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Toggleगंजाम का समुद्री इतिहास: एक परिचय
गंजाम जिला, ओडिशा के दक्षिणी तटीय क्षेत्र में स्थित, प्राचीन काल से ही भारत की समुद्री विरासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। प्राचीन कालिंग साम्राज्य का हिस्सा होने के कारण गंजाम का समुद्री इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। यहां की लंबी तटरेखा, रुशिकुल्या, बहुडा जैसी नदियों के मुहाने और प्राकृतिक बंदरगाहों ने इसे दक्षिण-पूर्व एशिया, रोम, चीन तथा अरब देशों से व्यापार का प्रमुख द्वार बनाया। पुरातात्विक उत्खननों से पता चलता है कि दूसरी शताब्दी ईस्वी में पलूर (दंतपुर) एक प्रमुख बंदरगाह था, जहां रोमन रूलेटेड मिट्टी के बर्तन, चीनी सेलाडॉन वेयर और अम्फोरा के टुकड़े मिले हैं, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार की गवाही देते हैं।The King of Maritime Trade: Ganjam
प्राचीन कालिंग के साधव (समुद्री व्यापारी) बोइता (बड़ी नावों) से जावा, सुमात्रा, बाली, श्रीलंका और मलय द्वीपों तक जाते थे। वे हाथी दांत, मसाले, रत्न, कपड़ा और धातुओं का निर्यात करते थे तथा विदेशी वस्तुएं लाते थे। मणिकपाटणा, गोपालपुर, सोनपुर, बारुवा और गंजाम जैसे बंदरगाह सक्रिय थे। पलूर को पtolemy ने दोसारेने के रूप में उल्लेखित किया है। कलिंग युद्ध के बाद अशोक के शासन में भी यह क्षेत्र समुद्री व्यापार का केंद्र रहा। मध्यकाल में अरब स्रोतों में गंजाम और कलिंगनगर का जिक्र मिलता है।The King of Maritime Trade: Ganjam
औपनिवेशिक काल में गोपालपुर सबसे व्यस्त बंदरगाह बना। 19वीं-20वीं शताब्दी में यहां से चावल, जूट और अन्य सामान निर्यात होते थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे व्यापारिक केंद्र बनाया, लेकिन 1842 के भयंकर चक्रवात ने इसे क्षतिग्रस्त कर दिया। पोटागढ़ किला (गंजाम फोर्ट) फ्रेंच और ब्रिटिश शासन की गवाही देता है। स्वतंत्रता के बाद गोपालपुर बंदरगाह का पुनरुद्धार हुआ और आज यह मौसमी ऑल-वेदर पोर्ट है।The King of Maritime Trade: Ganjam
गंजाम का समुद्री इतिहास न केवल आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि हिंदू-बौद्ध संस्कृति के दक्षिण-पूर्व एशिया प्रसार में भी योगदान दिया। आज भी बालिजात्रा, बोइता-बंदना और ठाकुरानी यात्रा में बोइता मेढ़ जैसी परंपराएं इस गौरवशाली अतीत को जीवंत रखती हैं। यह इतिहास ओडिशा की समुद्री शक्ति और साहसिक व्यापारियों की स्मृति है, जो सदियों से सागर को जोड़ता रहा है।The King of Maritime Trade: Ganjam
गंजाम, ओडिशा का प्राचीन तटीय जिला, 5000 साल से भी ज्यादा पुराना भारत का समुद्री द्वार रहा है। 3000 ईसा पूर्व से ही रुशिकुल्या तट पर छोटे गाँवों में लोग नावों से मछली पकड़ते, नमक बनाते और दक्षिण-पूर्व एशिया तक छोटा-मोटा व्यापार करते थे। 600 ईसा पूर्व से कलिंग साम्राज्य के स्वर्ण युग में गंजाम विश्व व्यापार का केंद्र बन गया। The King of Maritime Trade: Ganjam
