Jagannath ki pahli shakti| EP-3

Jagannath ki pahli shakti| EP-3

भाग 3: शक्ति का पहला प्रयोग | 

1. प्रारंभ – जहाँ शक्ति और दुविधा का मिलन हुआ 

नागलोक में आज हलचल थी। चारों दिशाओं से नागगुरु एकत्र हुए थे। कारण था – जगन्नाथ की शक्ति का पहली बार प्रकट होना।
सभी गुरुगण और नागरक्षक मंत्रमुग्ध थे, पर चिंतित भी। एक बालक, जिसे अब तक केवल अभ्यास के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा था, ने बिना निर्देश के अपनी शक्ति का प्रयोग किया — और वह प्रयोग इतना प्रभावशाली था कि एक शत्रु नाग का हृदय धड़कना बंद हो गया।

नागगुरु तक्षक चिंतित स्वर में बोले –

“क्या वह संयम में है, या भावनाओं में बह कर शक्ति का दुरुपयोग कर बैठेगा?”

नागलता, जो एक माँ और नागकन्या दोनों थी, मौन थी। उसे विश्वास था अपने पुत्र पर। पर एक माँ की व्याकुलता वह भी समझती थी।

2. वह घटना – जहाँ पहली बार शक्ति जगी

तीन दिन पहले की बात है। जगन्नाथ एक पुराने शिवगुफा में ध्यान कर रहा था। वहाँ एक युवा नागरक्षक – वासुकी – उससे ईर्ष्या करता था।
वासुकी को लगता था कि “यह बालक केवल माँ के कारण सम्मान पा रहा है, ना कि अपनी योग्यता से।”

“जगन्नाथ, अगर तू सच्चा नागवंशी है तो मेरी परीक्षा में जीतकर दिखा,” उसने चुनौती दी।

पहली परीक्षा थी – तीव्र विष-शक्ति से बनी अग्नि-परीक्षा
दूसरी थी – मन की शक्ति से हवा को नियंत्रित करना।
तीसरी और अंतिम थी – भावना पर नियंत्रण – अपमान सहकर भी शांत रहना।

जगन्नाथ ने दो परीक्षा तो पार कर लीं, लेकिन जब वासुकी ने उसकी माँ नागलता के बारे में अपशब्द कहे, तब…

“बस!” – वह चिल्लाया। उसकी आँखें सुनहरी हो गईं, और उसके चारों ओर एक अग्नि-मंडल बन गया।

उसके हाथ बिना किसी मंत्र के उठे, और वासुकी के शरीर पर एक शक्ति-प्रहार हुआ।
वासुकी होश खो बैठा। हृदय की गति क्षीण हो गई।

3. गुरु परिषद में निर्णय – सज़ा या शिक्षा?

जगन्नाथ को तुरंत नागगुरुओं के समक्ष लाया गया। वह सिर झुकाए खड़ा था।

गुरु तक्षक ने पूछा –

“क्या तू जानता है, तूने क्या किया?”

“हाँ गुरुदेव। मैंने अपनी माँ का अपमान सहा नहीं और शक्ति बहा दी। मुझसे गलती हुई।” – जगन्नाथ का उत्तर था।

गुरु शांत हुए।

“तू सच बोलता है, यही तुझे अन्य से अलग बनाता है।
शक्ति का प्रयोग यदि अनुशासन से नहीं, तो वह विनाश का कारण बनती है।”

जगन्नाथ को सज़ा नहीं दी गई, बल्कि एक नई शिक्षा दी गई –

“तुझे नागलोक का रक्षक बनना है, शासक नहीं।
तू न्याय है, बदला नहीं।”

4. माँ और पुत्र के बीच की बात – एक भावुक संवाद

उस रात जगन्नाथ माँ के पास आया। आँखों में अपराधबोध था।

“माँ, क्या मैं भी एक राक्षस बन गया?”

नागलता ने उसे गले लगाया।

“नहीं पुत्र। तू एक मनुष्य भी है और नाग भी। तुझे निर्णय स्वयं करना है कि तेरा मार्ग कौन-सा होगा।
शक्ति से बड़ा होता है – क्षमा का बल।”

उसने एक कथा सुनाई –

“एक बार नागराज वासुकी ने स्वयं विषपान किया, ताकि देवताओं और असुरों का युद्ध ना हो। शक्ति त्याग में भी होती है।”

जगन्नाथ का सिर झुक गया।

5. रहस्य खुला – “मैं कौन हूँ?”

