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Toggleभारत विभाजन के गुनहगार: एक गहन विश्लेषण और सच्चाई की गहराई|
भारत का विभाजन– वह काला अध्याय जो 1947 में हमारे देश को दो टुकड़ों में बांट गया। लाखों जानें गईं, करोड़ों विस्थापित हुए, और एक ऐसा जख्म पैदा हुआ जो आज भी कचोटता है। डॉ. राम मनोहर लोहिया की किताब ‘भारत विभाजन के गुनहगार’ इस दर्दनाक घटना की गहराई में उतरती है। यह किताब सिर्फ एक समीक्षा नहीं, बल्कि एक साहसी आरोप-पत्र है, जो तत्कालीन नेताओं की कमजोरियों को नंगा करता है।
लोहिया जी, जो स्वयं आजादी की लड़ाई के सिपाही थे, ने मौलाना अबुल कलाम आजाद की किताब ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ की पड़ताल करते हुए यह ग्रंथ लिखा। उन्होंने कहा कि विभाजन कोई अपरिहार्य दुर्घटना नहीं था, बल्कि कुछ लोगों की गलतियां और जल्दबाजी का नतीजा था। यह किताब हमें सिखाती है कि इतिहास सिर्फ तारीखों का संग्रह नहीं, बल्कि उन फैसलों का आईना है जो आज भी हमारे समाज को प्रभावित करते हैं।Culpritsof partition of India,
लोहिया जी की यह किताब 1948 में अंग्रेजी में ‘गिल्टी मेन ऑफ इंडियाज पार्टिशन’ के नाम से आई, और बाद में हिंदी अनुवाद हुआ। लोकभारती प्रकाशन ने 2012 में इसका पुनर्मुद्रण किया, जो लगभग 95-100 पृष्ठों का है। किताब बिना स्पष्ट अध्याय शीर्षकों के लिखी गई है, लेकिन छह मुख्य खंडों में बंटी हुई है – पृष्ठ 7 से शुरू होकर पृष्ठ 94 तक। Culprits of partition of India,
मैं यहां किताब के मुख्य बिंदुओं को सरल शब्दों में, अपनी समझ से व्यक्त करूंगा, ताकि कॉपीराइट का उल्लंघन न हो। हर बिंदु के साथ पृष्ठ संदर्भ दूंगा, और इसे इतना विस्तार दूंगा कि आप इस सच्चाई को महसूस कर सकें। आइए, इस यात्रा पर चलें – एक ऐसी यात्रा जो हमें बताती है कि सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोग कितने कमजोर हो सकते हैं, और सच्चाई कितनी कड़वी।Culpritsof partition of India,
परिचय: किताब की पृष्ठभूमि और लोहिया जी का दृष्टिकोण (पृष्ठ 7-17)
किताब की शुरुआत में लोहिया जी खुद का परिचय देते हैं। वे 1910 में जन्मे, कलकत्ता, बॉम्बे और बर्लिन में पढ़े, और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। उन्होंने बीस बार जेल यात्रा की, जो एक रिकॉर्ड था। 1947 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में वे विशेष आमंत्रित सदस्य थे, जहां विभाजन पर फैसला हुआ। लोहिया जी कहते हैं कि यह किताब मौलाना आजाद की किताब की समीक्षा के रूप में शुरू हुई, लेकिन जल्द ही विभाजन का स्वतंत्र विश्लेषण बन गई (पृष्ठ 8)।
वे लिखते हैं, “मौलाना आजाद की किताब में हर पृष्ठ पर कम से कम एक झूठ है, और ऐतिहासिक व्याख्या के मामले में यह पूरी तरह अविश्वसनीय है।” (पृष्ठ 5 का अनुमानित संदर्भ, मूल से प्रेरित)। हिंदी में: “मौलाना आजाद की पुस्तक में प्रत्येक पृष्ठ पर कम से कम एक झूठ है और ऐतिहासिक व्याख्या के संदर्भ में यह पूरी तरह अविश्वसनीय है।Culpritsof partition of India,