साधव बोइता जहाज़ों से जावा, बाली, श्रीलंका, बर्मा जाते थे और चावल, मसाले, कपड़ा, हाथी दांत निर्यात करते थे। पलूर, आर्यासपल्ली, गंजाम बंदर, गोपालपुर जैसे बंदरगाहों से रोमन सिक्के, रूलेटेड बर्तन, चीनी सेलाडॉन मिले हैं जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार की गवाही देते हैं।The King of Maritime Trade: Ganjam
मध्यकाल में भी यह चमकता रहा और औपनिवेशिक काल में गोपालपुर प्रमुख बंदरगाह बना। आज भी कार्तिक पूर्णिमा पर बोइता बंदना और बालियात्रा में लाखों लोग उन बहादुर साधवों को याद करते हैं जो गंजाम के तट से समुद्र पार कर गए थे। गंजाम सिर्फ जिला नहीं, भारत की समुद्री सभ्यता का जीवंत प्रमाण है।The King of Maritime Trade: Ganjam
3000–500 ईसा पूर्व : बहुत शुरुआती समुद्री गतिविधि
रुशिकुल्या नदी और गंजाम तट पर छोटे–छोटे गाँव थे।
यह कालखंड गंजाम क्षेत्र की समुद्री गतिविधियों का सबसे प्रारंभिक चरण है, जब यहां कोई बड़े राज्य या साम्राज्य नहीं बने थे। यह वह समय था जब मानव बस्तियां छोटी–छोटी और स्थानीय स्तर की थीं, लोग मुख्य रूप से प्रकृति पर निर्भर थे और समुद्र तट का उपयोग जीविका के लिए करते थे। The King of Maritime Trade: Ganjam
रुशिकुल्या नदी के मुहाने और गंजाम के तटीय इलाके में छोटे–छोटे गांव बसे हुए थे। ये गांव नदी किनारे या समुद्र के पास स्थित थे, क्योंकि यहां पानी, मछली और उपजाऊ भूमि आसानी से उपलब्ध थी। लोग झोपड़ियां बनाकर रहते थे, जो मुख्य रूप से लकड़ी, मिट्टी और घास–फूस से बनी होती थीं। ये बस्तियां स्थायी नहीं थीं, बल्कि मौसम और संसाधनों के अनुसार बदलती रहती थीं। इस समय कृषि की शुरुआत हो रही थी, लेकिन समुद्र से जुड़ी गतिविधियां ही मुख्य थीं।
लोग छोटी नावों से मछली पकड़ते और नमक बनाते थे।
लोग छोटी नावों से मछली पकड़ते थे। ये नावें संभवतः खोखले पेड़ के तने या बांस–लकड़ी से बनी साधारण कैनो जैसी होती थीं, जो नदी या तट के पास की उथली पानी में इस्तेमाल होती थीं। मछली पकड़ना इन गांवों की रोजमर्रा की जिंदगी का बड़ा हिस्सा था, क्योंकि समुद्र और नदी प्रोटीन का मुख्य स्रोत थे। इसी तरह नमक बनाना भी एक महत्वपूर्ण काम था। तटीय क्षेत्र में समुद्र के पानी को उबालकर या धूप में सुखाकर नमक निकाला जाता था, जो भोजन संरक्षण और व्यापार दोनों के लिए जरूरी था। ये गतिविधियां बताती हैं कि लोग समुद्र को केवल खतरे के रूप में नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानते थे।The King of Maritime Trade: Ganjam
खुदाई में मिले सबूत:
दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे मिट्टी के बर्तन
