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Toggleपिपिलिवन से मौर्य साम्राज्य तक: चंद्रगुप्त मौर्य की अनसुनी कहानियां|From Pipilivan to Mauryan Empire: The Untold Story of Chandragupta Maurya’s Rise to Power.
इतिहास की धूल भरी पन्नों में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो समय के साथ और भी चमक उठती हैं। चंद्रगुप्त मौर्य की कहानी ऐसी ही है – एक साधारण बालक से भारत के सबसे विशाल साम्राज्य के संस्थापक तक का सफर। यह कहानी न केवल युद्ध, विजय और रणनीति की है, बल्कि एक इंसान के जज्बे, उसकी कमजोरियों और उसकी आध्यात्मिक यात्रा की भी है।
आज, जब हम इतिहास को फिर से जीवंत करने की कोशिश करते हैं, हम उन सात अनसुने पहलुओं पर रोशनी डाल रहे हैं, जो शायद इतिहास की किताबों में कम ही जगह पाते हैं। यह लेख पुरुषोत्तम लाल भार्गव की पुस्तक चंद्रगुप्त मौर्य से प्रेरित है, जिसमें राधाकुमुद मुकर्जी की प्रस्तावना हमें गहरे तथ्यों तक ले जाती है। साथ ही, जैन, बौद्ध और ग्रीक स्रोतों से लिए गए कम चर्चित विवरण इस कहानी को और भी मानवीय बनाते हैं।From Pipilivan to Mauryan Empire
पिप्पलिवन का इतिहास: एक प्राचीन शहर की कहानी
पिप्पलिवन कोई साधारण जगह नहीं थी। यह प्राचीन भारत में, लगभग 500 ईसा पूर्व के समय, मोरिया कबीले का मुख्य शहर था। यह उस दौर में था जब भारत में कई छोटे-बड़े राज्य और गणराज्य थे, जिन्हें महाजनपद कहा जाता था। पिप्पलिवन की कहानी हमें उस समय की सैर कराती है, जब भारत का इतिहास विश्व मंच पर अपनी छाप छोड़ रहा था।
कहां था पिप्पलिवन?
पिप्पलिवन आज के नेपाल के तराई क्षेत्र में लुंबिनी (रुक्मिनदेई) और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में कसिया के बीच कहीं स्थित था। प्राचीन ग्रंथों और चीनी यात्री ह्वेनसांग (7वीं शताब्दी) के विवरण से पता चलता है कि यहाँ एक प्रसिद्ध अंगार स्तूप था, जिसमें भगवान बुद्ध के अवशेष रखे गए थे। एक अन्य यात्री, फा-ह्यान, ने लिखा कि यह जगह अनोमा नदी से चार योजन (लगभग 48 किमी) पूर्व और कुशीनारा से बारह योजन पश्चिम में थी। यानी यह बौद्ध धर्म के लिए भी बहुत पवित्र थी।
मोरिया कबीले का गणराज्य
पिप्पलिवन मोरिया कबीले की राजधानी थी। मोरिया लोग क्षत्रिय थे और उनका गणराज्य था, यानी राजा की जगह सामूहिक शासन चलता था। उस समय के बड़े-बड़े राज्यों जैसे मगध के विपरीत, यहाँ लोग मिलकर फैसले लेते थे। पिप्पलिवन का नाम वहाँ के पीपल के पेड़ों (पिप्फली) से आया, जो मोरिया कबीले की पहचान से जुड़ा था।From Pipilivan to Mauryan Empire
महत्वपूर्ण तिथियां:
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- लगभग 345 ईसा पूर्व: चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म पिपिलिवन में।
- 323 ईसा पूर्व: अलेक्जेंडर की मृत्यु, जिसके बाद पंजाब में ग्रीक शासन कमजोर हुआ।
