The Serpent Princess and the Warrior King: Saga of Jagannath.Ep-4

भाग 4: जब पुत्र ने पिता को पहचाना|The Serpent Princess and the Warrior King: Saga of Jagannath.Ep-4

पिछले भाग – एपिसोड 3

नागलोक की रहस्यमयी गहराइयों में, जगन्नाथ अपनी माता नागकन्या नागलता और नागों के वरिष्ठ गुरुओं के संरक्षण में बड़ा हो रहा है। उसका बचपन सामान्य नहीं है—उसे शिक्षा मिलती है प्राचीन वेदों, अस्त्र-शस्त्र विद्या, नागलोक की गुप्त शक्तियों और रूपांतरण कलाओं की।

लेकिन जैसे-जैसे वह बारह वर्ष का होता है, उसे आने लगते हैं अजीब सपने—एक युद्धवीर पुरुष जिसकी आँखों में दर्द और गर्व है, जलता हुआ जंगल, और एक रहस्यमयी आवाज़ जो उसे “पुत्र” कहकर पुकारती है।

उधर, मानव जगत में राजा विक्रमकेतु अपने राज्य में शांति और सत्ता को बनाए रखने में लगा है, पर उसे नहीं पता कि उसका वंश कहीं गहरे नागलोक में साँस ले रहा है। तभी राजमहल में आता है एक रहस्यमयी योगी, जो संकेत देता है कि राजा का भविष्य किसी “खोई हुई अग्नि” से जुड़ा है।

एपिसोड 3 के अंतिम दृश्य में, जब नागलोक में एक गुप्त अनुष्ठान हो रहा होता है, जगन्नाथ अनजाने में अपनी छुपी शक्ति को प्रकट कर देता है—जिससे पूरा नागलोक कांप उठता है। इस घटना से नाग परिषद चौकन्ना हो उठती है और अब वे प्रश्न उठाते हैं—कौन है यह बालक? क्या यही है वह, जिसकी भविष्यवाणी हुई थी?


1. सभा का सन्नाटा – रहस्य का पहला उदघाटन

सम्राट विक्रमकेतु की दरबार में नागसिद्ध द्वारा कही गई बात ने सभा में सन्नाटा फैला दिया।

“यह कोई साधारण बालक नहीं, यह नागलोक की वह संतान है जो दो लोकों की शक्ति को समेटे हुए है — जगन्नाथ।”

राजा की आँखें कांप उठीं। उन्होंने उस बालक के चेहरे को ध्यान से देखा —
उन आँखों में उन्हें कोई जाना-पहचाना अक्स दिखाई दिया।
वे बोले,

“बालक, क्या तुम सचमुच वही हो… जिसकी माँ एक बार इस जीवन में मुझे मिली थी?”

अर्जुन उर्फ जगन्नाथ कुछ क्षण चुप रहा। सभा में सबकी नजरें उसी पर थीं। फिर उसने कहा —

“राजन, यदि आप वही हैं जिन्होंने जंगल में एक कन्या को घायल अवस्था में देखा था… जिसे आपने प्रेम किया था, और छोड़ दिया था… तो हाँ, मैं उसी का पुत्र हूँ। मेरा नाम जगन्नाथ है।”

2. पहचान का बोझ – सम्राट का भीतर से टूटना

विक्रमकेतु को ऐसा लगा जैसे समय थम गया हो।

उन्होंने अपना राजदंड नीचे रखा और धीरे-धीरे सिंहासन से उठे।

“तुम… मेरे पुत्र हो?
लेकिन… मुझे क्यों नहीं बताया गया?
मैंने तो उसे एक स्वप्न समझ कर छोड़ दिया था…”

जगन्नाथ की आँखों में आँसू आ गए।

“राजन, मेरी माँ ने आपको संदेश नहीं भेजा क्योंकि नागलोक के नियम सख्त हैं।
लेकिन आप मेरे पिता हैं, इसमें संदेह नहीं… और यह मेरा सौभाग्य है।”

विक्रमकेतु ने उसे गले लगाने के लिए हाथ बढ़ाया —
लेकिन तभी दरबार में राजगुरु वेदव्रत ने हस्तक्षेप किया।

3. विरोध और संदेह – दरबार में द्वंद्व

राजगुरु वेदव्रत ने तीखे स्वर में कहा —

“राजन, यह बालक नागलोक से आया है। हम कैसे जानें यह हमारी सत्ता के विरुद्ध कोई चाल न हो?”

सभा में कुछ मंत्रियों ने भी सिर हिलाया।

“हमें सबूत चाहिए, राजन। यह केवल एक बालक की बात है, और एक योगी की स्वीकृति।”

राजा विक्रमकेतु के मन में द्वंद्व चल रहा था –

      • एक ओर उनका पिता-हृदय था,

      • दूसरी ओर राजा का कर्तव्य।

    जगन्नाथ आगे आया और बोला:

    “मुझे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं।
    लेकिन यदि प्रमाण चाहिए, तो मैं आपको अपनी शक्ति का अंश दिखा सकता हूँ — जो मानवों के पास नहीं होता।”