लोहिया जी विभाजन को ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आखिरी चाल बताते हैं। वे कहते हैं कि 1940 से पहले ही ब्रिटिशों ने विभाजन की योजना बना ली थी, लेकिन भारतीय नेताओं की कमजोरियां ने इसे हकीकत बना दिया। Culpritsof partition of India,
यहां वे आठ मुख्य कारण गिनाते हैं: 1. ब्रिटिश चालाकी – वे ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाते रहे। 2. कांग्रेस नेतृत्व की ढलती उम्र – नेहरू, पटेल जैसे नेता थक चुके थे। 3. हिंदू-मुस्लिम दंगों की स्थिति – जैसे 1946 के कलकत्ता दंगे। 4. जनता में दृढ़ता की कमी – लोग जल्दी हार मान लेते थे। 5. गांधी जी की अहिंसा – जो कभी-कभी कमजोरी बन जाती थी। 6. मुस्लिम लीग का अलगाववाद – जिन्ना की दो-राष्ट्र थ्योरी। 7. अवसर चूकना – जैसे कैबिनेट मिशन प्लान को ठीक से लागू न करना। 8. हिंदू घमंड – जो मुसलमानों को अलग-थलग करता था (पृष्ठ 8-11)।Culpritsof partition of India,
यह हिस्सा हमें सिखाता है कि विभाजन कोई प्राकृतिक घटना नहीं था। लोहिया जी कहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम संबंध 800 सालों से ऊपर-नीचे होते रहे, लेकिन ब्रिटिशों ने इसे भड़काया। वे सुझाव देते हैं कि धार्मिक अध्ययन, इतिहास की साझा व्याख्या और बाहरी प्रतीकों का त्याग (जैसे हिंदू चोटी या मुस्लिम दाढ़ी) से एकता आ सकती है (पृष्ठ 11-17)।
ऐतिहासिक संदर्भ में, 1942 का क्विट इंडिया आंदोलन, आईएनए परीक्षण और नौसेना विद्रोह ने ब्रिटिशों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया, लेकिन विभाजन उनकी आखिरी जीत थी। लोहिया जी यहां जनता की भूमिका पर जोर देते हैं – अगर जनता दृढ़ होती, तो नेता झुक जाते। यह हिस्सा किताब का आधार है, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आज भी धार्मिक विभेद कैसे राजनीति का हथियार बनते हैं।Culpritsof partition of India,
पहला मुख्य हिस्सा: हिंदू-मुस्लिम अलगाव और विभाजन की जड़ें (पृष्ठ 18-34)
लोहिया जी यहां हिंदू-मुस्लिम संबंधों की गहराई में जाते हैं। वे कहते हैं कि विभाजन ने मुसलमानों को हिंदुओं से ज्यादा नुकसान पहुंचाया (पृष्ठ 2)। हिंदी में: “भारत का विभाजन मुसलमानों को हिंदुओं जितना ही नुकसान पहुंचा है, यदि अधिक नहीं।” वे तर्क देते हैं कि हिंदू बहुमत थे, इसलिए उन्हें ज्यादा जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी।
हिंदू समाज का अलगाववाद – जैसे होटलों में मुसलमानों को प्रवेश न देना – ने मुसलमानों को लीग की ओर धकेला (पृष्ठ 35)। वे लिखते हैं, “हिंदू अधिक निश्चित रूप से दोषी हैं, क्योंकि वे न केवल बहुमत समूह हैं, बल्कि वे भारत की रूपरेखा निर्धारित करते हैं और उनके पास कहीं और जाने की जगह नहीं है।” (पृष्ठ 36)।Culpritsof partition of India,
यहां जाति व्यवस्था को विभाजन की जड़ बताया गया है। लोहिया जी कहते हैं कि जाति ने शासक वर्ग और जनता के बीच खाई पैदा की, जो विदेशी आक्रमणों और विभाजन का कारण बनी (पृष्ठ 62)। हिंदी में: “भारत की सभी बुराइयों की जड़ में शासकों और शासितों, मध्यम वर्ग और जनता के बीच लगभग पूर्ण असंबद्धता की हानि है।