कुछ दिनों बाद जगन्नाथ ने माँ से एक बड़ा प्रश्न किया।

“माँ, मेरे भीतर जो शक्ति है, वह नागों से अधिक क्यों है?
और मेरी आँखें हर पूर्णिमा को क्यों बदल जाती हैं?”

नागलता मौन रही। पर अब उसे सत्य बताना था।

उसने गुफा में रखा एक सिंहासननुमा पत्थर हटाया, और उसके नीचे रखी थी एक सोने की तलवार और चिह्नित अंगवस्त्र

“यह तेरे पिता का है। तू केवल नाग नहीं – तू उस सम्राट विक्रमकेतु की संतान है, जिसकी नसों में सूर्यवंश बहता है।”

जगन्नाथ स्तब्ध था।

“तो मैं आधा मानव हूँ?”

नागलता –

“हाँ। और तेरा कर्म यही है कि तू दोनों लोकों की रक्षा करे।
एक दिन तू पिता से मिलेगा – पर उससे पहले तुझे पृथ्वी पर जाना होगा।”

6. पृथ्वी यात्रा की शुरुआत – रहस्य बनकर जन्म लेना

अब तक जगन्नाथ को नागलोक से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।
पर अब, एक गुरु – नागसिद्ध – ने आदेश दिया:

“तू 15 वर्ष का हो चला है। अब तुझे अपने पिता के राज्य – विक्रमपुर – में भेजा जाएगा,
पर बिना पहचान, बिना नाम, एक सामान्य बालक बनकर।”

जगन्नाथ को एक नई पहचान दी गई – अर्जुन
उसे एक पुरानी यात्रा मंडली के साथ भेजा गया, ताकि वह साम्राज्य को समझ सके – राजा को, प्रजा को, न्याय को।


7. विक्रमपुर – जहाँ पिता की छाया मिली

विक्रमपुर एक विशाल, सुव्यवस्थित राज्य था। सम्राट विक्रमकेतु अब वृद्ध हो चुके थे, पर न्याय और पराक्रम में अब भी कोई कमी नहीं थी।

अर्जुन (जगन्नाथ) एक दिन राजा की सभा में गया – एक जन-सुनवाई में।

वहाँ उसने देखा कि एक गरीब किसान पर अत्याचार हुआ था, और एक मंत्री उसे झूठा साबित करने की कोशिश कर रहा था।

अर्जुन आगे बढ़ा।
“राजन, यदि अनुमति हो तो मैं इस अन्याय का प्रमाण दे सकता हूँ।”

राजा ने देखा – यह बालक कौन है?

उसकी आंखों में कुछ था – कोई पुरानी छवि, कोई भूली हुई स्मृति।

8. न्याय की परीक्षा – पहली बार पिता के सामने

अर्जुन ने जो प्रमाण प्रस्तुत किया, वह इतना सटीक और तार्किक था कि मंत्री को अपराधी घोषित करना पड़ा।

सभा में सन्नाटा था। राजा उठे और बोले –

“तुम कौन हो बालक? तुम्हारा नाम क्या है?”

अर्जुन कुछ कहने वाला था, लेकिन तभी सभा में नागसिद्ध आ पहुँचे।

“राजन, यह कोई सामान्य बालक नहीं। यह वही है जिसकी भविष्यवाणी वर्षों पहले हुई थी –
नागलोक और पृथ्वी के संयोग से जन्मा वह संतान, जो दोनों लोकों का न्याय रचेगा – जगन्नाथ।


भाग की शिक्षा:

      • शक्ति का पहला प्रयोग जीवन की दिशा तय करता है।

      • संयम, क्षमा और आत्म-ज्ञान ही सच्चे वीर की पहचान हैं।

      • पहचान छुपाना कभी-कभी ज़रूरी होता है, लेकिन सच्चाई एक दिन सामने आ ही जाती है।


    अगले भाग की झलक – भाग 4: जब पुत्र ने पिता को पहचाना

    जगन्नाथ का सामना अपने पिता सम्राट विक्रमकेतु से होता है — लेकिन अब दोनों के बीच है एक रहस्य, एक बंधन, और एक युद्ध की दस्तक।

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