खुदाई में मिले सबूत इस प्रारंभिक समुद्री जीवन की पुष्टि करते हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे मिट्टी के बर्तन मिले हैं, जो दिखाते हैं कि स्थानीय लोग दूर के क्षेत्रों से संपर्क में थे, शायद नावों से छोटी दूरी का आदान-प्रदान होता था। ये बर्तन हाथ से बने, साधारण और स्थानीय शैली के थे, लेकिन कुछ में विदेशी प्रभाव दिखता है।The King of Maritime Trade: Ganjam
लोहे के मछली पकड़ने के कांटे और नमक बनाने के पुराने कुंड
खुदाई में मिले सबूत के तोर पर लोहे के मछली पकड़ने के कांटे मिला हे। लोहे के मछली पकड़ने के कांटे बाद के चरण के हो सकते हैं, लेकिन इस काल में पत्थर या हड्डी के औजार ज्यादा आम थे, जो मछली पकड़ने में इस्तेमाल होते थे। नमक बनाने के पुराने कुंड खुदाई में पाए गए हैं – ये मिट्टी के गड्ढे या विशेष बर्तन होते थे जहां समुद्र का पानी जमा करके नमक निकाला जाता था। ये कुंड तट के पास मिलते हैं और बताते हैं कि नमक उत्पादन व्यवस्थित तरीके से होता था।
रंग-बिरंगे मनके (बीड्स)
रंग-बिरंगे मनके (बीड्स) सबसे रोचक सबूत हैं। ये कार्नेलियन, एगेट या ग्लास जैसे पत्थरों से बने छोटे मनके थे, जो गहने या मुद्रा के रूप में इस्तेमाल होते थे। ये मनके स्थानीय स्तर पर बनते थे या पास के क्षेत्रों से आते थे, और कभी-कभी दक्षिण-पूर्व एशिया तक के संपर्क का संकेत देते थे।The King of Maritime Trade: Ganjam
इस समय सिर्फ छोटा-मोटा व्यापार था। लोग नमक, सुखी मछली और मनके बदलते थे। नमक दूर inland गांवों तक पहुंचता था, जहां समुद्र नहीं था। सुखी मछली भोजन के रूप में आदान-प्रदान होती थी, और मनके सजावट या स्थिति का प्रतीक थे। यह व्यापार बड़े जहाजों या संगठित कारवानों से नहीं, बल्कि छोटी नावों या पैदल यात्रा से होता था। तट के साथ-साथ छोटे समूह एक-दूसरे से मिलते-जुलते और वस्तुएं बदलते थे। The King of Maritime Trade: Ganjam
कभी-कभी ये संपर्क दक्षिण-पूर्व एशिया के तटीय इलाकों तक पहुंचते थे, जहां समान संस्कृति वाले लोग रहते थे। यही छोटा-मोटा आदान-प्रदान समुद्री व्यापार की नींव था। यह नींव बाद में कलिंग साम्राज्य के बड़े व्यापार में बदल गई। इस काल की गतिविधियां दिखाती हैं कि गंजाम का तट हमेशा से समुद्र से जुड़ा रहा है – पहले जीविका के लिए, फिर व्यापार के लिए। ये प्रारंभिक प्रयास ही थे जो हजारों साल बाद साधवों के बड़े बोइता जहाजों का आधार बने। इस तरह यह काल गंजाम के समुद्री इतिहास की जड़ है, जहां छोटे गांवों के लोग अनजाने में एक महान विरासत की शुरुआत कर रहे थे।
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600 ईसा पूर्व – 200 ईस्वी : कलिंग साम्राज्य का स्वर्ण काल
कलिंग के पास 1000 से ज्यादा बड़े जहाज़ थे
यह कालखंड कलिंग साम्राज्य का सबसे चमकदार दौर था, जब ओडिशा (प्राचीन कलिंग) समुद्र का बादशाह बन गया। इस समय कलिंग की समुद्री शक्ति इतनी मजबूत थी कि यह पूरे बंगाल की खाड़ी और दक्षिण–पूर्व एशिया पर छाया हुआ था। व्यापार, संस्कृति और राजनीतिक प्रभाव के कारण कलिंग विश्व मानचित्र पर एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा।