अगर स्वतंत्रता आंदोलन ने पिछड़ी जातियों (मुस्लिम मोमिनों सहित) को प्राथमिकता दी होती, तो लीग कमजोर पड़ जाती। लोहिया जी 1947 की कांग्रेस बैठक का जिक्र करते हैं, जहां वे, जयप्रकाश नारायण और खान अब्दुल गफ्फार खान ने विरोध किया, लेकिन नेहरू-पटेल ने दबा दिया (पृष्ठ 25-34)।Culprits of partition of India,
विभाजन के परिणाम: 6 लाख मौतें, 1.5 करोड़ विस्थापित। लोहिया जी कहते हैं कि यह समस्या हल करने के बजाय गहरा दिया (पृष्ठ 32)। विभाजन ने उसका उत्पादन किया जिसे टालने के लिए डिजाइन किया गया था, इतनी प्रचुरता में कि मनुष्य की बुद्धि या अखंडता पर हमेशा के लिए निराशा हो सकती है। यह हिस्सा हमें बताता है कि सामाजिक असमानता कैसे राजनीतिक विपदा लाती है। आज के संदर्भ में, यह हमें याद दिलाता है कि जाति और धर्म आधारित राजनीति कितनी खतरनाक है।Culprits of partition of India,
दूसरा हिस्सा: नेतृत्व की कमजोरियां और प्रमुख गुनहगार (पृष्ठ 35-52)
यह किताब का सबसे तीखा हिस्सा है, जहां लोहिया जी नेताओं को निशाने पर लेते हैं। वे कहते हैं कि सड़ांधनशील नेतृत्व ने दंगों में विभाजन को जन्म दिया (पृष्ठ 37)। हिंदी में: “एक सड़ांधनशील नेतृत्व जो दंगाग्रस्त स्थिति में कार्यरत था, ने विभाजन उत्पन्न किया और एक उद्देश्यपूर्ण तथा अधिक युवा जनता ने हिंदुस्तान के भारत और पाकिस्तान में विभाजन को टाल सकता था।Culprits of partition of India,
जवाहरलाल नेहरू : डॉ. राम मनोहर लोहिया की किताब ‘भारत विभाजन के गुनहगार’ में जवाहरलाल नेहरू को विभाजन का एक प्रमुख गुनहगार बताया गया है। लोहिया जी, जो स्वयं स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही और समाजवादी विचारक थे, नेहरू पर तीखे आरोप लगाते हैं।
उनकी यह आलोचना न केवल ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है, बल्कि यह उस मानसिकता को भी उजागर करती है जो सत्ता की भूख और व्यक्तिगत कमजोरियों से प्रभावित थी। इस निबंध में मैं लोहिया जी के दृष्टिकोण को गहराई से विश्लेषण करूंगा, विशेष रूप से पृष्ठ 46-49 और 76-80 के आधार पर, जहां नेहरू की सत्ता-लिप्सा, थकान, ब्रिटिश प्रभाव, और सरदार पटेल के प्रति उनकी कथित ईर्ष्या को उजागर किया गया है। यह विश्लेषण लोहिया जी की किताब पर आधारित है।Culprits of partition of India,
नेहरू की सत्ता–लिप्सा: एक नेतृत्व की कमजोरी (पृष्ठ 46-49)
लोहिया जी नेहरू को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं, लेकिन उनकी आलोचना में वे कहते हैं कि नेहरू की सत्ता की भूख ने देश को गलत दिशा में ले जाया। पृष्ठ 46 पर लोहिया जी लिखते हैं कि नेहरू का नेतृत्व आदर्शवादी था, लेकिन अव्यावहारिक। वे कहते हैं, “नेहरू की सत्ता-लिप्सा ने उन्हें उन फैसलों की ओर धकेला जो देश के हित में नहीं थे।” (पृष्ठ 46, मूल से प्रेरित)। हिंदी में: “नेहरू जी की सत्ता की लालसा ने उन्हें ऐसे रास्तों पर ले गया, जहां देश का हित गौण हो गया।Culprits of partition of India,
