Kargil Vijay Diwas 2025: Honoring India’s Heroes of the 1999 War Against Pakistan.

Kargil Vijay Diwas 2025: Honoring India's Heroes of the 1999 War Against Pakistan
Kargil Vijay Diwas 2025: Honoring India's Heroes of the 1999 War Against Pakistan. कारगिल युद्ध, जिसे 'ऑपरेशन विजय' के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच मई से जुलाई 1999 तक जम्मू और कश्मीर के कारगिल जिले में लड़ा गया एक सशस्त्र संघर्ष था। यह युद्ध 18,000 फीट की ऊंचाई पर, बर्फीली चोटियों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में लड़ा गया, जो इसे विश्व के सबसे कठिन युद्धों में से एक बनाता है।

कारगिल युद्ध: भारत की वीरता और बलिदान की गाथा| Kargil Vijay Diwas 2025: Honoring India’s Heroes of the 1999 War Against Pakistan.

परिचय

कारगिल युद्ध, जिसे ‘ऑपरेशन विजय’ के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच मई से जुलाई 1999 तक जम्मू और कश्मीर के कारगिल जिले में लड़ा गया एक सशस्त्र संघर्ष था। यह युद्ध 18,000 फीट की ऊंचाई पर, बर्फीली चोटियों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में लड़ा गया, जो इसे विश्व के सबसे कठिन युद्धों में से एक बनाता है। 

इस युद्ध में भारतीय सेना ने अदम्य साहस, शौर्य और बलिदान का परिचय देते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़कर भारत की संप्रभुता की रक्षा की। हर साल 26 जुलाई को ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जो भारतीय सैनिकों की वीरता और शहादत को श्रद्धांजलि देने का दिन है। इस लेख में कारगिल युद्ध के कारणों, घटनाक्रम, रणनीति, अंतरराष्ट्रीय समर्थन, और इसकी ऐतिहासिक महत्ता को विस्तार से बताया जाएगा, साथ ही यह भी समझाया जाएगा कि कारगिल विजय दिवस क्यों मनाया जाता है।

कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का इतिहास लंबा रहा है, खासकर कश्मीर मुद्दे को लेकर। 1947 में आजादी के बाद से दोनों देशों के बीच तीन बड़े युद्ध (1947, 1965, और 1971) हो चुके थे। 1971 के युद्ध में भारत की निर्णायक जीत और बांग्लादेश के निर्माण के बाद दोनों देशों ने 1972 में शिमला समझौता किया, जिसके तहत नियंत्रण रेखा (LoC) को दोनों देशों के बीच कश्मीर में वास्तविक सीमा के रूप में मान्यता दी गई।

1998 में भारत और पाकिस्तान द्वारा परमाणु परीक्षणों के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया। हालांकि, स्थिति को शांत करने के लिए फरवरी 1999 में दोनों देशों ने लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कश्मीर मुद्दे को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने का वादा किया गया था। 

भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस समझौते के तहत बस यात्रा करके लाहौर का दौरा किया, जो शांति की दिशा में एक बड़ा कदम था। लेकिन पाकिस्तान ने इस समझौते का उल्लंघन करते हुए ‘ऑपरेशन बद्र’ शुरू किया, जिसके तहत उसने कारगिल की ऊंची चोटियों पर घुसपैठ की।

पाकिस्तानी सेना ने सर्दियों के मौसम का फायदा उठाया, जब भारतीय सेना ऊंची चोटियों पर अपनी चौकियों को छोड़कर निचले क्षेत्रों में चली जाती थी। पाकिस्तानी सैनिकों ने, कश्मीरी आतंकवादियों के वेश में, नियंत्रण रेखा पार करके भारतीय क्षेत्र में प्रवेश किया और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चोटियों जैसे टाइगर हिल, तोलोलिंग, और प्वाइंट 4875 पर कब्जा कर लिया।

 इस घुसपैठ का मुख्य उद्देश्य श्रीनगर-लेह राजमार्ग (NH1A) को काटना था, जो लद्दाख और सियाचिन ग्लेशियर के लिए भारतीय सेना की आपूर्ति का मुख्य मार्ग था। इसके अलावा, पाकिस्तान का लक्ष्य कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उभारना और भारत को सियाचिन ग्लेशियर से पीछे हटने के लिए मजबूर करना था।