यूनानी और रोमन किताबों में कलिंग के बड़े जहाजों का जिक्र मिलता है, कलिंग के पास 1000 से ज्यादा बड़े जहाज़ थे” वाली बात कोई प्राचीन यूनानी–रोमन स्रोत (जैसे प्लिनी, प्टॉलेमी या पेरिप्लस) में नहीं मिलती। यह एक लोकप्रिय किंवदंती या अतिशयोक्ति है, जो ओडिशा की समुद्री परंपरा को महिमामंडित करने के लिए प्रचलित है।The King of Maritime Trade: Ganjam
जहाज को बोइत कहलाते थे, जो लकड़ी से बने विशाल और मजबूत होते थे। इनमें सैकड़ों लोग सवार हो सकते थे और लंबी यात्राओं के लिए डिजाइन किए गए थे। ये जहाज मॉनसून हवाओं का उपयोग करके हजारों किलोमीटर दूर तक जाते थे। यूनानी लेखक प्लिनी और प्टॉलेमी ने कलिंग की नौसेना और व्यापारिक बेड़े की ताकत का वर्णन किया है, जो बताता है कि कलिंग की समुद्री ताकत रोम और ग्रीक दुनिया को भी प्रभावित करती थी।The King of Maritime Trade: Ganjam
साधव (समुद्री व्यापारी) श्रीलंका, बर्मा, मलाया, जावा, बाली जाते थे।
साधव, जो कलिंग के समुद्री व्यापारी थे, इस काल की सबसे महत्वपूर्ण पहचान थे। ये साहसी व्यापारी श्रीलंका, बर्मा (म्यांमार), मलाया (मलेशिया), जावा और बाली जैसे दूर देशों तक जाते थे। वे महीनों की यात्रा करते, मॉनसून का इंतजार करते और वापस लौटते। ये यात्राएं सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि संस्कृति का आदान–प्रदान भी थीं। The King of Maritime Trade: Ganjam
साधव बौद्ध धर्म, हिंदू परंपराएं और कला लेकर जाते थे, जिससे दक्षिण–पूर्व एशिया में भारतीय प्रभाव पड़ा। श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रसार, बाली में हिंदू मंदिरों की शैली – सबमें कलिंग का योगदान था। साधव जोखिम भरी यात्राओं पर निकलते, परिवार को छोड़कर समुद्र पार करते और सफल लौटते तो हीरो बनते।The King of Maritime Trade: Ganjam
मुख्य बंदरगाह: गंजाम बंदर, आर्यपल्ली, पलूरु, पाटी सोनापुर।
मुख्य बंदरगाह गंजाम बंदर (रुशिकुल्या नदी के मुहाने के पास, छत्रपुर (Chatrapur) से करीब 10-12 किमी दूर।), आर्यपल्ली, पलूरु और पाटी सोनापुर थे। गंजाम बंदर सबसे पुराना और व्यस्त था, जहां से बड़े जहाज निकलते थे।
आर्यपल्ली दक्षिण–पूर्व एशिया का सीधा रास्ता प्रदान करता था, क्योंकि यहां की स्थिति हवाओं के अनुकूल थी। पलूरु (जिसे प्टॉलेमी ने दोसारेने कहा) माल और लोगों की सप्लाई का केंद्र था, रुशिकुल्या नदी के मुहाने पर स्थित। पाटी सोनापुर प्राकृतिक बंदरगाह था, जहां जहाज आसानी से लंगर डाल सकते थे। ये बंदरगाह गंजाम जिले में थे और कलिंग की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे। यहां से जहाज लदकर निकलते और विदेशी सामान लेकर आते।The King of Maritime Trade: Ganjam
निर्यात: चावल, कपड़ा, मसाले, हाथी दांत, मोती।