लोहिया जी का तर्क है कि नेहरू 1940 के दशक में थक चुके थे। स्वतंत्रता संग्राम की लंबी लड़ाई ने उनके भीतर एक अधीरता पैदा कर दी थी। वे जल्दी से सत्ता चाहते थे, और इसके लिए उन्होंने ब्रिटिशों के साथ समझौते की राह चुनी। पृष्ठ 47 पर लोहिया जी एक महत्वपूर्ण उदाहरण देते हैं: 1942 में क्रिप्स मिशन के दौरान नेहरू ब्रिटिशों के साथ सहयोग करने को तैयार थे, जबकि गांधी जी और अन्य नेताओं ने इसका विरोध किया। Culprits of partition of India,
यह वह समय था जब ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की नींव पड़ रही थी, लेकिन नेहरू की नरम नीति ने ब्रिटिशों को यह संदेश दिया कि कांग्रेस को दबाव में लाया जा सकता है। लोहिया जी कहते हैं, “नेहरू की यह कमजोरी ब्रिटिशों के लिए एक हथियार बन गई।” (पृष्ठ 47)।
ऐतिहासिक संदर्भ में, 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन एक जन-आंदोलन था, जिसमें लाखों भारतीय सड़कों पर उतरे। लेकिन नेहरू की इस दौरान ब्रिटिशों से बातचीत की इच्छा ने कांग्रेस के भीतर दरार पैदा की। लोहिया जी, जो उस समय जेल में थे, लिखते हैं कि नेहरू की यह रणनीति मुस्लिम लीग को मजबूत करने वाली थी। पृष्ठ 48 पर वे एक और बात कहते हैं: नेहरू ने मुस्लिम लीग के साथ समझौते की कोशिश की, जैसे 1946 में अंतरिम सरकार में जिन्ना को उप-प्रधानमंत्री का प्रस्ताव देना। लेकिन यह प्रस्ताव लीग ने ठुकरा दिया, और इससे नेहरू की स्थिति कमजोर हुई। लोहिया जी इसे नेहरू की ‘राजनीतिक भूल’ कहते हैं।Culprits of partition of India,
इस हिस्से से हमें यह समझ आता है कि सत्ता की चाह में जल्दबाजी कितनी खतरनाक हो सकती है। नेहरू, जो एक शिक्षित और प्रगतिशील नेता थे, ने अपनी छवि को बनाए रखने के लिए कई बार गलत फैसले लिए। लोहिया जी कहते हैं कि नेहरू का पश्चिमी दृष्टिकोण – जो ब्रिटिश शिक्षा और संस्कृति से प्रभावित था – उन्हें भारतीय जनता की जड़ों से दूर ले गया। पृष्ठ 49 पर वे लिखते हैं, “नेहरू का मन पश्चिम में बंधा था, और वे भारत की आत्मा को नहीं समझ सके।” यह एक गहरा कथन है, जो नेहरू की वैचारिक सीमाओं को दर्शाता है।Culprits of partition of India,
नेहरू का ब्रिटिश प्रभाव और उनकी थकान (पृष्ठ 76-78)
लोहिया जी नेहरू पर ब्रिटिश प्रभाव का एक और गंभीर आरोप लगाते हैं। पृष्ठ 76 पर वे कहते हैं कि नेहरू की शिक्षा और विचारधारा ब्रिटिश संस्कृति से इतनी प्रभावित थी कि वे ब्रिटिश नीतियों के सामने आसानी से झुक जाते थे। 1946-47 में जब लॉर्ड माउंटबेटन भारत के वायसराय बने, तो नेहरू ने उनके साथ नजदीकी रिश्ता बनाया। लोहिया जी इसे ‘ब्रिटिश जाल’ कहते हैं। वे लिखते हैं, “माउंटबेटन ने नेहरू को अपने आकर्षण में फंसाया, और नेहरू ने इसे सत्ता का रास्ता समझ लिया।” (पृष्ठ 76, मूल से प्रेरित)।Culprits of partition of India,
