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Toggleभारत की अर्थव्यवस्था: स्वर्ण युग से आधुनिक युग तक का सफर|India’s Economic Journey: From the Golden Age to the Modern Era.
परिचय
भारत की अर्थव्यवस्था का इतिहास एक समृद्ध और जटिल गाथा है, जो प्राचीन स्वर्ण युग से लेकर आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था तक फैली हुई है। भारत, जिसे कभी “सोने की चिड़िया” कहा जाता था, ने अपनी आर्थिक यात्रा में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। इस लेख में हम भारत की अर्थव्यवस्था के विकास, स्वर्ण युग की समृद्धि, औपनिवेशिक शोषण, स्वतंत्रता के बाद की चुनौतियों, आर्थिक सुधारों और आधुनिक युग की प्रगति का विश्लेषण करेंगे। साथ ही, हम उन संकटों के कारणों की भी पड़ताल करेंगे, जिन्होंने समय-समय पर भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया।
स्वर्ण युग: प्राचीन भारत की आर्थिक समृद्धि
भारत का स्वर्ण युग, विशेष रूप से गुप्त साम्राज्य (240 ई. से 550 ई.) के दौरान, विश्व की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुसार, पहली शताब्दी में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) विश्व की कुल जीडीपी का 32.9% था। यह हिस्सेदारी 1000 ई. तक 28.9% और 1700 ई. तक 24.4% थी। इस समृद्धि के कई कारण थे:
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- कृषि आधारित अर्थव्यवस्था: प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित थी। सिंधु घाटी सभ्यता (2600-1900 ईसा पूर्व) से ही भारत में उन्नत कृषि तकनीकों का उपयोग होता था। गुप्त काल में, सिंचाई प्रणालियों और उन्नत बीजों के उपयोग ने खाद्य उत्पादन को बढ़ाया, जिसने ग्रामीण समृद्धि को बल दिया।
- वाणिज्य और व्यापार: भारत का प्राचीन व्यापार विश्व प्रसिद्ध था। रोमन साम्राज्य, मध्य एशिया, और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ जल और स्थल मार्गों के माध्यम से व्यापार होता था। मसाले, रेशम, रत्न, और सूती वस्त्र भारत के प्रमुख निर्यात थे। मालाबार तट और कोलकाता जैसे बंदरगाह व्यापार के केंद्र थे।
- हस्तशिल्प और उद्योग: भारत के हस्तशिल्प, विशेष रूप से सूती और रेशमी वस्त्र, विश्व बाजार में अत्यधिक मांग में थे। धातु कार्य, विशेष रूप से लोहा और इस्पात (जैसे वूट्ज़ स्टील), भारत की तकनीकी उन्नति का प्रतीक थे।
- सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिरता: गुप्त काल में सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिरता ने आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया। शिक्षा, कला, और विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति ने व्यापारियों और कारीगरों को प्रोत्साहन दिया।
स्वर्ण युग में संकट
हालांकि स्वर्ण युग समृद्ध था, लेकिन इस दौरान कुछ संकट भी थे:
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- आक्रमण और अस्थिरता: हूणों जैसे बाहरी आक्रमणों ने गुप्त साम्राज्य को कमजोर किया, जिससे व्यापार मार्गों पर असर पड़ा।
- आंतरिक असमानता: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच आर्थिक असमानता थी, जिसने कुछ क्षेत्रों में तनाव पैदा किया।
- प्राकृतिक आपदाएं: सूखा और बाढ़ जैसे प्राकृतिक संकटों ने कृषि उत्पादन को प्रभावित किया।
मध्यकाल: मुस्लिम युग और आर्थिक परिवर्तन
मध्यकाल (1000 ई. से 1700 ई.) में भारत की अर्थव्यवस्था में कई परिवर्तन आए। इस दौरान दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य ने भारत पर शासन किया। मुगल काल में भारत की जीडीपी विश्व की 24.4% थी, जो अभी भी एक बड़ी हिस्सेदारी थी। इस युग की आर्थिक विशेषताएं थीं:
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- मुगल अर्थव्यवस्था: मुगल शासकों ने भूमि कर प्रणाली (जैसे ज़ब्त प्रणाली) को लागू किया, जिसने राजस्व संग्रह को व्यवस्थित किया। यह प्रणाली कृषि उत्पादन को बढ़ाने में सहायक थी।