निर्यात में चावल, कपड़ा, मसाले, हाथी दांत और मोती मुख्य थे। कलिंग का चावल पूरे एशिया में प्रसिद्ध था, क्योंकि यहां की उपजाऊ भूमि भरपूर अनाज देती थी। महीन सूती और रेशमी कपड़े, काली मिर्च जैसे मसाले, हाथी दांत की कलाकृतियां और खाड़ी से मिले मोती – ये सब विदेशों में बहुत मांग में थे। बदले में रोमन साम्राज्य से सोना, शराब और लग्जरी सामान आता था।The King of Maritime Trade: Ganjam
रोमन सिक्के, रूलेटेड वेयर, नॉब्ड वेयर जैसे विदेशी सामान गंजाम में मिले।
गंजाम क्षेत्र में खुदाई से रोमन सिक्के, रूलेटेड वेयर (विशेष डिजाइन वाले बर्तन), नॉब्ड वेयर (उभरे हुए डिजाइन वाले बर्तन) जैसे विदेशी सामान मिले हैं। ये सबूत बताते हैं कि रोमन व्यापारी या उनके सामान कलिंग तक पहुंचते थे। पलूर और अन्य स्थानों पर मिले ये अवशेष अंतरराष्ट्रीय व्यापार की जीती–जागती मिसाल हैं।The King of Maritime Trade: Ganjam
इसी समय “साधव” नाम मशहूर हुआ। लोग इन्हें बहुत सम्मान देते थे।
इसी समय “साधव” नाम मशहूर हुआ। साधव सिर्फ व्यापारी नहीं, समाज के सम्मानित लोग थे। लोग इन्हें बहुत सम्मान देते थे, क्योंकि ये जोखिम उठाकर देश की समृद्धि लाते थे। सफल साधव को गांव में हीरो की तरह स्वागत मिलता, उनके नाम पर कथाएं बनतीं। साधवों की बहादुरी और समुद्री ज्ञान ने कलिंग को समुद्र का बादशाह बनाया। यह काल कलिंग के लिए स्वर्ण युग था, जहां समुद्री व्यापार ने न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, बल्कि भारतीय संस्कृति को विश्व में फैलाया। गंजाम के ये बंदरगाह और साधवों की यात्राएं आज भी बालियात्रा जैसे त्योहारों में जीवित हैं, जो इस गौरवशाली इतिहास की याद दिलाते हैं।
200 ईस्वी – 1500 ईस्वी : मध्यकाल में भी चमकता रहा व्यापार
बौद्ध–जैन मठों के अवशेष, चीनी हरे बर्तन (सेलाडॉन) मिले।
यह लंबा कालखंड कलिंग के समुद्री व्यापार का निरंतरता का दौर था। रोमन साम्राज्य के पतन और गुप्त काल के बाद भी गंजाम का तटीय क्षेत्र व्यापार में सक्रिय रहा। पूर्वी गंग, गजपति और अन्य स्थानीय शासकों के समय में समुद्री गतिविधियां कम नहीं हुईं, बल्कि नई दिशाओं में फैलीं। बौद्ध और जैन धर्म का प्रभाव इस काल में बहुत मजबूत था, जिसके कारण तट पर कई मठ बने। इन मठों के अवशेष आज भी गंजाम क्षेत्र में मिलते हैं। ये मठ सिर्फ धार्मिक केंद्र नहीं थे, बल्कि व्यापारियों के लिए विश्राम स्थल और विदेशी मेहमानों के स्वागत के स्थान भी थे। The King of Maritime Trade: Ganjam
खुदाई में बौद्ध स्तूपों के हिस्से, जैन तीर्थंकर मूर्तियां और मठों की दीवारें मिली हैं। इन मठों से चीनी हरे बर्तन यानी सेलाडॉन वेयर बड़ी मात्रा में मिले हैं। सेलाडॉन चीन के तांग, सोंग और युआन राजवंशों के प्रसिद्ध हरे–नीले चीनी मिट्टी के बर्तन थे, जो बहुत महंगे और लग्जरी सामान माने जाते थे। इनका गंजाम, पलूर और आसपास के स्थानों में मिलना सिद्ध करता है कि इस काल में भी चीन के साथ सीधा समुद्री व्यापार चलता था। साधव चीन तक जाते थे और बदले में ये कीमती बर्तन लाते थे। ये बर्तन मठों में दान स्वरूप चढ़ाए जाते थे, इसलिए मठों के अवशेषों में सबसे ज्यादा मिले।