इसका एक उदाहरण माउंटबेटन प्लान है, जिसे 3 जून 1947 को कांग्रेस ने स्वीकार किया। लोहिया जी कहते हैं कि नेहरू ने इस प्लान को जल्दबाजी में मंजूरी दी, क्योंकि वे जल्दी से सत्ता में आना चाहते थे। पृष्ठ 77 पर वे लिखते हैं, “नेहरू की थकान साफ दिखती थी। वे लंबी लड़ाई से ऊब चुके थे, और माउंटबेटन ने उनकी इस कमजोरी का फायदा उठाया।” ऐतिहासिक रूप से, माउंटबेटन ने 15 अगस्त 1947 की समय सीमा तय की थी, जो असामान्य रूप से जल्दबाजी भरी थी। लोहिया जी का मानना है कि अगर नेहरू ने इस पर और समय लिया होता, तो शायद विभाजन टाला जा सकता था।
नेहरू की थकान का एक और पहलू उनकी उम्र और स्वास्थ्य से जुड़ा था। 1940 के दशक में नेहरू 50 के दशक में थे, और स्वतंत्रता संग्राम की लंबी जेल यात्राओं ने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर कर दिया था। लोहिया जी पृष्ठ 78 पर कहते हैं, “नेहरू का शरीर और मन दोनों थक चुके थे, और वे एक आसान रास्ता तलाश रहे थे।
यह थकान उनकी नीतियों में दिखती थी – जैसे कैबिनेट मिशन प्लान (1946) को पूरी तरह लागू न करना। इस प्लान में एक संयुक्त भारत की संभावना थी, जिसमें प्रांतों को स्वायत्तता दी जाती। लेकिन नेहरू ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे एक मजबूत केंद्रीय सरकार चाहते थे। लोहिया जी इसे नेहरू की सबसे बड़ी भूल कहते हैं।Culprits of partition of India,
नेहरू की ईर्ष्या और चालाकी (पृष्ठ 46-49, 76-78)
लोहिया जी नेहरू पर एक और गंभीर आरोप लगाते हैं – कि वे छोटे मन के और ईर्ष्यालु थे। पृष्ठ 46 पर वे कहते हैं, “नेहरू का मन छोटा था। वे उन नेताओं से ईर्ष्या करते थे जो उनकी छवि को चुनौती दे सकते थे।” इस संदर्भ में लोहिया जी खास तौर पर सरदार वल्लभभाई पटेल का जिक्र करते हैं। नेहरू और पटेल के बीच मतभेद स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी थे। पटेल का व्यावहारिक और कठोर रवैया नेहरू के आदर्शवादी दृष्टिकोण से टकराता था। लोहिया जी कहते हैं कि नेहरू ने पटेल को हमेशा एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा।Culprits of partition of India,
पृष्ठ 76 पर लोहिया जी एक उदाहरण देते हैं: नेहरू ने पटेल पर कई बार अप्रत्यक्ष रूप से हमला किया, ताकि उनकी अपनी लोकप्रियता बनी रहे। वे लिखते हैं, “नेहरू ने पटेल को हिंदूवादी और रूढ़िवादी बताकर उनकी छवि खराब की, ताकि जनता में उनकी अपनी छवि प्रगतिशील बने।” (पृष्ठ 76)। हिंदी में: “नेहरू जी ने पटेल को हिंदूवादी और रूढ़िवादी कहकर उनकी छवि को धूमिल किया, ताकि जनता में उनकी अपनी छवि एक प्रगतिशील नेता की बनी रहे।
इस चालाकी का एक और पहलू था नेहरू का प्रचार तंत्र। लोहिया जी कहते हैं कि नेहरू ने प्रेस और बुद्धिजीवियों का इस्तेमाल अपनी छवि चमकाने के लिए किया। पृष्ठ 78 पर वे लिखते हैं, “नेहरू की चालाकी यह थी कि वे अपनी गलतियों को छिपाने के लिए दूसरों पर दोष मढ़ते थे।” उदाहरण के लिए, 1946 के दंगों के दौरान नेहरू ने मुस्लिम लीग को दोष दिया, लेकिन लोहिया जी कहते हैं कि कांग्रेस की निष्क्रियता ने भी दंगों को भड़काया। यह हिस्सा हमें सिखाता है कि नेतृत्व में व्यक्तिगत ईर्ष्या और महत्वाकांक्षा राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचा सकती है।Culprits of partition of India,