    4. शक्ति का प्रदर्शन – जिसने सबको चौंका दिया

    जगन्नाथ ने अपनी दोनों हथेलियाँ खोलीं।
    उसने आँखें बंद कीं, और शांत स्वर में मन्त्र पढ़ा।
    कुछ ही क्षणों में सभा भवन के बीच में एक विशाल नागमंडल प्रकट हो गया।

    संगमरमर की ज़मीन पर नागलिपि की रेखाएँ बन गईं, और एक श्वेत नाग का आकार वहाँ उभरा।

    “यह नागलोक की संरक्षण शक्ति है। यह केवल वही बुला सकता है जिसके रुधिर में नागवंश बहता हो।”

    सभा चकित थी। राजगुरु मौन हो गए। राजा विक्रमकेतु ने गहराई से देखा —
    अब उन्हें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने धीरे से कहा —

    “जगन्नाथ… मेरा पुत्र…”

    5. पहली बार – पिता और पुत्र का आलिंगन

    सारी सभा के सामने विक्रमकेतु सिंहासन से उतरे और धीरे से जगन्नाथ को गले से लगा लिया।

    चारों ओर मौन था। केवल हृदय की धड़कनें और एक पिता की आँखों से बहती आँसू की धार।

    “तू ना केवल मेरा उत्तराधिकारी है… तू इस युग का रक्षक है।”
    – विक्रमकेतु

    जगन्नाथ ने कहा —

    “राजन, मैं केवल पुत्र नहीं — मैं न्याय हूँ, मैं धर्म हूँ।
    मुझे शक्ति नहीं, आपके आशीर्वाद की आवश्यकता है।”

    6. परछाईं का आगमन – गुप्त शत्रु की योजना

    जैसे ही राजा और पुत्र का मिलन हुआ, दूर उत्तर दिशा के जंगलों में एक साया हँस रहा था।
    अहिरावण, नागलोक से निष्कासित दुष्ट नाग, जो अब तंत्र और काले जादू से जुड़ा हुआ था,
    एक गुफा में अपने शिष्य कालवीर्य से कह रहा था —

    “वह अब पृथ्वी पर आ गया है।
    और उसने अपने पिता को पा लिया है।
    अब वही समय है जब हम उस सत्ता को तोड़ेंगे जो दो लोकों को जोड़ती है।”

    उनकी योजना थी – राजा की हत्या कर राजगद्दी पर आसीन होना और जगन्नाथ को बंदी बना कर नागलोक के द्वार को बंद कर देना।

    7. शत्रु का पहला वार – विष का संदूक

    राजमहल में उस रात एक संदूक भेजा गया — राजदरबार के एक पुराने परिचित व्यापारी की ओर से।

    राजा विक्रमकेतु ने जैसे ही संदूक खोला, उसमें से नीले रंग का धुआँ निकलने लगा। वह विष था – ऐसा विष जिसे केवल नागलोक की संतति ही पहचान सकती थी।

    जगन्नाथ कमरे में दौड़कर आया, और उसने राजा को तुरंत बाहर खींच लिया।

    “यह विषकामिनी है – नागलोक के शापित विष से बना धुआँ।
    कोई तुम्हारी हत्या चाहता है, पिता।”

    अब राजा को समझ में आया कि उनका मिलन कुछ शक्तियों को रास नहीं आया।

    8. संकल्प – युद्ध या न्याय?

    अगली सुबह, राजा ने एक सभा बुलाई।

    “अब जब मेरा पुत्र मिला है, मैं उसे केवल उत्तराधिकारी नहीं बनाना चाहता —
    मैं उसे धर्म का वाहक बनाना चाहता हूँ।”

    राजगुरु, मंत्रिमंडल और जनसामान्य के बीच, राजा ने घोषणा की:

    “एक वर्ष तक जगन्नाथ मेरी छाया बनकर राजकार्य सीखेगा।
    उसके बाद, वह पृथ्वी और नागलोक के बीच का दूत बनेगा —
    जहाँ न युद्ध होगा, न छल — केवल न्याय होगा।”

    सभा ने जयकार की।

    लेकिन एक साया और भी था जो यह सब देख रहा था — कालवीर्य
    उसकी आँखें आग की तरह जल रही थीं।

    “वह वर्ष कभी पूरा नहीं होगा…
    उसका अंत, उसके उदय से पहले ही कर देंगे।” – कालवीर्य

    भाग 4 की मुख्य शिक्षा और विचार:

        • रक्त का रिश्ता सच्चा होता है, लेकिन उसे पहचानने के लिए साहस और सत्य की ज़रूरत होती है।
        • जब शक्ति और संयम एक साथ चलें, तभी न्याय होता है।
        • हर मिलन के साथ एक नई चुनौती आती है, और हर पहचान के पीछे छुपा होता है एक उद्देश्य।

       अगला भाग – भाग 5: कालवीर्य का प्रहार

      राजमहल पर पहला हमला, सम्राट पर एक और जानलेवा कोशिश, और जगन्नाथ का पहला असली युद्ध।
      क्या वह पिता को बचा पाएगा? क्या उसका रहस्य प्रजा के सामने उजागर हो जाएगा?

      Also read Episode 1 and 2


      The Serpent Princess and the Warrior King: Saga of Jagannath.Ep-4

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      3 thoughts on “The Serpent Princess and the Warrior King: Saga of Jagannath.Ep-4”

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