्रोटीन बनाना। एक न्यूरॉन में हजारों माइटोकॉन्ड्रिया हो सकते हैं।

माइटोकॉन्ड्रिया संरचना:
  • आकार: छोटे गोलाकार या लंबे छड़ जैसे (0.5-10 माइक्रोमीटर लंबे)।
  • दोहरी झिल्ली: बाहरी झिल्ली चिकनी और अंदरूनी झिल्ली मुड़ी हुई (क्रिस्टी कहलाती हैं)। क्रिस्टी से सतह क्षेत्र बढ़ता है, जिससे ज्यादा ऊर्जा बन सकती है।
  • मैट्रिक्स: अंदर का जेल जैसा भाग, जिसमें डीएनए (mtDNA), राइबोसोम और एंजाइम होते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया अपना कुछ डीएनए खुद रखते हैं।
  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप में ये डबल मेम्ब्रेन और क्रिस्टी स्पष्ट दिखते हैं।
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माइटोकॉन्ड्रिया कार्य:
  • ऊर्जा उत्पादन: ऑक्सीडेटिव फॉस्फोरिलेशन और साइट्रिक एसिड साइकिल (क्रेब्स साइकिल) से ग्लूकोज और फैट से ATP (एडिनोसिन ट्राइफॉस्फेट) बनाते हैं। ATP कोशिका की “करेंसी” है – न्यूरॉन इसे संकेत प्रसारण (एक्शन पोटेंशियल), आयन पंप (Na+/K+ पंप) और परिवहन के लिए इस्तेमाल करता है।
  • कैल्शियम नियंत्रण: कैल्शियम आयनों को स्टोर करते हैं, जो संकेत प्रसारण में महत्वपूर्ण हैं।
  • अपोप्टोसिस (कोशिका मृत्यु): क्षति होने पर सिग्नल देते हैं कि कोशिका मर जाए।
  • न्यूरॉन्स में ये गतिशील होते हैं – माइक्रोट्यूब्यूल्स पर चलकर सोमा से एक्सॉन टर्मिनल तक जाते हैं, जहां सबसे ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ती है (सिनेप्स पर)।
न्यूरॉन में विशेषताएँ:
  • न्यूरॉन्स ऊर्जा की बहुत मांग करते हैं (मस्तिष्क कुल शरीर की 20% ऊर्जा इस्तेमाल करता है)।
  • माइटोकॉन्ड्रिया की खराबी से न्यूरोडिजेनरेटिव रोग होते हैं, जैसे पार्किंसन, अल्जाइमर, ALS – क्योंकि न्यूरॉन ऊर्जा के बिना जीवित नहीं रह सकते।
  • ये फ्यूजन (मिलना) और फिशन (टूटना) करते रहते हैं, ताकि स्वस्थ रहें।
सरल उदाहरण:

माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका की “बिजली की फैक्ट्री” समझें। जैसे पावर प्लांट ईंधन (ग्लूकोज) से बिजली (ATP) बनाता है, वैसे ही ये न्यूरॉन को काम करने की ताकत देते हैं। अगर फैक्ट्री बंद हो जाए, तो पूरा शहर (न्यूरॉन) अंधेरे में डूब जाता है!

4.) राइबोसोम :

राइबोसोम को कोशिका की “प्रोटीन फैक्ट्री” कहा जाता है। ये बहुत छोटे (20-30 नैनोमीटर) कण जैसे अंगकाय हैं जो प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) का मुख्य काम करते हैं। तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) के कोशिका काय (सोमा) में राइबोसोम बहुत ज्यादा मात्रा में होते हैं, क्योंकि न्यूरॉन को लगातार नए प्रोटीन बनाने पड़ते हैं – जैसे न्यूरोट्रांसमीटर रिसेप्टर्स, आयन चैनल और साइटोस्केलेटन प्रोटीन। ये निस्ल बॉडीज का मुख्य हिस्सा होते हैं।