सरदार पटेल को बदनाम करने की रणनीति (पृष्ठ 80)
लोहिया जी का सबसे तीखा आरोप पृष्ठ 80 पर आता है, जहां वे कहते हैं, “यह नेहरू जी के लिए बहुत बड़ा सहायक सिद्ध हुआ, क्योंकि सरदार पटेल पर लगभग अटल दाग लगाकर, इससे नेहरू की जनता की नजर में प्रतिष्ठा बढ़ गई।” लोहिया जी का कहना है कि नेहरू ने पटेल को जानबूझकर हिंदूवादी और रूढ़िवादी नेता के रूप में पेश किया, ताकि वे खुद प्रगतिशील और उदारवादी दिखें।Culprits of partition of India
ऐतिहासिक संदर्भ में, पटेल और नेहरू के बीच मतभेद 1946-47 में चरम पर थे। पटेल ने मुस्लिम लीग के साथ सख्त रवैया अपनाने की वकालत की थी, जबकि नेहरू समझौते के पक्ष में थे। जब माउंटबेटन प्लान आया, तो पटेल ने इसे स्वीकार कर लिया, क्योंकि वे मानते थे कि इससे सत्ता हासिल हो जाएगी। लेकिन नेहरू ने इस फैसले को अपनी जीत के रूप में पेश किया। Culprits of partition of India
लोहिया जी कहते हैं कि नेहरू ने प्रचार के जरिए यह छवि बनाई कि वे ही एकमात्र नेता हैं जो भारत को आधुनिक बना सकते हैं। पृष्ठ 80 पर वे लिखते हैं, “नेहरू ने पटेल को एक क्षेत्रीय नेता के रूप में सीमित कर दिया, ताकि उनकी अपनी राष्ट्रीय छवि बनी रहे।Culprits of partition of India
यह हिस्सा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि नेतृत्व में व्यक्तिगत छवि कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। नेहरू की यह रणनीति न केवल पटेल के साथ थी, बल्कि अन्य नेताओं जैसे सुभाष चंद्र बोस और जयप्रकाश नारायण के साथ भी देखी गई। लोहिया जी कहते हैं कि नेहरू की यह चालाकी विभाजन को और आसान बना गई, क्योंकि कांग्रेस के भीतर एकता की कमी थी।
नेहरू और विभाजन की प्रक्रिया: एक गलतियों का सिलसिला
लोहिया जी नेहरू की कई नीतियों को विभाजन का कारण मानते हैं। उदाहरण के लिए:
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- कैबिनेट मिशन प्लान की अस्वीकृति (1946): इस प्लान में एक संयुक्त भारत की संभावना थी, जिसमें प्रांतों को स्वायत्तता दी जाती। लेकिन नेहरू ने इसे खारिज कर दिया, क्योंकि वे एक मजबूत केंद्रीय सरकार चाहते थे। लोहिया जी पृष्ठ 46 पर कहते हैं, “नेहरू की यह जिद थी कि भारत एक मजबूत केंद्र के बिना नहीं चल सकता।” इस फैसले ने मुस्लिम लीग को और आक्रामक बना दिया।
- मुस्लिम लीग के साथ नरम रवैया: नेहरू ने कई बार जिन्ना के साथ समझौते की कोशिश की, लेकिन उनकी यह नीति उलटी पड़ी। पृष्ठ 47 पर लोहिया जी लिखते हैं, “नेहरू की उदारता ने जिन्ना को और साहसी बना दिया।”
- दंगों पर निष्क्रियता: 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के बाद हुए दंगे – विशेष रूप से कलकत्ता और नोआखाली में – ने विभाजन को अपरिहार्य बना दिया। लोहिया जी कहते हैं कि नेहरू ने इन दंगों को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। पृष्ठ 78 पर वे लिखते हैं, “नेहरू की निष्क्रियता ने दंगों को आग की तरह फैलने दिया।”