- 317 ईसा पूर्व: ग्रीक गवर्नर यूडेमोस द्वारा पोरस की हत्या, चंद्रगुप्त का विद्रोह शुरू।
- 316 ईसा पूर्व: चंद्रगुप्त द्वारा पंजाब और सिंधु घाटी पर कब्जा।
- 313 ईसा पूर्व: नंद वंश का अंत, पाटलिपुत्र में चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक।
- 305 ईसा पूर्व: सेल्यूकस निकेटर के साथ युद्ध और संधि।
- 297 ईसा पूर्व: चंद्रगुप्त द्वारा सिंहासन त्याग और सल्लेखना व्रत, श्रवणबेलगोला में मृत्यु।
एक अनाथ की शुरुआत: पिपिलिवन का मोरिया बालक
कल्पना कीजिए, हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे से गणतंत्र को, जहां सुबह की शुरुआत मोरों की मधुर आवाजों से होती थी। पिपिलिवन, जिसे पिप्फलिवन भी कहा जाता है, वही जगह थी जहां लगभग 345 ईसा पूर्व चंद्रगुप्त का जन्म हुआ। लेकिन यह कोई राजमहल की कहानी नहीं है। From Pipilivan to Mauryan Empire
मोरिया कबीला, जो शाक्य वंश की एक शाखा था, कोसल के राजकुमार विरुधक के हमले से उजड़ चुका था। बौद्ध ग्रंथ महावंशटीका के अनुसार, शाक्य लोग हिमालय की ओर भागे और एक ऐसी जगह बसे जहां मोरों की बहुतायत थी – यही से नाम पड़ा “मोरिया”।From Pipilivan to Mauryan Empire
चंद्रगुप्त का जन्म एक कठिन समय में हुआ। उनके पिता, मोरिया कबीले के प्रमुख, को नंद राजा ने मार डाला। उनकी गर्भवती मां पाटलिपुत्र में छिपकर रही, जहां वे मोर पालने वाले के रूप में जीवन बिताने को मजबूर थीं। एक मार्मिक कहानी, जो चंद्रगुप्त मौर्य पुस्तक में मिलती है, बताती है कि चंद्रगुप्त को जन्म के बाद एक घड़े में गाय के बाड़े के पास छोड़ दिया गया था। एक बैल ने उनकी रक्षा की, जिसे लोग देवताओं का चमत्कार मानते थे। यह वह बच्चा था, जिसे नियति ने अनाथ बना दिया, लेकिन जिसके भाग्य में एक साम्राज्य लिखा था।From Pipilivan to Mauryan Empire
चाणक्य का आगमन: एक खेल जो इतिहास बना
चंद्रगुप्त का जीवन तब बदला, जब उनकी मुलाकात चाणक्य से हुई। चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य भी कहा जाता है, एक ब्राह्मण थे, जिन्हें नंद राजा ने अपमानित किया था। बदले की आग में जलते चाणक्य की नजर एक दिन उस बालक पर पड़ी, जो गांव के बच्चों के बीच राजा बनकर खेल रहा था। वह खेल कोई साधारण खेल नहीं था – चंद्रगुप्त बच्चों को आदेश दे रहे थे, न्याय कर रहे थे, और उनकी नेतृत्व क्षमता साफ झलक रही थी। चाणक्य ने इसमें एक भविष्य देखा। उन्होंने चंद्रगुप्त को खरीदा और उन्हें तक्षशिला ले गए, जहां उन्हें युद्धकला, शास्त्र और रणनीति की शिक्षा दी।From Pipilivan to Mauryan Empire
यह वह पल था, जिसने भारत के इतिहास को बदल दिया। लेकिन यह कहानी इतनी सरल नहीं थी। चंद्रगुप्त और चाणक्य का पहला प्रयास – नंद साम्राज्य पर सीधा हमला – असफल रहा। वे भागे, भटके, और फिर एक बूढ़ी औरत की सलाह ने उनकी रणनीति को नया रूप दिया। जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन में दर्ज है कि औरत ने कहा, “पहले बाहरी हिस्सों को जीतो, फिर केंद्र पर हमला करो।” यह सलाह चंद्रगुप्त के लिए टर्निंग पॉइंट बनी।From Pipilivan to Mauryan Empire