- वैश्विक व्यापार: मुगल भारत ने यूरोप, मध्य एशिया, और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार को और विस्तार दिया। मसाले, कपड़ा, और रत्न अभी भी प्रमुख निर्यात थे।
- शहरीकरण: आगरा, दिल्ली, और लाहौर जैसे शहर व्यापार और वाणिज्य के केंद्र बन गए।
मध्यकाल में संकट
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- आक्रमण और युद्ध: नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली जैसे आक्रमणकारियों ने भारत की संपत्ति को लूटा, जिससे अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा।
- कृषि निर्भरता: अर्थव्यवस्था की अत्यधिक कृषि पर निर्भरता ने इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाया।
- प्रशासनिक भ्रष्टाचार: मुगल साम्राज्य के पतन के साथ, प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ा, जिसने राजस्व संग्रह और व्यापार को प्रभावित किया।
औपनिवेशिक युग: ब्रिटिश शासन और आर्थिक शोषण
ब्रिटिश औपनिवेशिक युग (1757-1947) भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक विनाशकारी दौर था। इस दौरान भारत की विश्व जीडीपी में हिस्सेदारी 1700 के 22.3% से गिरकर 1952 में 3.8% रह गई। ब्रिटिश शासन ने भारत की अर्थव्यवस्था को कई तरीकों से प्रभावित किया:
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- डेइंडस्ट्रियलाइजेशन: ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय हस्तशिल्प उद्योग, विशेष रूप से कपड़ा उद्योग, को नष्ट कर दिया। सस्ते ब्रिटिश माल ने भारतीय बाजारों को भर दिया, जिससे स्थानीय कारीगर बेरोजगार हो गए।
- कृषि शोषण: भूमि कर प्रणालियाँ जैसे ज़मींदारी और रैयतवाड़ी ने किसानों पर भारी बोझ डाला। अकालों (जैसे 1876-78 और 1899-1900 के बंगाल अकाल) ने लाखों लोगों की जान ली।
- संपत्ति का हस्तांतरण: विलियम डिग्बी के अनुसार, 1870 से 1900 तक भारत से 900 मिलियन पाउंड की संपत्ति ब्रिटेन को हस्तांतरित की गई।
औपनिवेशिक युग में संकट
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- अकाल और गरीबी: ब्रिटिश नीतियों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण बार-बार अकाल पड़े, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया।
- औद्योगिक पिछड़ापन: औद्योगिक क्रांति का लाभ भारत को नहीं मिला, क्योंकि ब्रिटिश नीतियों ने भारत को कच्चे माल का स्रोत और तैयार माल का बाजार बनाए रखा।
- आर्थिक असमानता: शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच असमानता बढ़ी, जिसने सामाजिक तनाव को जन्म दिया।
स्वतंत्रता के बाद: समाजवादी नीतियाँ और आर्थिक चुनौतियाँ
1947 में स्वतंत्रता के बाद, भारत ने एक नई आर्थिक यात्रा शुरू की। शुरुआती दशकों में, भारत ने समाजवादी मॉडल को अपनाया, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र और केंद्रीय नियोजन पर जोर दिया गया। इस दौर की विशेषताएँ थीं:
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- पंचवर्षीय योजनाएँ: 1951 से शुरू हुई पंचवर्षीय योजनाओं ने बुनियादी ढांचे, उद्योग, और कृषि में निवेश को बढ़ावा दिया। इस्पात, खनन, और बिजली संयंत्रों का राष्ट्रीयकरण किया गया।
- आयात प्रतिस्थापन: भारत ने आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित किया और आयात प्रतिस्थापन नीति को अपनाया। इससे घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिला, लेकिन यह वैश्विक व्यापार से अलगाव का कारण भी बना।
- हिंदू विकास दर: 1950 से 1980 तक भारत की जीडीपी वृद्धि दर औसतन 3.5% रही, जिसे “हिंदू विकास दर” कहा गया। यह दक्षिण कोरिया (10%) और ताइवान (12%) जैसे देशों की तुलना में बहुत कम थी।
स्वतंत्रता के बाद संकट
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- 1965-66 का सूखा: इसने खाद्य उत्पादन को प्रभावित किया और आर्थिक विकास को धीमा कर दिया।
- 1965 का भारत-पाक युद्ध: युद्ध ने रक्षा खर्च को बढ़ाया और विदेशी सहायता में कमी आई।
- बजट घाटा: सरकार का बड़ा बजट घाटा और मुद्रास्फीति ने अर्थव्यवस्था को अस्थिर किया।