साधव विदेशों में बस्तियाँ बसाते थे – आज भी बाली के मंदिर ओडिशा जैसे लगते हैं।
साधव इस काल में सिर्फ व्यापारी नहीं रहे, बल्कि संस्कृति वाहक बन गए। वे विदेशों में बस्तियां बसाते थे। लंबी यात्राओं में कई साधव जावा, सुमात्रा, बाली और अन्य द्वीपों में बस गए। उन्होंने वहां परिवार बसाए, मंदिर बनवाए और भारतीय परंपराएं स्थापित कीं। इसी कारण आज भी बाली के मंदिर ओडिशा जैसे लगते हैं। बाली के प्रमुख मंदिरों जैसे बेसाकिह, तनाह लोट या उलुवातु की वास्तुकला, मूर्तिकला और पूजा पद्धति में कलिंग शैली साफ दिखती है। The King of Maritime Trade: Ganjam
बाली में शिव–पार्वती, गणेश और बौद्ध प्रभाव वाली मूर्तियां ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर या कोणार्क की शैली से मिलती–जुलती हैं। बाली के लोग आज भी अपने को कलिंग वंशज मानते हैं और वहां की बारोंग नृत्य, गमेलान संगीत और मंदिरों की संरचना में ओडिशा का प्रभाव स्पष्ट है। यह सब साधवों की वजह से हुआ, जो सदियों तक विदेशों में बस्तियां बसाते रहे और भारतीय संस्कृति को जड़ से स्थापित करते रहे। ये बस्तियां व्यापार का आधार भी थीं, क्योंकि वहां बसे साधव स्थानीय शासकों से संबंध बनाते और कलिंग के लिए व्यापार आसान करते।The King of Maritime Trade: Ganjam
बंदरगाहों का जाल बना रहा – पलूरु सप्लाई देता, गंजाम बंदर और आर्यपल्ली से बड़े जहाज़ चलते
बंदरगाहों का जाल इस पूरे काल में बना रहा। कोई एक बंदरगाह पर पूर्ण निर्भरता नहीं थी, बल्कि सभी बंदरगाह एक–दूसरे के पूरक थे। पलूरु सप्लाई देने वाला केंद्र था। रुशिकुल्या नदी के मुहाने पर स्थित पलूरु से अंतर्देशीय क्षेत्रों से माल आता था – चावल, कपड़ा, मसाले, हाथी दांत आदि। यहां छोटे जहाज या नावें माल लातीं और फिर बड़े जहाजों में लदाई होती। पलूरु को सप्लाई हब कहा जा सकता है। वहीं गंजाम बंदर और आर्यपल्ली से बड़े जहाज चलते थे। The King of Maritime Trade: Ganjam
गंजाम बंदर मुख्य निर्यात बंदरगाह था, जहां से बोइत जैसे विशाल जहाज दक्षिण–पूर्व एशिया के लिए रवाना होते थे। आर्यपल्ली की भौगोलिक स्थिति हवाओं के लिए अनुकूल थी, इसलिए यहां से लंबी दूरी के जहाज आसानी से निकलते थे। ये तीनों बंदरगाह मिलकर एक नेटवर्क बनाते थे – पलूरु से माल आता, गंजाम बंदर और आर्यपल्ली से विदेश जाता। इस जाल की वजह से व्यापार कभी रुका नहीं, चाहे कोई एक बंदरगाह गाद से प्रभावित हो जाए।The King of Maritime Trade: Ganjam
इस पूरे मध्यकाल में समुद्री व्यापार चमकता रहा, क्योंकि साधवों की परंपरा जीवित थी, मठों से धार्मिक–व्यापारिक समर्थन मिलता था और बंदरगाहों का नेटवर्क मजबूत था। चीनी सेलाडॉन, बाली के मंदिर और पुरातात्विक अवशेष इस बात के जीते–जागते सबूत हैं कि कलिंग का स्वर्ण काल खत्म होने के बाद भी गंजाम का समुद्री गौरव कम नहीं हुआ। यह निरंतरता ही थी जो बाद के काल में भी साधव परंपरा को जीवित रख सकी।The King of Maritime Trade: Ganjam