विजय का सिलसिला: पंजाब से पाटलिपुत्र तक
चंद्रगुप्त ने अपनी रणनीति बदली और पंजाब की ओर रुख किया। 323 ईसा पूर्व में अलेक्जेंडर की मृत्यु के बाद, उनके ग्रीक गवर्नर आपस में लड़ रहे थे। 317 ईसा पूर्व में, गवर्नर यूडेमोस ने पोरस को मार डाला, जिससे स्थानीय लोग भड़क उठे। चंद्रगुप्त ने इस अवसर का फायदा उठाया। उन्होंने स्थानीय राजाओं को अपने साथ मिलाया, विद्रोह भड़काया, और 316 ईसा पूर्व तक पंजाब और सिंधु घाटी पर कब्जा कर लिया।From Pipilivan to Mauryan Empire
फिर आया नंद साम्राज्य का अंत। 313 ईसा पूर्व में, चंद्रगुप्त ने पाटलिपुत्र पर हमला किया। यह युद्ध आसान नहीं था। नंदों की सेना विशाल थी, लेकिन चाणक्य की रणनीति और चंद्रगुप्त की बहादुरी ने सभी नौ नंदों को परास्त कर दिया। उसी साल, पाटलिपुत्र में चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक हुआ। सोचिए, एक अनाथ बच्चा, जिसे कभी गायों के बाड़े में छोड़ दिया गया था, अब भारत के सबसे शक्तिशाली सिंहासन पर बैठा था। लेकिन इस जीत के पीछे कितनी रातें बेचैन गुजरी होंगी, कितने दोस्त खोए होंगे – यह कोई नहीं जानता।From Pipilivan to Mauryan Empire
सेल्यूकस को चुनौती: एक वैवाहिक गठबंधन
चंद्रगुप्त की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 305 ईसा पूर्व में, अलेक्जेंडर के उत्तराधिकारी सेल्यूकस निकेटर ने भारत पर हमला किया। लेकिन चंद्रगुप्त तैयार थे। उनकी सेना, जिसमें हाथी और घुड़सवार शामिल थे, ने सेल्यूकस को हराया। संधि में सेल्यूकस ने न केवल अपने चार प्रांत – एरियाना (हेरात, कंधार, काबुल, बलूचिस्तान) – चंद्रगुप्त को सौंपे, बल्कि अपनी बेटी का विवाह भी उनके साथ किया। बदले में, चंद्रगुप्त ने 500 हाथी दिए। From Pipilivan to Mauryan Empire
सेल्यूकस ने मेगस्थनीज को राजदूत बनाकर पाटलिपुत्र भेजा, जिसकी किताब इंडिका हमें उस समय के भारत की झलक देती है। यह कम चर्चित तथ्य है कि यह संधि केवल सैन्य नहीं थी, बल्कि एक वैवाहिक गठबंधन थी, जिसने भारत और ग्रीक दुनिया को जोड़ा।From Pipilivan to Mauryan Empire
एक विशाल साम्राज्य का निर्माण
चंद्रगुप्त का साम्राज्य अभूतपूर्व था। यह अफगानिस्तान और बलूचिस्तान से लेकर दक्षिण में मायसोर तक फैला। सौराष्ट्र में रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख बताता है कि मौर्य गवर्नरों ने वहां बांध बनवाए। तमिल लेखक मुलनामेर ने मौर्य सेनाओं के तिन्नेवेली तक पहुंचने का जिक्र किया है। मायसोर के शिलालेख चंद्रगुप्त की दक्षिण विजय की पुष्टि करते हैं। लेकिन यह सिर्फ विजय की कहानी नहीं थी – चंद्रगुप्त ने एक व्यवस्थित प्रशासन बनाया।From Pipilivan to Mauryan Empire