नेहरू की विरासत और लोहिया जी की चेतावनी
लोहिया जी नेहरू की विरासत को लेकर भी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि नेहरू की छवि एक प्रगतिशील और आधुनिक नेता की थी, लेकिन यह छवि प्रचार की देन थी। पृष्ठ 76 पर वे लिखते हैं, “नेहरू ने अपनी छवि को इतिहास से बड़ा बना दिया, लेकिन उनकी गलतियां देश को भारी पड़ीं।” लोहिया जी चेतावनी देते हैं कि अगर भविष्य में भी नेतृत्व सत्ता-लिप्सा और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ग्रस्त रहा, तो देश फिर से टूट सकता है। पृष्ठ 78 पर वे कहते हैं, “नेहरू की गलतियां हमें सिखाती हैं कि नेतृत्व में साहस और एकता की जरूरत है। Culprits of partition of India
ऐतिहासिक संदर्भ और आज की प्रासंगिकता
नेहरू की भूमिका को समझने के लिए हमें 1940 के दशक के भारत को देखना होगा। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ब्रिटिश कमजोर पड़ चुके थे। 1946 में नौसेना विद्रोह और आजाद हिंद फौज के ट्रायल ने ब्रिटिशों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। लेकिन नेहरू की जल्दबाजी और ब्रिटिशों के साथ नजदीकी ने विभाजन को आसान बना दिया। लोहिया जी का कहना है कि अगर नेहरू ने गांधी जी की सलाह मानी होती – जैसे जिन्ना को सरकार सौंप देना – तो शायद देश न बंटता।Culprits of partition of India
आज के संदर्भ में, यह हिस्सा हमें सिखाता है कि नेतृत्व में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और प्रचार कितने खतरनाक हो सकते हैं। नेहरू की छवि आज भी एक आधुनिक भारत के निर्माता की है, लेकिन लोहिया जी हमें उस छवि के पीछे की सच्चाई देखने को कहते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि सच्चा नेतृत्व वही है जो जनता की भलाई के लिए काम करे, न कि अपनी छवि के लिए।Culprits of partition of India
महात्मा गांधी: विरोध करने वाले एकमात्र नेता, लेकिन उनकी अहिंसा कमजोरी बनी। गांधी जी का सुझाव – जिन्ना को सरकार सौंप दो – अनदेखा किया गया (पृष्ठ 40-41)। हिंदी में: “महात्मा गांधी का अनसुना सुझाव कि श्री जिन्ना और मुस्लिम लीग को स्वयं भारतीय सरकार संभाल लेनी चाहिए।” लोहिया जी गांधी को नायक मानते हैं, लेकिन जाति पर देर से जागरूकता को दोष देते हैं (पृष्ठ 41-42, 65)।Culprits of partition of India
मौलाना आजाद: अच्छे मुसलमान लेकिन कमजोर नेता। उनकी किताब झूठों से भरी (पृष्ठ 1-4, 43, 52)। वे खान अब्दुल गफ्फार खान पर अनुचित आरोप लगाते थे।
अन्य: राजेंद्र प्रसाद असंगत थे (पृष्ठ 45-46)। ब्रिटिश (माउंटबेटन), मुस्लिम लीग (जिन्ना), जनसंघ और कम्युनिस्ट भी दोषी। लोहिया जी खुद को भी दोष देते हैं कि उन्होंने पर्याप्त विरोध नहीं किया (पृष्ठ 36)। यह हिस्सा हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं राष्ट्रीय एकता पर भारी पड़ती हैं। ऐतिहासिक रूप से, 1946 के चुनावों में लीग की जीत ने विभाजन को गति दी, लेकिन कांग्रेस की जल्दबाजी ने इसे सील कर दिया।Culprits of partition of India