युद्ध की शुरुआत

कारगिल युद्ध की शुरुआत मई 1999 में तब हुई, जब स्थानीय चरवाहों ने भारतीय सेना को कारगिल क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों की सूचना दी। शुरुआत में भारतीय सेना ने इसे सामान्य घुसपैठ माना और सोचा कि इसे जल्दी ही नियंत्रित कर लिया जाएगा। लेकिन जब खुफिया जानकारी और टोही मिशनों से पता चला कि यह एक सुनियोजित और बड़े पैमाने पर घुसपैठ थी, जिसमें पाकिस्तानी सेना और प्रशिक्षित आतंकवादी शामिल थे, तो भारत ने इसे गंभीरता से लिया।

पाकिस्तानी सेना ने करीब 5,000 सैनिकों और घुसपैठियों को नियंत्रण रेखा के पार भेजा था, जो ऊंची चोटियों पर मजबूत स्थिति में थे। इन चोटियों से वे भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रख सकते थे और श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर हमला कर सकते थे। भारतीय सेना के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण थी, क्योंकि दुश्मन ऊंचाई पर था, जहां से हमला करना आसान था, जबकि भारतीय सैनिकों को खड़ी चढ़ाई और बर्फीले इलाकों से गुजरना पड़ता था।

ऑपरेशन विजय: भारत की जवाबी कार्रवाई

जब भारत को घुसपैठ की पूरी तस्वीर समझ में आई, तो सरकार ने ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। इस ऑपरेशन में करीब 2,00,000 भारतीय सैनिकों को कारगिल क्षेत्र में भेजा गया। भारतीय सेना ने अपनी रणनीति को बेहद सावधानी से बनाया, क्योंकि युद्ध का मैदान अत्यंत कठिन था। ऊंचाई, ठंड, और ऑक्सीजन की कमी ने सैनिकों के लिए चुनौतियां बढ़ा दी थीं।

भारतीय वायुसेना ने भी ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के तहत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मिग-27, मिग-29, और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करके वायुसेना ने पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक हमले किए। बोफोर्स तोपों ने भी युद्ध का रुख बदलने में अहम भूमिका निभाई। इन तोपों के सटीक हमलों ने पाकिस्तानी चौकियों को तबाह कर दिया, जिससे भारतीय सेना को आगे बढ़ने में मदद मिली।

भारतीय नौसेना ने भी ‘ऑपरेशन तलवार’ के तहत कराची बंदरगाह के रास्ते बंद करके पाकिस्तान की आपूर्ति लाइनों को बाधित किया। इस त्रि-आयामी रणनीति ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया और उसे पीछे हटने के लिए मजबूर किया।

प्रमुख युद्ध और वीरता की कहानियां

कारगिल युद्ध में कई प्रमुख लड़ाइयां लड़ी गईं, जिनमें तोलोलिंग, टाइगर हिल, और प्वाइंट 4875 की लड़ाई सबसे महत्वपूर्ण थीं। इन लड़ाइयों में भारतीय सैनिकों ने असाधारण साहस और बलिदान का परिचय दिया। कुछ वीर सैनिकों की कहानियां आज भी देशवासियों को प्रेरित करती हैं:

      1. कैप्टन विक्रम बत्रा: कारगिल युद्ध के सबसे बड़े नायकों में से एक, कैप्टन विक्रम बत्रा ने टाइगर हिल पर कब्जा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका नारा “ये दिल मांगे मोर” पूरे देश में गूंजा। 7 जुलाई 1999 को प्वाइंट 4875 पर हमले के दौरान वे शहीद हो गए। उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
      2. ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव: टाइगर हिल पर तीन बंकरों पर कब्जा करने की जिम्मेदारी योगेंद्र सिंह यादव को दी गई थी। चढ़ाई के दौरान उन्हें 15 गोलियां लगीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दुश्मन के सैनिकों को मार गिराया। उनकी इस वीरता के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
      3. कैप्टन मनोज कुमार पांडे: जुबार टॉप पर हमले के दौरान कैप्टन मनोज पांडे ने दुश्मन के बंकरों पर कब्जा किया। गोलियों से घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने साथियों को “ना छोड़ना” कहकर प्रेरित किया। 3 जुलाई 1999 को वे शहीद हो गए और उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला।
      4. राइफलमैन संजय कुमार: टाइगर हिल पर दुश्मन के बंकरों को नष्ट करने में संजय कुमार ने असाधारण साहस दिखाया। घायल होने के बावजूद उन्होंने लड़ाई जारी रखी और ऑपरेशन की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्हें भी परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
      5. कैप्टन सौरभ कालिया: युद्ध शुरू होने से पहले ही कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों को पाकिस्तानी सेना ने बंदी बना लिया। 20 दिनों तक क्रूर अत्याचार के बाद उनकी शहादत हुई। उनकी बलिदान की कहानी कारगिल युद्ध की शुरुआत का प्रतीक है।