कौटिल्य के अर्थशास्त्र से प्रेरित, उन्होंने स्थानीय स्वायत्तता को बढ़ावा दिया। जीते हुए राजाओं को अपने अधीन रखा, न कि नष्ट किया। उनकी सेना में छह बोर्ड थे – नौसेना, परिवहन, पैदल सेना, घुड़सवार, हाथी और रथ। स्थायी सेना 150,000 की थी।
पाटलिपुत्र जैसे शहरों में नगर आयोग थे, जो औद्योगिक कला, विदेशियों, व्यापार और करों का प्रबंधन करते थे। एक कम चर्चित पहलू है उनकी सुरक्षा व्यवस्था। मेगस्थनीज के अनुसार, चंद्रगुप्त हर रात बिस्तर बदलते थे, क्योंकि उन्हें साजिशों का डर था। उनकी महिलाएं उनकी रक्षा करती थीं। यह दिखाता है कि सत्ता की चमक के पीछे कितना भय था।
एक योद्धा से संन्यासी तक
चंद्रगुप्त की कहानी का सबसे रहस्यमय हिस्सा उनका अंत है। 297 ईसा पूर्व में, उन्होंने सिंहासन त्याग दिया। भद्रबाहु नामक जैन साधु के साथ वे दक्षिण भारत गए, जहां श्रवणबेलगोला में उन्होंने सल्लेखना व्रत लिया – यानी उपवास द्वारा मृत्यु। यह निर्णय एक भविष्यवाणी से प्रेरित था, जिसमें 12 साल का अकाल बताया गया था। From Pipilivan to Mauryan Empire
लेकिन दिगंबर जैन ग्रंथ इस कहानी को विवादित मानते हैं, कुछ इसे उनके वंशज संप्रीति से जोड़ते हैं। फिर भी, यह सोचने वाली बात है कि एक सम्राट, जिसने इतना विशाल साम्राज्य बनाया, वह सब छोड़कर संन्यासी बन गया। यह उनके आध्यात्मिक पक्ष को दर्शाता है।From Pipilivan to Mauryan Empire
अनसुने किस्से: चंद्रगुप्त का इंसानी चेहरा
चंद्रगुप्त की कहानी में सात ऐसे किस्से हैं, जो इतिहास की किताबों में कम ही जगह पाते हैं। पहला, उनका जन्म और अनाथ होना। दूसरा, चाणक्य से मुलाकात, जो एक साधारण खेल से शुरू हुई। तीसरा, नंद के खिलाफ पहली असफलता और बूढ़ी औरत की सलाह। चौथा, पंजाब में ग्रीक शासन को उखाड़ना। पांचवां, सेल्यूकस के साथ वैवाहिक संधि। छठा, उनकी पत्नी दुरधरा की त्रासदी, जहां चाणक्य ने उनके बेटे बिंदुसार को बचाया, लेकिन दुरधरा की जान चली गई। और सातवां, उनका संन्यास – एक योद्धा से साधु बनने का सफर।From Pipilivan to Mauryan Empire
विरासत जो आज भी जिंदा है
चंद्रगुप्त की विरासत उनके पोते अशोक में दिखती है, जिन्होंने उनके साम्राज्य को और विस्तार दिया। लेकिन चंद्रगुप्त का योगदान सिर्फ सैन्य विजयों तक सीमित नहीं था। उन्होंने एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था दी, जो आने वाले साम्राज्यों के लिए प्रेरणा बनी। उनकी कूटनीति, उनकी रणनीति, और सबसे बढ़कर, उनका त्याग – यह सब हमें सिखाता है कि महानता जन्म से नहीं, कर्म से आती है।From Pipilivan to Mauryan Empire
आज, जब हम श्रवणबेलगोला में उनके स्मारक को देखते हैं, या पाटलिपुत्र की प्राचीन सड़कों की कल्पना करते हैं, तो एक सवाल उठता है – वह कौन सा जज्बा था, जिसने एक अनाथ बालक को सम्राट बनाया? शायद जवाब उनके संघर्ष, उनकी बुद्धि और उनके दिल में बस्ती उस इंसानियत में है।From Pipilivan to Mauryan Empire
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