1991 का आर्थिक संकट और उदारीकरण
1991 में भारत को एक गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। विदेशी मुद्रा भंडार घटकर इतने कम हो गए कि भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा। इस संकट के कारण थे:
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- चालू खाता घाटा: आयातों की तुलना में निर्यात कम होने से चालू खाता घाटा बढ़ गया।
- मुद्रास्फीति: उच्च मुद्रास्फीति ने आर्थिक स्थिरता को प्रभावित किया।
- वैश्विक दबाव: शीत युद्ध की समाप्ति और वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों ने भारत को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
उदारीकरण और सुधार
1991 में नरसिंह राव सरकार ने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक सुधार शुरू किए। इन सुधारों में शामिल थे:
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- लाइसेंस राज का अंत: निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए लाइसेंस प्रणाली को समाप्त किया गया।
- विदेशी निवेश: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को प्रोत्साहित किया गया।
- विनियंत्रण: पेट्रोल और डीजल की कीमतों को धीरे-धीरे विनियंत्रित किया गया।
इन सुधारों के परिणामस्वरूप, भारत की अर्थव्यवस्था ने 8% से अधिक की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की। सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी), भारत की अर्थव्यवस्था का प्रमुख चालक बन गया।
आधुनिक युग: भारत की उभरती अर्थव्यवस्था
आज, भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसका नाममात्र जीडीपी 3.18 ट्रिलियन डॉलर और क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के आधार पर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। 2022-23 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.4% थी, जो विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक थी।
प्रमुख क्षेत्र
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- कृषि: भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़, जो जीडीपी का 22% और आधे से अधिक आबादी को रोजगार प्रदान करती है। 2022-23 में खाद्य उत्पादन 3235.54 लाख टन तक पहुंचा।
- सेवा क्षेत्र: जीडीपी का 55% हिस्सा सेवा क्षेत्र से आता है, जिसमें आईटी, वित्तीय सेवाएँ, और पर्यटन शामिल हैं।
- उद्योग: 1991 के सुधारों के बाद, विनिर्माण और बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ा है।
आधुनिक युग के संकट
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- कोविड-19 महामारी: 2020 में कोविड-19 ने भारत की अर्थव्यवस्था को गहरा झटका दिया। जीडीपी में 6.6% की गिरावट आई।
- बेरोजगारी: तेजी से बढ़ती जनसंख्या और शिक्षा-रोजगार के बीच असंतुलन के कारण बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती है।
- मुद्रास्फीति और सब्सिडी: 2013-14 में सब्सिडी जीडीपी का 2.26% थी, जो राजकोषीय घाटे को बढ़ाती है।
भविष्य की संभावनाएँ
भारत की अर्थव्यवस्था 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की महत्वाकांक्षा रखती है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठन भारत को अगले कुछ वर्षों तक सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था मानते हैं। हरित ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, और बुनियादी ढांचे में निवेश भारत की प्रगति को और गति देगा।
निष्कर्ष
भारत की अर्थव्यवस्था ने स्वर्ण युग की समृद्धि से लेकर औपनिवेशिक शोषण, स्वतंत्रता के बाद की चुनौतियों, और आधुनिक युग की प्रगति तक एक लंबा सफर तय किया है। प्रत्येक युग में संकटों ने भारत को नई दिशा दी, और आज भारत एक वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है। भविष्य में, समावेशी विकास, तकनीकी नवाचार, और नीतिगत सुधार भारत को और मजबूत करेंगे।
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