राइबोसोम  संरचना:
  • राइबोसोम दो सबयूनिट्स से बने होते हैं: बड़ा सबयूनिट और छोटा सबयूनिट।
  • ये rRNA (राइबोसोमल RNA) और प्रोटीन से मिलकर बने होते हैं।
  • यूकेरियोटिक कोशिकाओं (जैसे न्यूरॉन) में 80S राइबोसोम होते हैं (60S बड़ा + 40S छोटा सबयूनिट)।
  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप में ये छोटे काले डॉट्स जैसे दिखते हैं।
राइबोसोम  प्रकार:
  • मुक्त राइबोसोम (Free Ribosomes): साइटोप्लाज्म में स्वतंत्र रूप से तैरते रहते हैं। ये साइटोसॉलिक प्रोटीन बनाते हैं (जैसे एंजाइम)।
  • बाउंड राइबोसोम (Bound Ribosomes): रफ एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम (RER) की बाहरी सतह पर चिपके रहते हैं। ये झिल्ली प्रोटीन या स्रावी प्रोटीन बनाते हैं। न्यूरॉन में बाउंड राइबोसोम ही निस्ल बॉडीज बनाते हैं।

अक्सर कई राइबोसोम एक साथ mRNA पर जुड़कर पॉलीराइबोसोम या पॉलीसोम बनाते हैं, जिससे एक ही mRNA से कई प्रोटीन जल्दी बनते हैं।

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राइबोसोम  कार्य:
  • ट्रांसलेशन: mRNA के कोडन को पढ़कर अमीनो एसिड की श्रृंखला जोड़ते हैं और प्रोटीन बनाते हैं।
  • न्यूक्लियोलस में राइबोसोम सबयूनिट्स बनते हैं, फिर साइटोप्लाज्म में आकर काम शुरू करते हैं।
  • न्यूरॉन में ये बहुत सक्रिय होते हैं, क्योंकि न्यूरॉन लंबा होता है और दूर-दूर तक प्रोटीन पहुंचाने पड़ते हैं।
न्यूरॉन में विशेषताएँ:
  • सोमा और डेंड्राइट्स में ढेर सारे राइबोसोम (निस्ल बॉडीज के रूप में)।
  • कुछ राइबोसोम सिनेप्स के पास भी पाए जाते हैं, जहां लोकल प्रोटीन संश्लेषण होता है (सीखने और स्मृति के लिए महत्वपूर्ण)।
  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोग्राफ में RER पर चिपके राइबोसोम स्पष्ट दिखते हैं।
सरल उदाहरण:

राइबोसोम को फैक्ट्री के “वर्कर” समझें जो ब्लूप्रिंट (mRNA) पढ़कर मशीन (प्रोटीन) बनाते हैं। कई वर्कर एक साथ काम करें (पॉलीराइबोसोम) तो उत्पादन तेज होता है। न्यूरॉन में ये वर्कर बहुत मेहनती होते हैं, क्योंकि घर (न्यूरॉन) बहुत बड़ा है!

5.) गॉल्जी काय:

गॉल्जी काय (Golgi Apparatus या Golgi Complex) को कोशिका का “पैकिंग और शिपिंग डिपार्टमेंट” कहा जाता है। यह इटैलियन वैज्ञानिक कैमिलो गॉल्जी के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने 1898 में इसकी खोज की। तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) के कोशिका काय (सोमा) में गॉल्जी काय बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि न्यूरॉन को ढेर सारे न्यूरोट्रांसमीटर, झिल्ली प्रोटीन और अन्य सामग्री को सही जगह भेजना पड़ता है – जैसे सिनेप्स तक।

गॉल्जी काय  संरचना:
  • गॉल्जी काय चपटे थैलों (cisternae) के ढेर जैसे दिखता है – आमतौर पर 4-8 थैले एक साथ (dictyosome कहलाते हैं)।
  • तीन मुख्य भाग:
    • सिस फेस (Cis face): एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम (ER) की तरफ, जहाँ प्रोटीन आते हैं।
    • मीडियल गॉल्जी: बीच का भाग, जहाँ बदलाव होते हैं।
    • ट्रांस फेस (Trans face): बाहर की तरफ, जहाँ पैकेजिंग पूरी होकर वेसिकल्स निकलते हैं।
  • ट्रांस फेस पर ट्रांस गॉल्जी नेटवर्क (TGN) होता है, जो सॉर्टिंग का मुख्य केंद्र है।
  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप में ये मुड़े हुए थैलों जैसे दिखते हैं।
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गॉल्जी काय  कार्य:
  • प्रोटीन और लिपिड का संशोधन (Modification): ER से आए प्रोटीन पर ग्लाइकोसिलेशन (शर्करा जोड़ना), फॉस्फोरिलेशन आदि करते हैं।
  • सॉर्टिंग और पैकेजिंग: प्रोटीन को सही जगह भेजने के लिए वेसिकल्स में पैक करते हैं – जैसे लाइसोसोम के लिए, प्लाज्मा मेम्ब्रेन के लिए या स्राव के लिए।
  • न्यूरोट्रांसमीटर वेसिकल्स बनाना: न्यूरॉन में गॉल्जी काय सिनैप्टिक वेसिकल्स तैयार करता है, जिनमें एसिटाइलकोलाइन जैसे केमिकल होते हैं।
  • लाइसोसोम एंजाइम बनाना: हाइड्रोलाइटिक एंजाइम को पैक करके लाइसोसोम भेजता है।
न्यूरॉन में विशेषताएँ:
  • सोमा में गॉल्जी काय न्यूक्लियस के पास स्थित होता है और अक्सर नेटवर्क जैसे फैला रहता है।
  • न्यूरॉन्स में यह बहुत सक्रिय होता है, क्योंकि दूर एक्सॉन टर्मिनल तक सामग्री भेजनी पड़ती है।
  • डेंड्राइट्स और सोमा में ज्यादा, एक्सॉन में कम।
सरल उदाहरण:

गॉल्जी काय को डाकघर समझें – ER से कच्चा माल (प्रोटीन) आता है, यहां उसे पैक किया जाता है, लेबल लगाया जाता है और सही पते (लाइसोसोम, मेम्ब्रेन या बाहर) पर भेज दिया जाता है। न्यूरॉन में यह डाकघर बहुत बड़ा और व्यस्त होता है, क्योंकि संदेश (न्यूरोट्रांसमीटर) दूर-दूर तक भेजने पड़ते हैं!

6.) निस्ल बॉडीज:

निस्ल बॉडीज (Nissl bodies या Nissl substance) तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) के कोशिका काय (सोमा) और डेंड्राइट्स में पाए जाने वाले बड़े-बड़े दाने या गुच्छे होते हैं। ये वास्तव में रफ एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम (Rough Endoplasmic Reticulum – RER) और मुक्त राइबोसोम (free ribosomes) के समूह होते हैं। इनका नाम जर्मन न्यूरोलॉजिस्ट फ्रांज निस्ल (Franz Nissl) के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने 19वीं शताब्दी में इनकी खोज की और एक विशेष स्टेनिंग विधि विकसित की।

निस्ल बॉडीज  संरचना:
  • निस्ल बॉडीज RNA से भरपूर होते हैं, इसलिए बेसिक डाई (जैसे क्रेसिल वायलेट या टोलुइडीन ब्लू) से रंगे जाते हैं और गहरे नीले-बैंगनी रंग के दिखते हैं।
  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप में ये समानांतर cisternae (झिल्लियों की थैलियाँ) और उन पर चिपके राइबोसोम के रूप में दिखते हैं।
  • ये एक्सॉन (axon) और एक्सॉन हिलॉक (axon hillock) में नहीं पाए जाते।
निस्ल बॉडीज  कार्य:
  • मुख्य कार्य प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) है। न्यूरॉन बहुत लंबे होते हैं और उन्हें लगातार प्रोटीन की जरूरत पड़ती है – जैसे आयन चैनल, न्यूरोट्रांसमीटर रिसेप्टर्स, साइटोस्केलेटन प्रोटीन आदि।
  • बड़े न्यूरॉन्स (जैसे मोटर न्यूरॉन्स) में निस्ल बॉडीज ज्यादा होते हैं, क्योंकि उन्हें ज्यादा प्रोटीन बनाना पड़ता है।
  • ये न्यूरॉन की मेटाबॉलिक गतिविधि का सूचक हैं – ज्यादा सक्रिय न्यूरॉन में ये बड़े और ज्यादा दिखते हैं।
दिखावट और स्टेनिंग:

हिस्टोलॉजी में निस्ल स्टेनिंग से न्यूरॉन्स आसानी से पहचाने जाते हैं। ये “टाइग्रॉइड सब्सटांस” (tigroid substance) जैसे दिखते हैं – गहरे दाने साइटोप्लाज्म में बिखरे रहते हैं।

क्लिनिकल महत्व:
  • क्रोमेटोलिसिस (Chromatolysis): अगर एक्सॉन क्षतिग्रस्त हो जाए (जैसे चोट में), तो निस्ल बॉडीज फैल जाते हैं, सूज जाते हैं और केंद्रक एक तरफ खिसक जाता है। यह न्यूरॉन के रिजेनरेशन (पुनर्जनन) का संकेत है।
  • न्यूरोडिजेनरेटिव रोगों (जैसे अल्जाइमर) में निस्ल बॉडीज असामान्य हो सकते हैं।
  • ये न्यूरॉन की स्वास्थ्य स्थिति बताते हैं – कम या गायब होने पर न्यूरॉन मर रहा होता है।
सरल उदाहरण:

निस्ल बॉडीज को न्यूरॉन की “प्रोटीन फैक्ट्री” समझें। जैसे कोई बड़ा कारखाना जहां मशीनें (RER और राइबोसोम) लगातार सामान (प्रोटीन) बनाती रहती हैं, ताकि न्यूरॉन लंबे समय तक संकेत भेज सके।

7.) लाइसोसोम:

लाइसोसोम को कोशिका का “कचरा साफ करने वाला” या “रिक्लिंग प्लांट” कहा जाता है। ये छोटे गोलाकार अंगकाय होते हैं जो कोशिका काय (सोमा) में पाए जाते हैं। तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) में लाइसोसोम बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि न्यूरॉन लंबे समय तक जीवित रहते हैं और उनमें पुरानी सामग्री (जैसे प्रोटीन, ऑर्गेनेल्स) जमा होती रहती है। अगर ये साफ न हों, तो न्यूरॉन बीमार पड़ सकता है।

लाइसोसोम  संरचना:
  • आकार: छोटे गोल थैले जैसे (0.1-1 माइक्रोमीटर)।
  • एकल झिल्ली: बाहर से एक मजबूत झिल्ली होती है जो अंदर का अम्लीय वातावरण (pH 4.5-5) बनाए रखती है।
  • अंदर हाइड्रोलाइटिक एंजाइम (लगभग 50 प्रकार) होते हैं, जैसे प्रोटिएज, लाइपेज, न्यूक्लिएज आदि, जो सब कुछ तोड़ सकते हैं।
  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप में ये गहरे दाने जैसे दिखते हैं, अंदर कचरा भरा रहता है।
लाइसोसोम  कार्य:
  • पाचन (Digestion): पुरानी या खराब ऑर्गेनेल्स, प्रोटीन, बैक्टीरिया आदि को तोड़ना (ऑटोफैजी और हेटरोफैजी)।
  • रिक्लिंग: तोड़ी हुई सामग्री से अमीनो एसिड, शर्करा आदि बनाकर कोशिका को दोबारा इस्तेमाल करने देना।
  • कोशिका मृत्यु नियंत्रण: अगर झिल्ली फट जाए, तो एंजाइम बाहर आकर कोशिका को मार सकते हैं (अपोप्टोसिस)।
  • कैल्शियम स्टोर: कभी-कभी कैल्शियम छोड़ते हैं।
लाइसोसोम  निर्माण:
  • गॉल्जी काय से एंजाइम पैक होकर प्राइमरी लाइसोसोम बनते हैं, फिर सेकेंडरी लाइसोसोम (कचरा मिलने पर)।
न्यूरॉन में विशेषताएँ:
  • न्यूरॉन्स में लाइसोसोम सोमा में ज्यादा होते हैं और एक्सॉन में भी पहुंचते हैं।
  • उम्र बढ़ने पर लिपोफ्यूसिन (अपघट्य कचरा) जमा होता है, जो न्यूरॉन को नुकसान पहुंचाता है।
  • लाइसोसोम की खराबी से न्यूरोडिजेनरेटिव रोग होते हैं, जैसे अल्जाइमर (एमाइलॉइड प्लाक), पार्किंसन, लाइसोसोमल स्टोरेज डिसॉर्डर।
  • ऑटोफैजी (खुद को साफ करना) न्यूरॉन की लंबी उम्र के लिए जरूरी है।
सरल उदाहरण:

लाइसोसोम को घर का “कचरा डिब्बा और जूसर” समझें – कचरा डालो, अंदर एंजाइम उसे पीसकर उपयोगी चीजें निकाल दें, बाकी बाहर फेंक दें। अगर डिब्बा फट जाए या भर जाए, तो पूरा घर (न्यूरॉन) गंदा हो जाता है!