आज भी जीवित परंपरा : बोइता बंदना और बाली यात्रा की विस्तृत व्याख्या
हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर महीने में आने वाली पूर्णिमा) को ओडिशा में बोइता बंदना का त्योहार मनाया जाता है। यह गंजाम सहित पूरे ओडिशा की सबसे जीवंत समुद्री परंपरा है, जो हजारों साल पुराने साधवों की याद को आज भी जिंदा रखती है। सुबह–सुबह सूर्योदय से पहले बच्चे–बूढ़े, औरतें–मर्द सब नदी, तालाब या समुद्र किनारे इकट्ठे होते हैं।
वे कागज़, केले की पत्ती, या सूखी पत्तियों से छोटी–छोटी नावें बनाते हैं। इन नावों को रंग–बिरंगा सजाया जाता है, छोटे–छोटे मस्तूल लगाए जाते हैं, और कभी–कभी दीपक भी जलाया जाता है। ये नावें प्राचीन बोइता जहाज़ों का प्रतीक होती हैं, जो सदियों पहले साधव लेकर समुद्र पार करते थे।The King of Maritime Trade: Ganjam
फिर सब मिलकर इन छोटी नावों को पानी में बहाते हैं। बहाते समय मुंह से एक ही आवाज़ गूंजती है – “आ लू, आ लू, साधव पुत्र सही–सलामत लौट आओ”। इसका मतलब है – हे साधव पुत्र, हे बहादुर व्यापारी, सकुशल लौट आओ। यह प्रार्थना सदियों पुरानी है।
जब साधव कार्तिक पूर्णिमा को गंजाम, पलूर, आर्यपल्ली जैसे तटों से बड़े बोइता जहाज़ लेकर जावा, बाली, सुमात्रा, श्रीलंका जाते थे, तो उनके परिवार इसी दिन छोटी नावें बहाकर उनकी सलामती की दुआ करते थे। आज भी लाखों लोग यही दुआ दोहराते हैं, जैसे समय रुक सा गया हो। बच्चे खेल–खेल में नाव बनाते हैं, लेकिन बड़े जानते हैं कि यह सिर्फ खेल नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की बहादुरी को याद करने का तरीका है।The King of Maritime Trade: Ganjam
इसी कार्तिक पूर्णिमा को कटक में एशिया का सबसे बड़ा मेला “बाली यात्रा” लगता है। महानदी के किनारे कई किलोमीटर तक दुकानें, झूले, खाने–पीने की स्टॉल और सांस्कृतिक कार्यक्रम सजते हैं। लाखों लोग आते हैं – कुछ खरीदारी करने, कुछ मेला घूमने, लेकिन सबके मन में एक ही बात – उन साधवों को याद करना जो गंजाम के तट से बोइता लेकर बाली–जावा गए थे। मेले में छोटी–बड़ी नावों की दुकानें, बोइता के मॉडल, और साधवों की कहानियां सुनाने वाले कलाकार मिलते हैं। लोग नदी में नाव बहाते हैं और मेला घूमते हैं। यह त्योहार सिर्फ मेला नहीं, बल्कि एक जीवंत स्मृति है।The King of Maritime Trade: Ganjam
बोइत बंदना और बाली यात्रा बताते हैं कि गंजाम का समुद्री इतिहास किताबों में नहीं, लोगों के दिलों में ज़िंदा है। हर कार्तिक पूर्णिमा को जब बच्चे “आ लू, आ लू” चिल्लाते हैं और छोटी नावें पानी में तैरती हैं, तो सदियों पुराने साधव जैसे फिर लौट आते हैं। यह परंपरा प्रमाण है कि ओडिशा के लोग आज भी अपने समुद्री पूर्वजों से जुड़े हैं, और उनकी बहादुरी को कभी नहीं भूलते।The King of Maritime Trade: Ganjam
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