    इनके अलावा, सैकड़ों अन्य सैनिकों ने भी अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा की। युद्ध में कुल 527 भारतीय सैनिक शहीद हुए, जबकि 1,300 से अधिक घायल हुए।

    अंतरराष्ट्रीय समर्थन

    कारगिल युद्ध के दौरान भारत को कई देशों से कूटनीतिक और सैन्य समर्थन प्राप्त हुआ, जिसने युद्ध के परिणाम को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

        1. संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिका ने कारगिल युद्ध में भारत का खुलकर समर्थन किया। राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर दबाव डाला कि वे अपनी सेना को नियंत्रण रेखा के पीछे वापस बुलाएं। 4 जुलाई 1999 को वाशिंगटन में हुई बैठक में क्लिंटन ने शरीफ को चेतावनी दी कि यदि पाकिस्तान ने अपनी सेना वापस नहीं बुलाई, तो उसे युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा। अमेरिका ने भारत को खुफिया जानकारी भी प्रदान की, जिससे भारतीय सेना को पाकिस्तानी ठिकानों पर हमला करने में मदद मिली। इस समर्थन ने भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया।
        2. इज़रायल: इज़रायल ने भारत को सैन्य सहायता प्रदान की, जिसमें लेजर-निर्देशित मिसाइलें, मोर्टार, गोला-बारूद, और मानवरहित हवाई वाहन (UAV) शामिल थे। ये UAVs पाकिस्तानी ठिकानों की तस्वीरें लेने में महत्वपूर्ण साबित हुए। युद्ध के दौरान अमेरिका और अन्य देशों ने इज़रायल पर हथियारों की डिलीवरी में देरी करने का दबाव डाला, लेकिन इज़रायल ने भारत को तत्काल सहायता प्रदान की। यह समर्थन तब और भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि भारत और इज़रायल के बीच पूर्ण कूटनीतिक संबंध केवल 1992 में स्थापित हुए थे।
        3. रूस: रूस, भारत का लंबे समय से कूटनीतिक और सैन्य सहयोगी रहा है। कारगिल युद्ध के दौरान रूस ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का समर्थन किया और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति में सहायता की। रूस ने संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर पाकिस्तान की कार्रवाइयों की निंदा की और भारत की स्थिति को मजबूत करने में मदद की।
        4. जी8 और आसियान: जी8 देशों और आसियान क्षेत्रीय मंच ने भी पाकिस्तान द्वारा नियंत्रण रेखा के उल्लंघन की निंदा की और भारत के पक्ष में अपनी स्थिति स्पष्ट की। कोलोन शिखर सम्मेलन में जी8 देशों ने पाकिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाने की मांग की।
        5. चीन: चीन, जो पाकिस्तान का लंबे समय से सहयोगी रहा है, ने इस युद्ध में तटस्थ रुख अपनाया और दोनों पक्षों से नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बनाए रखने की अपील की। यह भारत के लिए एक कूटनीतिक जीत थी, क्योंकि चीन ने पाकिस्तान का खुलकर समर्थन नहीं किया।

      कूटनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय भूमिका

      कारगिल युद्ध केवल सैन्य संघर्ष तक सीमित नहीं था; इसने वैश्विक कूटनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पाकिस्तान ने शुरू में घुसपैठियों को कश्मीरी आतंकवादी बताकर अपनी संलिप्तता से इनकार किया। लेकिन युद्ध में बरामद दस्तावेजों और बाद में पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साफ हो गया कि यह पाकिस्तानी सेना की सुनियोजित साजिश थी।

      अमेरिका, रूस, जी8, और आसियान जैसे देशों और संगठनों ने पाकिस्तान की इस हरकत की निंदा की। 4 जुलाई 1999 को पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अमेरिका का दौरा किया, जहां उन्हें राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से कड़ी फटकार मिली। अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव डाला कि वह अपनी सेना को वापस बुलाए। इस कूटनीतिक दबाव ने पाकिस्तान को अलग-थलग कर दिया और भारत की स्थिति को मजबूत किया।

      युद्ध का अंत और भारत की जीत

      26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने टाइगर हिल, प्वाइंट 4875, और अन्य सभी चोटियों को पाकिस्तानी कब्जे से मुक्त करा लिया। इस दिन को ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में घोषित किया गया। ऑपरेशन विजय की सफलता ने भारत की सैन्य ताकत और रणनीतिक कुशलता को विश्व मंच पर प्रदर्शित किया। पाकिस्तान को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी, और युद्ध में उसकी हार हुई।

      पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने बाद में स्वीकार किया कि इस युद्ध में उनके 2,700 से 4,000 सैनिक मारे गए, हालांकि आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान ने केवल 357 सैनिकों की मौत का दावा किया। युद्ध के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी, और नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर परवेज मुशर्रफ सत्ता में आए।

      कारगिल विजय दिवस क्यों मनाया जाता है?