कोशिका काय (Cell Body Ya Soma) के कार्य: निष्कर्ष

कोशिका काय (सोमा) न्यूरॉन का मुख्य नियंत्रण केंद्र है। यह न केवल मेटाबॉलिक गतिविधियों का केंद्र है, बल्कि संकेत प्रसंस्करण और न्यूरॉन की जीवित रहने की कुंजी भी है। नीचे दिए गए प्रत्येक कार्य को विस्तार से समझाया गया है:

1. प्रोटीन संश्लेषण और ऊर्जा उत्पादन

  • प्रोटीन संश्लेषण: सोमा में निस्ल बॉडीज (रफ एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम और राइबोसोम के गुच्छे) प्रोटीन बनाने का मुख्य काम करते हैं। न्यूरॉन बहुत लंबा होता है (कभी-कभी 1 मीटर तक), इसलिए उसे लगातार नए प्रोटीन चाहिए – जैसे आयन चैनल, रिसेप्टर्स, न्यूरोट्रांसमीटर और साइटोस्केलेटन प्रोटीन। गॉल्जी काय इन प्रोटीन को पैक करके एक्सॉन और डेंड्राइट्स तक भेजता है।
  • ऊर्जा उत्पादन: माइटोकॉन्ड्रिया सोमा में भरपूर होते हैं और ग्लूकोज से ATP (ऊर्जा की मुद्रा) बनाते हैं। न्यूरॉन बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च करता है (संकेत भेजने और आयन पंप चलाने में), इसलिए सोमा ऊर्जा का मुख्य स्रोत है।
  • यह कार्य न्यूरॉन को लंबे समय तक कार्यशील रखता है।

2. डेंड्राइट्स से आने वाले संकेतों को एकीकृत करना (Signal Integration)

  • डेंड्राइट्स से हजारों सिनेप्टिक इनपुट (उत्तेजक या अवरोधक संकेत) सोमा तक पहुंचते हैं। सोमा इन संकेतों को जोड़ता-घटाता है (समेशन – summation)।
  • स्पेशियल समेशन: अलग-अलग डेंड्राइट्स से आने वाले संकेत एक साथ जोड़े जाते हैं।
  • टेम्पोरल समेशन: एक ही सिनेप्स से तेजी से आने वाले संकेत जोड़े जाते हैं।
  • ये ग्रेडेड पोटेंशियल (EPSP या IPSP) सोमा की झिल्ली पर बदलाव लाते हैं। अगर कुल प्रभाव थ्रेशोल्ड तक पहुंच जाए, तो आगे एक्शन पोटेंशियल शुरू होता है। सोमा इस तरह निर्णय लेता है कि संकेत आगे भेजना है या नहीं।

3. एक्सॉन की ओर संकेत भेजने के लिए एक्शन पोटेंशियल शुरू करना (एक्सॉन हिलॉक से)

  • सोमा से निकलते ही एक्सॉन का शुरुआती भाग एक्सॉन हिलॉक होता है, जहां वोल्टेज-गेटेड सोडियम चैनल बहुत घने होते हैं।
  • अगर सोमा में एकीकृत संकेत थ्रेशोल्ड (-55 mV) तक पहुंच जाए, तो एक्सॉन हिलॉक पर एक्शन पोटेंशियल (ऑल-ऑर-नन सिग्नल) शुरू होता है।
  • यह एक्शन पोटेंशियल एक्सॉन के साथ तेजी से आगे बढ़ता है। एक्सॉन हिलॉक को “ट्रिगर जोन” कहा जाता है, क्योंकि यहीं निर्णय होता है कि फायर करना है या नहीं।
  • यह प्रक्रिया न्यूरॉन की जानकारी प्रसारित करने की आधार है।

4. न्यूरॉन की रखरखाव और जीवित रखने की मुख्य जिम्मेदारी

  • सोमा न्यूरॉन का “लाइफ सपोर्ट सिस्टम” है। यहां से सभी पदार्थ (प्रोटीन, माइटोकॉन्ड्रिया, वेसिकल्स) एक्सोनल ट्रांसपोर्ट से एक्सॉन और डेंड्राइट्स तक पहुंचते हैं।
  • लाइसोसोम कचरा साफ करते हैं, ऑटोफैजी से पुरानी चीजें रिसाइकल होती हैं।
  • अगर सोमा क्षतिग्रस्त हो जाए, तो पूरा न्यूरॉन मर जाता है (क्योंकि न्यूरॉन्स विभाजित नहीं होते)।
  • ट्रॉफिक फैक्टर्स (NGF जैसे) सोमा से नियंत्रित होते हैं, जो न्यूरॉन की उत्तरजीविता सुनिश्चित करते हैं।
  • सोमा की क्षति से न्यूरोडिजेनरेटिव रोग हो सकते हैं।

ये कार्य मिलकर सोमा को न्यूरॉन का “हृदय और मस्तिष्क” बनाते हैं। बिना सोमा के न्यूरॉन न तो काम कर सकता है न जीवित रह सकता है!

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