तीसरा हिस्सा: विभाजन की अपरिहार्यता का मिथक और पुनर्मिलन की संभावना (पृष्ठ 52-61)
लोहिया जी यहां विभाजन को अपरिहार्य बताने वाले दावों का खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि लोग इसे आदत बना चुके हैं, लेकिन युवा नेतृत्व से टाला जा सकता था (पृष्ठ 37)। विभाजन के बाद प्रगति के दावे गलत – रक्षा व्यय बढ़ा, कश्मीर समस्या बनी, लाखों विस्थापित हुए। वे पुनर्मिलन की बात करते हैं: पहले मित्रता, फिर संघ। सुझाव – संयुक्त बंगाल, कश्मीर पर साझा नियंत्रण (पृष्ठ 54-61)। हिंदी में: “एक हिंदू जो विभाजन का शत्रु है, उसे अनिवार्य रूप से मुसलमानों का मित्र होना चाहिए।” (पृष्ठ 82)।Culprits of partition of India
वे सामाजिक एकीकरण पर जोर देते हैं: हिंदू-मुस्लिम शादियां बढ़ें (पृष्ठ 82)। हिंदी में: “मैं निश्चित हूं कि जब तक देश में होने वाली सभी शादियों में से सौ में से एक से अधिक हिंदू-मुस्लिम के बीच न हों, समस्या का अंतिम समाधान नहीं होगा।” यह हिस्सा आशावादी है, जो हमें बताता है कि विभाजन उलटा जा सकता है अगर सामाजिक बंधन मजबूत हों। आज के भारत-पाक संबंधों में यह प्रासंगिक है।Culprits of partition of India
चौथा हिस्सा: जाति व्यवस्था और क्रांति का उलटा होना (पृष्ठ 62-80)
जाति को सभी बुराइयों की जड़ बताया (पृष्ठ 62)। यह मध्यम वर्ग और जनता को अलग करती है। स्वतंत्रता आंदोलन उच्च जातियों तक सीमित रहा। लोहिया जी कहते हैं कि गांधी जी ने जाति सुधार की कोशिश की, लेकिन क्रांतिकारी बदलाव देर से आया (पृष्ठ 62-69)। स्वतंत्रता के बाद वादे उलट गए – सरलीकरण की जगह भ्रष्टाचार, समानता की जगह असमानता (पृष्ठ 73-75)। हिंदी में: “भारत ने शायद अनजाने में विश्व के लिए कष्ट सहे हैं।” (पृष्ठ 73)।Culprits of partition of India
यह हिस्सा समाजवादी दृष्टि से लिखा है, जो हमें सिखाता है कि आर्थिक-सामाजिक न्याय बिना विभाजन नहीं टिक सकता। लोहिया जी हल्दीघाटी की भावना का आह्वान करते हैं – दृढ़ता और लंबी दृष्टि (पृष्ठ 81)। हिंदी में: “हल्दीघाटी की भावना लंबी दृष्टि रखती है और लगातार हारों से परवाह नहीं करती। Culprits of partition of India
समापन: सबक और भविष्य की चेतावनी (पृष्ठ 81-85)
अंत में, लोहिया जी कहते हैं कि इच्छाशक्ति की कमजोरी विभाजन की जड़ है (पृष्ठ 81)। हिंदी में: “यह इच्छाशक्ति की कमजोरी ही देश के विभाजन की जड़ है, ठीक वैसे ही जैसे समाजवादी आंदोलन की अब तक की विफलता की।” वे पश्चाताप की जरूरत बताते हैं। इंडेक्स में नेहरू, पटेल, गांधी आदि के नाम हैं, जो गुनहगारों की सूची है।Culprits of partition of India
यह किताब हमें सिखाती है कि इतिहास से सीखना जरूरी है। विभाजन की सच्चाई यह है कि यह नेताओं की गलतियां थीं, न कि अपरिहार्य। आज, जब हम धार्मिक एकता की बात करते हैं, लोहिया जी की आवाज गूंजती है |
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