      कारगिल विजय दिवस हर साल 26 जुलाई को भारत में मनाया जाता है ताकि उन वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि दी जाए जिन्होंने कारगिल युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी। यह दिन न केवल भारत की सैन्य जीत का उत्सव है, बल्कि यह भारतीय सैनिकों के साहस, बलिदान, और देशभक्ति की भावना का प्रतीक भी है।

          1. शहीदों को श्रद्धांजलि: कारगिल विजय दिवस उन 527 सैनिकों को याद करने का दिन है जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपनी जान दी। यह दिन उनके परिवारों के प्रति एकजुटता दिखाने का भी अवसर है।
          2. राष्ट्रीय गौरव: यह दिन भारतीय सेना की वीरता और देश के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह हर भारतीय को गर्व का अनुभव कराता है और युवाओं को सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करता है।
          3. देशभक्ति की भावना: कारगिल युद्ध ने पूरे देश को एकजुट किया। यह पहला युद्ध था जिसका सीमित स्तर पर टीवी पर प्रसारण हुआ, जिससे हर भारतीय भावनात्मक रूप से इससे जुड़ गया। यह दिन देशभक्ति की भावना को मजबूत करता है।
          4. सैन्य सबक: कारगिल युद्ध ने भारत को कई महत्वपूर्ण सबक सिखाए। युद्ध के दौरान खुफिया जानकारी की कमी और अन्य अनियमितताओं को दूर करने के लिए भारत ने अपनी सैन्य और खुफिया क्षमताओं को मजबूत किया।
          5. वैश्विक छवि: इस युद्ध ने भारत की सैन्य क्षमताओं और क्षेत्रीय संघर्षों को प्रभावी ढंग से प्रबंधन करने की उसकी क्षमता को उजागर किया, जिससे भारत की वैश्विक छवि मजबूत हुई।

        युद्ध के प्रभाव

        कारगिल युद्ध के कई दीर्घकालिक प्रभाव रहे। भारत में इस युद्ध ने देशप्रेम की भावना को नई ऊंचाइयों पर ले गया। कई फिल्में जैसे ‘एलओसी कारगिल’, ‘लक्ष्य’, और ‘धूप’ इस युद्ध से प्रेरित होकर बनीं। भारत ने अपनी रक्षा नीति को और मजबूत किया, रक्षा बजट बढ़ाया, और सीमा पर निगरानी की व्यवस्था को बेहतर किया।

        पाकिस्तान में, इस युद्ध ने राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता को बढ़ावा दिया। नवाज शरीफ ने बाद में स्वीकार किया कि उन्हें इस युद्ध की योजना का विरोध करने के कारण सत्ता से हटा दिया गया। 2024 में, पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर ने पहली बार स्वीकार किया कि कारगिल युद्ध में उनकी सेना शामिल थी, जो एक ऐतिहासिक कबूलनामा था।

        निष्कर्ष

        कारगिल युद्ध भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जो साहस, बलिदान, और देशभक्ति की अमर गाथा को दर्शाता है। इस युद्ध में भारतीय सेना ने न केवल अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, बल्कि यह भी दिखाया कि देश की संप्रभुता और सम्मान के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। कारगिल विजय दिवस हर साल हमें उन वीर सैनिकों की याद दिलाता है जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना देश की रक्षा की। यह दिन हमें यह भी सिखाता है कि एकता, साहस, और दृढ़ संकल्प के साथ कोई भी चुनौती पार की जा सकती है।

        आज, जब हम कारगिल विजय दिवस की 26वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, यह जरूरी है कि हम उन शहीदों को याद करें, उनके परिवारों के प्रति सम्मान व्यक्त करें, और अपनी सेना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करें। कारगिल युद्ध की कहानी न केवल सैन्य इतिहास का हिस्सा है, बल्कि यह हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

        Also read : Operation Sindor   Wikipedia: Kargil War

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